चौहानो का इतिहास Notes

चौहानो का इतिहास Notes चौहान वंश

☘ चौहानो का इतिहास ☘

   (i)वासुदेव चौहान
(ii)
अजयराज
(iii)
अर्णोराज
(iv)
विग्रहराज
(v)
सोमेश्वर
(VI)
पृथ्वीराज चौहान

वासुदेव चौहान

चौहानों का मूल स्थान जांगल देश में सांभर के आसपास सपादलक्ष को माना जाता हैं
इनकी प्रांरभिक राजधानी अहिछत्रपुर (नागौर) थी। बिजोलिया शिलालेख के अनुसार सपादलक्ष के चौहान वंश का संस्थापक वासुदेव चौहान नामक व्यक्ति था, जिसने 551 ई के आसपास इस वंश का प्रारंभ किया। बिजोलिया शिलालेख के अनुसार सांभर झील का निर्माण भी इसी ने करवाया था। इसी के वंशज अजपाल ने 7वीं सांभर कस्बा बसाया तथा अजयमेरू दुर्ग की स्थापना की थी।

विग्रहराज द्वितीय

चौहान वंश के प्रारंभिक शासकों में सबसे प्रतापी राजा सिंहराज का पुत्र विग्रहराज-द्वितीय हुआ, जो लगभग 956 ई के आसपास सपालक्ष का शासक बना। इन्होने अन्हिलपाटन के चालुक्य शासक मूलराज प्रथम को हराकर कर देने को विवश किया तथा भड़ौच में अपनी कुलदेवी आशापुरा माता का मंदिर बनवाया। विग्रहराज के काल का विस्तृत वर्णन 973 ई. के हर्षनाथ के अभिलेख से प्राप्त होता है।

अजयराज

चौहान वंश का दूसरा प्रसिद्ध शासक अजयराज हुआ, जिसने (पृथ्वीराज विजय के अनुसार) 1113 ई. के लगभग अजयमेरू (अजमेर) बसाकर उसे अपने राज्य की राजधानी बनाया। उन्होंने अन्हिलापाटन के चालुक्य शासक मूलराज प्रथम को हराया। उन्होनें श्री अजयदेव नाम से चादी के सिक्के चलाये। उनकी रानी सोमलेखा ने भी उने नाम के सिक्के जारी किये।

अर्णोराज:

अजयराज के बाद अर्णोंराज ने 1133 ई. के लगभग अजमेर का शासन संभाला। अर्णोराज ने तुर्क आक्रमणकारियों को बुरी तरह हराकर अजमेर में आनासागर झील का निर्माण करवाया। चालुक्य शासक कुमारपाल ने आबू के निकट युद्ध में इसे हराया। इस युद्ध का वर्णन प्रबन्ध कोश में मिलता है। अर्णोराज स्वयं शैव होते हुए भी अन्य धर्मो के प्रति सहिष्णु था। उनके पुष्कर में वराह-मंदिर का निर्माण करवाया।

 विग्रहराज चतुर्थ:

विग्रहराज-चतुर्थ (बीसलदेव) 1153 ई. में लगभग अजमेर की गद्दी पर आसीन हुए। इन्होंने अपने राज्य की सीमा का अत्यधिक विस्थार किया। उन्होंने गजनी के शासक अमीर खुशरूशाह (हम्मीर)को हराया तथा दिल्ली के तोमर शासक को पराजित किया एवं दिल्ली को अपने राज्य में मिलाया। एक अच्छा योद्धा एवं सेनानायक शासक होते हुए व विद्वानों के आश्रयदाता भी थे। उनके दरबार मे सोमदेव जैसे प्रकाण्ड विद्वान कवि थे। जिसने ‘ललित विग्रहराज‘ नाटक को रचना की। विग्रहराज विद्वानों के आश्रयदाता होने के कारण ‘कवि बान्धव‘ के नाम से जाने जाते थे। स्वयं विग्रहराज ने ‘हरिकेलि‘ नाटक लिखा। इनके काल को चोहन शासन का ‘स्वर्णयुग‘ भी कहा जाता है।

 पृथ्वीराज-तृतीय:

