INDIAN EVIDENCE ACT-1872 IN HINDI
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INDIAN EVIDENCE ACT-1872 IN HINDI

INDIAN EVIDENCE ACT-1872 IN HINDI भारतीय साक्ष्य अधिनियम-1872

INDIAN EVIDENCE ACT-1872 (भारतीय साक्ष्य अधिनियम-1872) 1 सितम्बर 1872  से लागू हुआ

INDIAN EVIDENCE ACT-1872 (भारतीय साक्ष्य अधिनियम-1872) में कुल 3 भाग 11 अध्याय 167 धाराएं हैं

भाग 1
तथ्यों की सुसंगति
[अध्याय 1-2]  [धारा 1-55]
अध्याय नाम धारा
1 प्रारम्भिक 1-4
2 तथ्यों की सुसंगति के विषय में 5-55
भाग-2
सबूत के विषय में
[अध्याय 3-6]  [धारा 56-100]
अध्याय नाम धारा
3 वे तथ्य जिनको साबित किया जाना आवश्यक नहीं 56-58
4 मौखिक साक्ष्य के विषय में 59-60
5 दस्तावेजी साक्ष्य के विषय में 61-90
6 दस्तावेजी साक्ष्य के द्वारा मौखिक साक्ष्य के अपवर्जन 91-100
भाग-3
साक्ष्य का पेश किया जाना और प्रभाव
[अध्याय 7-11] [धारा 101-167]
अध्याय नाम धारा
7 सबुत के भार के विषय में 101-114
8 विबंध 115-117
9 साक्षियों के विषय में 118-134
10 साक्षियों के परीक्षा के विषय में 135-166
11 साक्ष्य के अनुचित ग्रहण और अग्रहण के विषय में 167
  1. संघ एवं इसका क्षेत्र (Union and Territory)
  2. नागरिकता (Citizenship)
  3. RPSC GURU – Indian Polity, Constitution

