भारत का संविधान भाग-3 मूल अधिकार
mool adhikar , fundamental rights

भारत का संविधान भाग-3 मूल अधिकार

भारत का संविधान भाग-3 मूल अधिकार

संविधान के भाग 3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक मूल अधिकारों का वर्णन हमें मिलता हैं

हमारे संविधान निर्माताओं ने हमारे लिए मूल अधिकार अमेरिका के संविधान से लिए
संविधान के मूल अधिकार भाग 3 में हैं और संविधान के भाग 3 को भारत का मैग्नाकार्टा की संज्ञा दी जाती हैं

मैग्नाकार्टा इसलिए कहा जाता हैं की अब से लगभग 800 वर्ष पूर्व 1200 ई में ब्रिटेन के महाराजा नें नागरिकों के लिए कुछ अधिकार पत्र दिये जिसमें नागरिको के अधिकार दिये गये इतिहासकारों ने उन अधिकारों को मैग्नाकार्टा कहा हैं तो भारत की जनता के लिए भी इन्हे मैग्नाकार्ट की संज्ञा दी है

मैग्नाकार्टा

नागरिको के अधिकारों के लिए जितना विस्तृत विवरण हमारे भारत के संविधान में हैं ऐसा दुनिया के किसी भी देश के संविधान में नही हैं। चाहे वो अमेरिका ही क्यों नहीं हो।
संविधान द्वारा हमें बिना किसी भेदभाव के हर व्यक्ति के लिए मूल अधिकार के सम्बन्ध में ग्यारण्टी दी गयी हैं।

मूल अधिकारों का मतलब होता हैं किसी भी देश की व्यवस्था बनाये रखना एंव राज्य के कठोर नियमों के खिलाफ नागरिकों की आजादी की सुरक्षा करते हैं, ये अधिकार तानाशाही को रोकते हैं कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं मूल अधिकारों का मतलब कानून की सरकार बनाना हैं न की व्यक्तियों की।
यह मूल अधिकार नाम इसलिए दिया हुआ हैं क्योंकि इन्हे संविधान द्वारा सुरक्षा प्रदान हैं तथा यह व्यक्ति के चहुमुखे विकास के लिए ये जरूरी भी हैं।

शुरुआत में मूल रूप से संविधान में 7 मूल अधिकार दिये गये थे

  1. समता का अधिकार – इसका विवरण अनुच्छेद 14 से 18 तक हैं
  2. स्वतन्त्रता का अधिकार- इसका विवरण अनुच्छेद 19 से 22 तक हैं
  3. शोषण के विरूद्व अधिकार- इसका विवरण अनुच्छेद 23 और 24 में हैं
  4. धर्म की स्वतन्त्रता का अधिकार-इसका विवरण अनुच्छेद 25 से 28 तक हैं
  5. संस्कृति और शिक्षा संबधी अधिकार- यह अनुच्छेद 29 और 30 में हैं
  6. संपति का अधिकार – यह अनुच्छेद 31 में था।
  7. संवैधानिक उपचारों का अधिकार-यह अनुच्छेद 32 में हैं

नोटः- संपति के अधिकार जो अनुच्छेद 31 में था उसको 44वें संविधान संसोधन 1978 द्वारा हटा दिया गया हैं और यहां से हटाकर संविधान के भाग 12 मे अनुच्छेद 300क के रूप में नया कानुनी अधिकार बना दिया हैं।

इस प्रकार वर्तमान में 7 की जगह 6 मूल अधिकार हैं।

6 मूल अधिकार

मूल अधिकारों की विशेषता

  • मूल अधिकारों में कुछ मूल अधिकार केवल नागरिकों को प्राप्त हैं जबकि कुछ सभी को प्राप्त हैं।
  • ये सीमित हैं , अर्थात राज्य उन पर प्रतिबन्ध लगा सकता हैं हालांकि प्रतिबन्ध लगाने का कारण उचित हैं या नहीं इसका फैसला अदालत करेगी , लेकिन मूल अधिकार वाद योग्य हैं, वाद योग्य का मतलब अगर अपने को दिये गये इन अधिकारों का हनन होता हैं तो हम अदालत की शरण ले सकते हैं।
  • कुछ अधिकारों को छोड़कर ज्यादातर अधिकार राज्य के मनमाने रवैये के खिलाफ ही हैं
  • कुछ मूल अधिकार नकारात्मक विशेषता वाले हैं जैसे राज्य के प्राधिकार को सीमित करते हैं लेकिन कुछ अधिकार सकारात्मक हैं जैसे व्यक्तियों के लिए विशेष सुविधाओं का प्रावधान।
  • इन्हे उच्चतम न्यायालय द्वारा ग्यारण्टी व सुरक्षा प्राप्त हैं।
  • ये स्थायी नहीं हैं संसद इनमें कटौती या कमी कर सकती हैं ।
  • राष्ट्रीय आपातकाल के समय अनुच्छेद 20 व 21 के अधिकारों को छोड़कर बाकी सभी अधिकारों को निलम्बित किया जा सकता हैं।

यहां हम बार-बार राज्य शब्द का उपयोग कर रहें हैं यहां राज्य का अर्थ कोई क्षेत्रिय राज्य नहीं हैं जैसे राजस्थान, हरियाणा,मध्यप्रदेश,बिहार आदी
यहां राज्य का अर्थ क्या हैं इसके बारें में संविधान के अनुच्छेद 12 में स्पष्ट किया गया हैं।

भारत का संविधान भाग-3 मूल अधिकार , की शुरुआत अनुच्छेद 14 से होती हैं लेकिन भाग 3 की शुरआत अनुच्छेद 12 से होती हैं

अनुच्छेद 12:- राज्य की परिभाषा
अनुच्छेद 12 राज्य शब्द को परिभाषित करता हैं इसके अनुसार राज्य में निम्नलिखित शामिल हैं।

  • (अ) विधायी अंगोे की संघिय सरकार और संसद।
  • (ब) राज्य विधानमण्डल
  • (स) सभी स्थानीय निकाय (पंचायत समीति,नगरपालिकाएं ,जिला)
  • (द) अन्य सभी वैधानिक ,गैर संवैधानिक संस्थायें आदी।

उच्चतम न्यायालय के अनुसार किसी भी प्रकार की निजी इकाई यां एजेंसी जो राज्य की संस्था के रूप में काम कर रही हैं वे सभी राज्य के अर्थ में आती हैं।

अनुच्छेद 13:- विधि की परिभाषा

अनुच्छेद 13 विधि शब्द को परिभाषित करता हैं।

विधि यानी कानून(LAW) और कहता हैं की अगर कोई ऐसा कानून जो मूल अधिकारों का हनन करता हैं उच्चतम न्यायालय उन विधी या कानूनों को शून्य घोषित कर सकता हैं इसके अनुसार विधि शब्द में निम्नलिखित में शामिल किया गया हैं

(अ)स्थायी विधियां , संसद या विधानमण्डल द्वारा पारित की गयी
(ब)अस्थायी विधिया, राष्ट्रपती व राज्यपालों द्वारा जारी की गयी
(स)कार्यपालिका द्वारा दिये आदेश , अध्यादेश, नियम ,अधिसूचना
(द)विधी पर बल देने वाली कोई भी प्रथा

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