चौहान वंश के अंतिम प्रतापी सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय का जन्म 1166 ई. (वि.सं. 1223) में अजमेर के चौहान शासन सोमेश्वर की रानी कर्पूरीदेवी (दिल्ली के शासक अनंगपाल तोमर की पुत्री) को कोख से अन्हिलपाटन (गुजरात) में हुआ। अपने पिता का असमय देहावसान हो जाने के कारण मात्र 11 वर्ष की अल्पायु में पृथ्वीराज तृतीय अजमेर की गद्दी के स्वामी बने। परन्तु बहुत कम समय में ही पृथ्वीराज-तुतीय ने अपनी योग्यता एवं वीरता से समस्त शासन प्रबन्ध अपने हाथ में ले लिया। उसके बाद उसने अपने चारों ओर के शत्रुओं का एक-एक कर शनै-शनै खात्मा किया एव दलपंगुल (विश्व विजेता) की उपाधि धारण की। वीर सेनानायक सम्राट पृथ्वीराज किन्ही कारणों से मुस्लिम आक्रांता मुहम्मद गौरी से तराइन के द्वितीय युद्ध में हार गया और देश में मुस्लिम शासन की नींव पड़ गई।

महत्वपूर्ण युद्ध

1. तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई.:-तराइन का प्रथम युद्ध 1191 ई. में ‘तराइन’ के मैदान में लड़ा गया था। यह युद्ध हिन्दू राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान और भारत पर हमला करने वाले मुस्लिम आक्रमणकारी शहाबुद्दीन मुहम्मद ग़ोरी के मध्य हुआ। इस युद्ध में मुहम्मद ग़ोरी की करारी हार हुई और उसकी सेना भाग खड़ी हुई। ग़ोरी स्वयं बुरी तरह घायल हो गया और उसे अपनी जान बचाकर भारत भूमि से भागना पड़ा।

2. तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.):-तराइन का द्वितीय युद्ध वर्ष 1192 ई. में पृथ्वीराज चौहान और शहाबुद्दीन मुहम्मद ग़ोरी के मध्य लड़ा गया। तराइन के इस युद्ध को ‘भारतीय इतिहास’ का एक विशेष मोड़ माना जाता है। इस युद्ध में मुस्लिमों की विजय और राजपूतों की पराजय हुई। इस विजय से बाहरी आक्रमणकारियों के पाँव भारत में काफ़ी लम्बे तक जम गये। क्योंकि इस युद्ध से पूर्व भी पृथ्वीराज के कई हिन्दू राजाओं से युद्ध हो चुके थे और इन राजाओं से उसके आपसी सम्बन्ध सौहार्दपूर्ण नहीं थे, जिस कारण अधिकांश राजपूत राजाओं ने ‘तराइन के द्वितीय युद्ध’ में पृथ्वीराज का साथ नहीं हुआ

पृथ्वीराज के प्रमुख सैनिक अभियान

                 (i)नागार्जुन एवं भण्डानकों का दमन:-पृथ्वीराज के राजकाल संभालने के कुछ समय बाद उसके चचेरे भाई नागार्जुन ने विद्रोह कर दिया। वह अजमेर का शासन प्राप्त करने का प्रयास कर रहा था अतः पृथ्वीराज ने सर्वप्रथम उसे पराजित कर गडापुरा (गुड़गाॅव) एवं आसपास का क्षेत्र अपने अधिकार में कर लिये
(ii)महोबा के चंदेलों पर विजय:- पृथ्वीराज ने 1182 ई. मे ही महोबा के चंदेल शासक परमाल (परमार्दी) देव को हराकर उसे संधि के लिए विवश किया एवं उसके कई गांव अपने अधिकार में ले लि
(iii)चालुक्यों पर विजय:-सन् 1184 के लगभग गुजरात के चालुक्य शासक भीमदेव-द्वितीय के प्रधानमंत्री जगदेश प्रतिहार एवं पृथ्वीराज की सेना के मध्य नागौर का युद्ध हआ जिसके बाद दोनों में संधि हो गई एवं चौहानों की चालुक्यों से लम्बी शत्रुता का अंत हुआ।
(iv)कन्नौज से संबंध:- पृथ्वीराज के समय कत्रौज पर गहड़वाल शासक जयचन्द का शासन था। जयचंद एवं पृथ्वीराज दोनों की राज्य विस्तार की महात्वाकांक्षाओं ने उनमें आपसी वैमनस्य उत्पत्र कर दिया था। उसके बाद उसकी पुत्री संयोंगिता को पृथ्वीराज द्वारा स्वयंवर से उठा ले जाने के कारण दोनों की शत्रुता और बढ़ गई थी इसी वजह से तराइन युद्ध में जयचंद ने पृथ्वीराज की सहायता न कर मुहम्मद गौरी की सहायता की।

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Author: RPSC GURU

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