भाग -1 तथ्यों की सुसंगति

अध्याय 1 – प्रारंभिक

  1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ – यह अधिनियम भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 कहा जा सकेगा | इसका विस्तार जम्मू- काश्मीर राज्य के सिवाय संपूर्ण भारत पर हैं और यह किसी न्यायालय में या के समक्ष की जिसके अंतर्गत आर्मी एक्ट, (44 तथा 45 विक्टो, अ.58) नेवल डिसिप्लिन एक्ट (29 तथा 30 विक्टो, अ.109),या इंडियन नेवी , (डिसिप्लिन) एक्ट, 1934(1934 का 34) या एयर फोर्स एक्ट (7 जा.5, अ.51) के अधीन संयोजित सेना न्यायालयों से भिन्न सेना न्यायालय आते हैं, समस्त न्यायिक कार्यवाहियों को लागू हैं, किंतु न तो किसी नयायालय या ऑफिसर के समक्ष पेश किए शपथ पत्रों को और न किसी मध्यस्थ के समक्ष की कार्यवाहियों को लागू हैं; और यह 1872 के सितम्बर के प्रथम दिन को प्रवृत्त होगा|
  2. [ अधिनियमितियों का निरसन ] निरसन अधिनियम, 1938 (1938 का 1) की धारा 2 और अनुसूची द्वारा निरसित|
  3. निर्वचन खंड – इस अधिनियम में निम्नलिखित शब्दों और पदों का निम्नलिखित भावों में प्रयोग किया गया है, जब तक कि संदर्भ से तत्प्रतिकूल आशय प्रतीत न हो:
    “ न्यायालय ”- “न्यायालय” शब्द के अंतर्गत सभी न्यायाधीश और मजिस्ट्रेट तथा मध्यस्थों के सिवाय साक्ष्य लेने के लिए वैध रूप से प्राधिकृत सभी व्यक्ति आते हैं |
    “ तथ्य ”- “तथ्य” से अभिप्रेत हैं और उसके अंतर्गत आती है-
    (1) ऐसी कोई वस्तु, वास्तुओ की अवस्था, या वस्तुओं का संबंध जो इंद्रियों द्वारा बोधगम्य हो;
    (2) कोई मानसिक दशा, जिसका भान किसी व्यक्ति को हो|
    दृष्टांत
    (क) यह कि अमुक स्थान में अमुक क्रम से अमुक पदार्थ व्यवस्थित है, एक तथ्य है।
    (ख) यह कि किसी मनुष्य ने कुछ सुना या देखा, एक तथ्य है।
    (ग) यह कि किसी मनुष्य ने अमुक शब्द कहे, एक तथ्य है।
    (घ) यह कि कोई मनुष्य अमुक राय रखता है, अमुक आशय रखता है, सद्भावपूर्वक या कपटपूर्वक कार्य करता है, या किसी विशिष्ट शब्द को विशिष्ट भाव में प्रयोग करता है, या उसे किसी विशिष्ट संवेदना का भान है या किसी विनिर्दिष्ट समय में था, एक तथ्य है।
    (ङ) यह कि किसी मनुष्य की अमुक ख्याति है, एक तथ्य है।
    “ सुसंगत ”- एक तथ्य दूसरे तथ्य से तब सुसंगत कहा जाता हैं जबकि तथ्यों की सुसंगति से संबंधित इस अधिनियम के उपबंधों में निर्दिष्ट प्रकारों में से किसी भी प्रकार से वह तथ्य उस दूसरे तथ्य से संसक्त हो |
    “विवाद्यक तथ्य ”- विवाद्यक तथ्य से अभिप्रेत हैं और उसके अंतर्गत आता हैं-
    ऐसा कोई भी तथ्य जिस अकेले ही से, या अन्य तथ्यों के संसर्ग में किसी ऐसे अधिकार, दायित्व या निर्योग्यता के, जिसका किसी वाद या कार्यवाही में प्राख्यान या प्रत्याख्यान किया गया हैं, अस्तित्व, अनस्तित्व, प्रकृति या विस्तार की उत्पत्ति अवश्यमेव होती है |
    स्पष्टीकरण – जब कभी कोई न्यायालय विवाद्यक तथ्य को सिविल प्रक्रिया से संबंधित किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के उपबंधो के अधीन अभिलिखित करता है तब ऐसे विवाद्यक के उत्तर में जिस तथ्य का प्राख्यान या प्रत्याख्यान किया जाना हैं, वह विवाद्यक तथ्य है
    दृष्टांत
    ख की हत्या का क अभियुक्त है।
    उसके विचारण में निम्नलिखित तथ्य विवाद्य हो सकते हैं:-
    यह कि क ने ख की मृत्यु कारित की,
    यह कि क का आशय ख की मृत्यु कारित करने का था,
    यह कि क को ख से गंभीर और अचानक प्रकोपन मिला था,
    यह कि ख की मृत्यु कारित करने का कार्य करते समय क चित्तविकृति के कारण उस कार्य की प्रकृति जानने में असमर्थ था।
    “ दस्तावेज ”- “दस्तावेज” से ऐसा कोई विषय अभिप्रेत है जिसको किसी पदार्थ पर अक्षरों, अंकों या चिन्हों के साधन द्वारा या उनमें से एक से अधिक साधनों द्वारा अभिव्यक्त या वर्णित किया गया है जो उस विषय के अभिलेखन के प्रयोजन से उपयोग किए जाने को आशयित हो या उपयोग किया जा सके |
    दृष्टांत
    लेख दस्तावेज हैं;
    मुद्रित,
    शिला – मुद्रित या फोटोचित्रित शब्द दस्तावेज हैं;
    मानचित्र या रेखांक दस्तावेज है;
    धातुपट्ट या शिला पर उत्कीर्ण लेख दस्तावेज हैं:
    उपहासांकन दस्तावेज है।
    “ साक्ष्य ”- “साक्ष्य” शब्द से अभिप्रेत है और उसके अंतर्गत आते है-
    (1) वे सभी कथन जिनके, जांचाधीन तथ्यों के विषयों के संबंध में न्यायालय अपने सामने साक्षियों द्वारा किए जाने की अनुज्ञा देता है या अपेक्षा करता है;
    ऐसे कथन मौखिक साक्ष्य कहलाते है;
    (2) न्यायालय के निरीक्षण के लिए पेश की गयी सब दस्तावेजें जिनमें इलेक्ट्रोनिक अभिलेख शामिल हैं|
    ऐसी दस्तावेजें साक्ष्य कहलाती हैं |
    “ साबित ”– कोई तथ्य साबित हुआ कहा जाता है, जब न्यायालय अपने समक्ष के विषयों पर विचार करने के पश्चात या तो यह विश्वास करे कि उस तथ्य का अस्तित्व है या उसके अस्तित्व को इतना अधिसंभाव्य समझे कि उस विशिष्ट मामले की परिस्थितियो में किसी प्रज्ञावान व्यक्ति को इस अनुमान का कार्य करना चाहिए कि उस तथ्य का अस्तित्व है |
    “ नासाबित ”– कोई तथ्य नासाबित हुआ कहा जाता है, जब न्यायालय अपने समक्ष विषयों पर विचार करने के पश्चात या तो यह विश्वास करे कि उसका अस्तित्व नहीं हैं, या उसके अस्तित्व को इतना अधिसंभाव्य समझे कि उस विशिष्ट मामले की परिस्थितियों में किसी प्रज्ञावान व्यक्ति को इस अनुमान पर कार्य कराना चाहिए कि उस तथ्य का अस्तित्व नहीं है |
    “साबित नहीं हुआ”– कोई तथ्य साबित नहीं हुआ कहा जाता है, जब वह न तो साबित किया गया हो और नासाबित|
    “ भारत ”– ‘भारत’ से जम्मू-काश्मीर राज्य के सिवाय भारत का राज्य क्षेत्र अभिप्रेत है |
    “प्रमाणकर्ता अधिकारी”, “इलेक्ट्रोनिक चिन्हक”, “ इलेक्ट्रोनिक चिन्हक प्रमाण पत्र”, “इलेक्ट्रोनिक प्ररूप”, “इलेक्ट्रोनिक अभिलेख”, “सूचना”, “सुरक्षित डिजीटल हस्ताक्षर”, एवं “हस्ताक्षरकर्ता” का वही अर्थ होगा जो उन्हें सूचना और प्रोद्योगिकी अधिनियम, 2000 में दिया गया हैं |
  4. “ उपधारणा कर सकेगा ”– जहाँ कहीं इस अधिनियम द्वारा यह उपबंधित है कि न्यायालय किसी तथ्य की उपधारणा कर सकेगा, वहां न्यायालय या तो ऐसे तथ्य को साबित हुआ मान सकेगा, यदि और जब तक वह नासाबित नहीं किया जाता है, या उसके सबूत की मांग कर सकेगा |
    “ उपधारणा करेगा ”- जहाँ कहीं इस अधिनियम द्वारा यह निर्दिष्ट है कि न्यायालय किसी तथ्य की उपधारणा करेगा, वहां न्यायालय ऐसे तथ्य को साबित मानेगा यदि और जब तक वह नासाबित नहीं किया जाता है |
    “ निश्चायक सबूत ”- जहाँ कि इस अधिनियम द्वारा एक तथ्य किसी अन्य तथ्य का निश्चायक सबूत घोषित किया गया है, वहां न्यायालय उस एक तथ्य के साबित हो जाने पर उस अन्य को साबित मानेगा और उसे नासाबित करने के प्रयोजन के लिए साक्ष्य दिए जाने की अनुज्ञा नहीं देगा |

अध्याय 2-‘ तथ्यों की सुसंगति के विषय में ‘

5.विवाद्यक तथ्यों और सुसंगत तथ्यों का साक्ष्य दिया जा सकेगा – किसी वाद या कार्यवाही में हर विवाद्यक तथ्य के और ऐसे अन्य तथ्यों के, जिन्हें एतस्मिनपश्चात सुसंगत घोषित किया गया है, अस्तित्व या अनस्तित्व का साक्ष्य दिया जा सकेगा और किन्ही अन्यों का नहीं |
स्पष्टीकरण – यह धारा किसी व्यक्ति को ऐसे तथ्य का साक्ष्य देने के लिए योग्य नहीं बनायेगी, जिसमें सिविल प्रकिया से सम्बन्धी किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के किसी उपबंध द्वारा वह साबित करने से निर्हकित कर दिया गया है |
दृष्टांत
(क) ख की मृत्युकारित करने के आशय से उसे लाठी मारकर उसकी हत्या कारित करने के लिए क का विचारण किया जाता है।
क के विचारण में निम्नलिखित तथ्य विवाद्य हैं:-
क का ख को लाठी से मारना;
क का ऐसी मार द्वारा ख की मृत्यु कारित करना;
ख की मृत्यु कारित करने का क का आशय।
(ख) एक वादकर्ता अपने साथ वह बंधपत्र, जिस पर वह निर्भर करता है, मामले की पहली सुनवाई पर अपने साथ नहीं लाता और पेश करने के लिए तैयार नहीं रखता। यह धारा उसे इस योग्य नहीं बनाती कि सिविल प्रक्रिया संहिता द्वारा विहित शर्तों के अनुकूल वह उस कार्यवाही के उत्तरवर्ती प्रक्रम में उस बंधपत्र को पेश कर सके या उसकी अंतर्वस्तु को साबित कर सके।

6.एक ही संव्यवहार के भाग होने वाले तथ्यों की सुसंगति – जो तथ्य विवाद्यक न होते हुए भी किसी विवाद्यक तथ्य उस प्रकार संसक्त है की वे एक ही संव्यवहार के भाग हैं, वे तथ्य सुसंगत हैं, चाहे वे उसी समय और उसी स्थान पर या विभिन्न समयों और स्थानों पर घटित हुए हों |
दृष्टांत
(क) ख को पीटकर उसकी हत्या करने का क अभियुक्त है। क या ख या पास खड़े लोगों द्वारा जो कुछ भी पिटाई के समय या उससे इतने अल्पकाल पूर्व या पश्चात् कहा या किया गया था कि वह उसी संव्यवहार का भाग बन गया है, वह सुसंगत तथ्य है।
(ख) क एक सशस्त्र विप्लव में भाग लेकर, जिसमें संपत्ति नष्ट की जाती है, फौजों पर आक्रमण किया जाता है और जेलें तोड़कर खोली जाती हैं। भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करने का अभियुक्त है। इन तथ्यों का घटित होना साधारण संव्यवहार का भाग होने के नाते सुसंगत है, चाहे क उन सभी में उपस्थित न रहा हो।
(ग) क एक पत्र में, जो एक पत्र-व्यवहार का भाग है, अन्तर्विष्ट अपमान-लेख के लिए ख पर वाद लाता है। जिस विषय में अपमान-लेख उद्भूत हुआ है, उससे संबंध रखने वाले पक्षकारों के बीच जितनी चिट्टियाँ उस पत्र-व्यवहार का भाग हैं जिसमें वह अंतर्विष्ट हैं, वे सुसंगत तथ्य हैं, चाहे उनमें वह अपमान लेख स्वयं अन्तर्विष्ट न हो।
(घ) प्रश्न यह है कि क्या ख से आदिष्ट अमुक माल क को परिदत्त किया गया था। वह माल, अनुक्रमशः कई मध्यवर्ती व्यक्तियों को परिदत्त किया गया था। हर एक परिदान सुसंगत तथ्य है।

7.वे तथ्य जो विवाद्यक तथ्यों के प्रसंग , हेतुक या परिणाम हैं – वे तथ्य सुसंगत है जो सुसंगत तथ्यों के या विवाद्यक तथ्यों की अव्यवहित या अन्यथा प्रसंग, हेतुक का परिणाम है, या जो उस वस्तु स्थिति को गठित करते हैं जिसके अंतर्गत वे घटित हुए या जिसने उनके घटने या संव्यवहार का अवसर दिया |
दृष्टांत
(क) प्रश्न यह है कि क्या क ने ख को लूटा।
ये तथ्य सुसंगत है कि लूट के थोड़ी देर पहले ख अपने कब्जे में धन लेकर किसी मेले में गया और उसने दूसरे व्यक्तियों को उसे दिखाया या उनसे इस तथ्य का कि उसके पास धन है, उल्लेख किया।
(ख) प्रश्न यह है कि क्या क ने ख की हत्या की।
उस स्थान पर जहां हत्या की गई थी या उसके समीप भूमि पर गुत्थम-गुत्था से बने हुए चिह्न सुसंगत तथ्य हैं।
(ग) प्रश्न यह है कि क्या क ने ख को विष दिया।
विष से उत्पन्न कहे जाने वाले लक्षणों के पूर्व ख के स्वास्थ्य की दशा और क को ज्ञात ख की वे आदतें, जिनसे विष देने का अवसर मिला, सुसंगत तथ्य हैं।

8.हेतु , तैयारी और पूर्व का या पश्चात का आचरण – कोई भी तथ्य, जो किसी विधायक तथ्य या सुसंगत तथ्य का हेतु या तैयारी दर्शित या गठित करता हैं, सुसंगत है |
किसी वाद या कार्यवाही के किसी पक्षकार या किसी पक्षकार के अभिकर्ता का ऐसे वाद या कार्यवाही के बारे में या उसमें विवाद्यक तथ्य या उससे सुसंगत किसी तथ्य के बारे में आचरण और किसी ऐसे व्यक्ति का आचरण, जिसके विरुद्ध कोई अपराध किसी कार्यवाही का विषय है, सुसंगत है| यदि ऐसा आचरण किसी विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य को प्रभावित करता है या उससे प्रभावित होता है, चाहे वह उससे पूर्व का हो या पश्चात का |
स्पष्टीकरण 1 – इस धारा में “आचरण” शब्द के अंतर्गत कथन नही आते, जब तक कि वे कथन उन कथनों से भिन्न कार्यों के साथ-साथ और उन्हें स्पष्ट करने वाले न हो, किंतु इस अधिनियम कि किसी अन्य धारा के आधीन उन कथनों कि सुसंगति पर इस स्पष्टीकरण का प्रभाव नहीं पड़ेगा |
स्पष्टीकरण 2 – जब किसी व्यक्ति का आचरण सुसंगत है, तब उससे, या उसकी उपस्थिति और श्रवणगोचरता में किया गया कोई भी कथन, जो उस आचरण पर प्रभाव डालता है, सुसंगत है|
दृष्टांत
(क) ख की हत्या के लिए क का विचारण किया जाता है।
ये तथ्य कि क ने ग की हत्या की, कि ख जानता था कि क ने ग की हत्या की है और कि ख ने अपनी इस जानकारी को लोकविदित करने की धमकी देकर क से धन-उद्दापित करने का प्रयत्न किया था, सुसंगत है।
(ख) क बंधपत्र के आधार पर रुपए के संदाय के लिए ख पर वाद लाता है। ख इस बात का प्रत्याख्यान करता है कि उसने बंधपत्र लिखा।
यह तथ्य सुसंगत है कि उस समय, जब बंधपत्र का लिखा जाना अभिकथित है, ख को किसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए धन चाहिए था।
(ग) विष द्वारा ख की हत्या करने के लिए क का विचारण किया जाता है।
यह तथ्य सुसंगत है कि ख की मृत्यु के पूर्व क ने ख को दिए गए विष के जैसा विष उपाप्त किया था।
(घ) प्रश्न यह है कि क्या अमुक दस्तावेज क की विल है।
ये तथ्य सुसंगत है कि अभिकथित विल की तारीख से थोड़े दिन पहले क ने उन विषयों की जांच की, जिनसे अभिकथित विल के उपबंधों का संबंध है, कि उसने वह विल करने के बारे में वकीलों से परामर्श किया और उसने अन्य विलों के प्रारूप बनवाए, जिन्हें उसने पसंद नहीं किया।
(ङ) क किसी अपराध का अभियुक्त है।
ये तथ्य कि अभिकथित अपराध से पूर्व या अपराध करने के समय या पश्चात् क ने ऐसे साक्ष्य का प्रबंध किया जिसकी प्रवृत्ति ऐसी थी कि मामले के तथ्य उसके अनुकूल प्रतीत हों या कि उसने साक्ष्य को नष्ट
किया या छिपाया या कि उन व्यक्तियों की, जो साक्षी हो सकते थे, उपस्थिति निवारित की या अनुपस्थिति उपाप्त की या लोगों को उसके संबंध में मिथ्या साक्ष्य देने के लिए तैयार किया, सुसंगत है।
(च) प्रश्न यह है कि क्या क ने ख को लूटा।
ये तथ्य कि ख के लूटे जाने के पश्चात् ग ने क की उपस्थिति में कहा कि “ख को लूटने वाले आदमी को खोजने के लिए पुलिस आ रही है”, और यह कि उसके तुरन्त पश्चात् क भाग गया, सुसंगत है।
(छ) प्रश्न यह है कि क्या ख के प्रति क 10,000 रुपए का देनदार है।
यह तथ्य कि क ने ग से धन उधार मांगा और कि घ ने ग से क की उपस्थिति और श्रवणगोचरता में कहा कि “मैं तुम्हें सलाह देता हूं कि तुम क पर भरोसा न करो, क्योंकि वह ख के प्रति 10,000 रुपए का देनदार है”, और कि क कोई उत्तर दिए बिना चला गया, सुसंगत तथ्य है।
(ज) प्रश्न यह कि क्या क ने अपराध किया है।
यह तथ्य कि क एक पत्र पाने के उपरान्त, जिसमें उसे चेतावनी दी गई थी कि अपराधी के लिए जांच की जा रही है, फरार हो गया और उस पत्र की अंतर्वस्तु, सुसंगत है।
(झ) क किसी अपराध का अभियुक्त है।
ये तथ्य कि अभिकथित अपराध के किए जाने के पश्चात् वह फरार हो गया या कि उस अपराध से अर्जित संपत्ति या संपत्ति के आगम उसके कब्जे में थे या कि उसने उन वस्तुओं को, जिनसे वह अपराध किया गया था, या किया जा सकता था, छिपाने का प्रयत्न किया, सुसंगत है।
(ञ) प्रश्न यह है कि क्या क के साथ बलात्संग किया गया।
यह तथ्य कि अभिकथित बलात्संग के अल्पकाल पश्चात् उसने अपराध के बारे में परिवाद किया, वे परिस्थितियां जिनके अधीन तथा वे शब्द जिनमें वह परिवाद किया गया, सुसंगत है। यह तथ्य कि उसने परिवाद किए बिना कहा कि मेरे साथ बलात्संग किया गया है, इस धारा के अधीन आचरण के रूप में सुसंगत नहीं है। यद्यपि वह धारा 32 खण्ड (1) के अधीन मृत्युकालिक कथन, या धारा 157 के अधीन सम्पोषक साक्ष्य के रूप में सुसंगत हो सकता है।
(ट) प्रश्न यह है कि क्या क को लूटा गया।
यह तथ्य कि अभिकथित लूट के तुरन्त पश्चात् उसने अपराध के संबंध में परिवाद किया, वे परिस्थितियाँ
जिनके अधीन तथा वे शब्द, जिनमें वह परिवाद किया गया, सुसंगत है;
यह तथ्य कि उसने कोई परिवाद किए बिना कहा कि मुझे लूटा गया है इस धारा के अधीन आचरण के रूप में सुसंगत नहीं है;
यद्यपि वह धारा 32 खण्ड (1) के अधीन मृत्युकालिक कथन, या धारा 157 के अधीन सम्पोषक साक्ष्य के रूप में सुसंगत हो सकता है।

9.सुसंगत तथ्यों के स्पष्टीकरण या पुन: स्थापना के लिए आवश्यक तथ्य – वे तथ्य, जो विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य के स्पष्टीकरण या पुन:स्थापन के लिए अवश्यक है अथवा जो किसी विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य द्वारा इंगित अनुमान का समर्थन या खंडन करते हैं, अथवा जो किसी व्यक्ति या वस्तु का, जिसकी अनन्यता सुसंगत हो, अनन्यता स्थापित करते हैं, अथवा वह समय या स्थान स्थिर करते हैं, अथवा कोई विवाद्यक तथ्य जब या जहां कोई विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य घटित हुआ अथवा जो उन पक्षकारों का संबंध दर्शित करते हैं उनके द्वारा ऐसे तथ्य का संव्यवहार किया गया था, वहां तक सुसंगत है जहां तक कि वे उस योजना के लिए आवश्यक हो |
दृष्टांत
(क) प्रश्न यह है कि क्या कोई विशिष्ट दस्तावेज क की विल है।
अभिकथित विल की तारीख पर क की सम्पत्ति की, या उसके कुटुम्ब की अवस्था सुसंगत तथ्य हो सकती है।
(ख) क पर निकृष्ट आचरण का लांछन लगाने वाले अपमान-लेख के लिए ख पर क वाद लाता है। ख प्रतिज्ञान करता है कि वह बात, जिसका अपमान-लेख होना अभिकथित है, सच है।
पक्षकारों की उस समय की स्थिति और संबंध, जब अपमान-लेख प्रकाशित हुआ था, विवाद्यक तथ्यों को पुनःस्थापना के रूप में सुसंगत तथ्य हो सकते हैं।
क और ख के बीच किसी ऐसी बात के विषय में विवाद की विशिष्टियाँ, जो अभिकथित अपमान-लेख से असंसक्त हैं, विसंगत हैं यद्यपि यह तथ्य कि कोई विवाद हुआ था, यदि उससे क और ख के पारस्परिक संबंधों पर प्रभाव पड़ा हो, सुसंगत हो सकता है।
(ग) क एक अपराध का अभियुक्त है।
यह तथ्य कि उस अपराध के किए जाने के तुरन्त पश्चात् क अपने घर से फरार हो गया, धारा 8 के अधीन विवाद्यक तथ्यों के पश्चात्वर्ती और उनसे प्रभावित आचरण के रूप में सुसंगत है। यह तथ्य कि उस समय, जब वह घर से चला था, उसका उस स्थान में, जहां वह गया था, अचानक और अर्जेन्ट कार्य था, उसके अचानक घर से चले जाने के तथ्य के स्पष्टीकरण की प्रवृत्ति रखने के कारण सुसंगत है। जिस काम के लिए वह चला उसका ब्यौरा सुसंगत नहीं है, सिवाय इसके कि जहां तक वह यह दर्शित करने के लिए आवश्यक हो कि वह काम अचानक और अर्जेन्ट था।
(घ) क के साथ की गई सेवा की संविदा को भंग करने के लिए ग को उत्प्रेरित करने के कारण ख पर क वाद लाता है। क की नौकरी छोड़ते समय क से ग कहता है कि “मैं तुम्हें छोड़ रहा हूं, क्योंकि ख ने मुझे तुमसे अधिक अच्छी प्रस्थापना की है।” यह कथन ग के आचरण को, जो विवाद्यक तथ्य होने के रूप में सुसंगत है, स्पष्ट करने वाला होने के कारण सुसंगत है।
(ङ) चोरी का अभियुक्त क चुराई हुई संपत्ति ख को देते हुए देखा जाता है, जो उसे क की पत्नी को देते हुए देखा जाता है। ख उसे परिदान करते हुए कहता है कि “क ने कहा है कि तुम इसे छिपा दो”। ख का कथन उस संव्यवहार का भाग होने वाले तथ्य को स्पष्ट करने वाला होने के कारण सुसंगत है।
(च) क बल्वे लिए विचारित किया जा रहा है और उसका भीड़ के आगे-आगे चलना साबित हो चुका है। इस संव्यवहार की प्रकृति को स्पष्ट करने वाली होने के कारण भीड़ की आवाज़ सुसंगत हैं।

10.सामान्य परिकल्पना के बारे में षडयंत्रकारी द्वारा कही या की गयी बातें – जहां कि यह विश्वास करने का युक्तियुक्त आधार है कि दो या अधिक व्यक्तियों ने अपराध या अनुयोंज्य दोष करने के लिए मिलकर षडयंत्र किया है, वहां उनके सामान्य आशय के बारे में उनमें से किसी एक व्यक्ति द्वारा उसके पश्चात,जब ऐसा आशय उनमें से किसी एक ने प्रथम बार मन में धारण किया, कही कि, या लिखी गयी कोई बात उन व्यक्तियों में से हर एक व्यक्ति के विरुद्ध, जिनके बारे में विश्वास किया जाता है कि उन्होंने इस प्रकार षडयंत्र किया है, षडयंत्र का अस्तित्व साबित करने के प्रयोजनार्थ उसी प्रकार सुसंगत तथ्य है जिस प्रकार यह दर्शित करने के प्रयोजनार्थ कि ऐसा कोई व्यक्ति उसका पक्षकार था |
दृष्टांत
यह विश्वास करने का युक्तियुक्त आधार है कि क भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करने के षड़यंत्र में सम्मिलित हुआ है।
ख ने उस षड़यंत्र के प्रयोजनार्थ यूरोप में आयुध उपाप्त किए, ग ने वैसे ही उद्देश्य से कलकत्ते में धन संग्रह किया, घ ने मुम्बई में लोगों को उस षड़यंत्र में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित किया, ङ ने आगरे में उस उद्देश्य के पक्षपोषण में लेख प्रकाशित किए और ग द्वारा कलकत्ते में संगृहीत धन को च ने दिल्ली से छ के पास काबुल भेजा। इन तथ्यों और उस षड़यंत्र का वृत्तांत देने वाले झ द्वारा लिखित पत्र की अन्तर्वस्तु में से हर एक षड़यंत्र का अस्तित्व साबित करने के लिए तथा उसमें क की सह-अपराधिता साबित करने के लिए भी सुसंगत है, चाहे वह उन सभी के बारे में अनभिज्ञ रहा हो और चाहे उन्हें करने वाले व्यक्ति उसके लिए अपरिचित रहे हों और चाहे वे उसके षड़यंत्र में सम्मिलित होने से पूर्व या उसके षड़यंत्र से अलग हो जाने के पश्चात् घटित हुए हों।

11.वे तथ्य जो अन्यथा सुसंगत नहीं हैं कब सुसंगत हैं – वे तथ्य, जो अन्यथा सुसंगत नहीं हैं, सुसंगत हैं |
1) यदि वे किसी विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य से असंगत हैं |
2) यदि वे स्वयंमेव या अन्य तथ्यों के संसर्ग में किसी विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य का अस्तिव या अनस्तित्व अत्यंत अधिसंभाव्य या अनधिसंभाव्य बनाते हैं |
दृष्टांत
(क) प्रश्न यह है कि क्या क ने किसी अमुक दिन कलकत्ते में अपराध किया।
यह तथ्य कि वह उस दिन लाहौर में था, सुसंगत है। यह तथ्य कि जब अपराध किया गया था उस समय के लगभग क उस स्थान से जहां कि वह अपराध किया गया था, इतनी दूरी पर था कि क द्वारा उस अपराध का किया जाना यदि असंभव नहीं तो अत्यंत अनधिसंभाव्य था, सुसंगत है।
(ख) प्रश्न यह है कि क्या क ने अपराध किया है।
परिस्थितियां ऐसी हैं कि वह अपराध क, ख, ग या घ में से किसी एक के द्वारा अवश्य किया गया होगा।
वह हर तथ्य जिससे यह दर्शित होता है कि वह अपराध किसी अन्य के द्वारा नहीं किया जा सकता था और वह ख, ग या घ में से किसी के द्वारा नहीं किया गया था, सुसंगत है।

12.नुकसानी के लिए वादों में रकम अवधारित करने के लिए न्यायालय को समर्थ करने कि प्रवृति रखने वाले तथ्य सुसंगत हैं – उन वादों में, जिन में नुकसानी का दावा किया गया है,कोई भी तथ्य सुसंगत है जिससे न्यायालय नुकसानी को वह रकम अवधारित करने के लिए समर्थ हो जाए, जो अधिनिर्णीत की जानीचाहिए |

13.जब कि अधिकार या रूढ़ी प्रश्नगत हैं , तब सुसंगत तथ्य – जहां कि किसी अधिकार या रूढ़ी के अस्तित्व के बारे में प्रश्न है, वहां निम्नलिखित तथ्य सुसंगत है –
(क) कोई संव्यवहार, जिसके द्वारा प्रश्नगत अधिकार या रूढ़ी सृष्टि, दवाकृत, उपांतरित मान्यकृत, प्राख्यात या प्रत्याख्यात की गयी थी, या जो उसके अस्तित्व से असंगत था,
(ख) वे विशिष्ट उदहारण, जिनमें वह अधिकार या रूढ़ी दवाकृत, मान्यकृत या प्रयुक्त की गयी थी या जिनमे उसका प्रयोग विवादग्रस्त था प्राख्यात किया गया था या उसका अनुसरण नहीं किया गया था|
दृष्टांत

प्रश्न यह है कि क्या क का एक मीनक्षेत्र पर अधिकार है।
क के पूर्वजों को मीनक्षेत्र प्रदान करने वाला विलेख, क के पिता द्वारा उस मीनक्षेत्र का बंधक, क के पिता द्वारा उस बंधक से अनमेल पाश्चिक अनुदान, विशिष्ट उदाहरण, जिनमें क के पिता ने अधिकार का प्रयोग किया या जिनमें अधिकार का प्रयोग क के पड़ोसियों द्वारा रोका गया था, सुसंगत तथ्य हैं।

14.मन या शरीर कि दशा या शारीरिक संवेदना का अस्तित्व दर्शित करने वाले तथ्य – मन की कोई भी दशा जैसे आशय, ज्ञान, सदभाव, अपेक्षा, उतावलापन, किसी विशिष्ट व्यक्ति के प्रति वैमनस्य या सदिच्छा दर्शित करने वाले अथवा शरीर की या शारीरिक संवेदना की किसी दशा का अस्तित्व दर्शित करने वाले तथ्य तब सुसंगत है, जबकि ऐसी मन की या शरीर की या शारीरिक संवेदना की किसी ऐसी दशा का अस्तित्व विवाद्य या सुसंगत है |
स्पष्टीकरण 1 – जो तथ्य इस नाते सुसंगत है कि वह मन की सुसंगत दशा के अस्तित्व को दर्शित करता है, उससे यह दर्शित होना ही चाहिए कि मन कि वह दशा साधारणत: नहीं, अपितु प्रश्नगत विशिष्ट विषय के बारे में, अस्तित्व में हैं |
स्पष्टीकरण 2 – किंतु जब किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति के विचारण मे इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत उस अभियुक्त द्वारा किसी अपराध का कभी पहले किया जाना सुसंगत हो, तब ऐसे व्यक्ति कि पूर्व दोषसिद्धि भी सुसंगत तथ्य होगी |
दृष्टांत
(क) क चुराया हुआ माल यह जानते हुए कि वह चुराया हुआ है, प्राप्त करने का अभियुक्त है। यह साबित कर दिया जाता है कि उसके कब्जे में कोई विशिष्ट चुराई हुई चीज थी।
यह तथ्य कि उसी समय उसके कब्जे में कई अन्य चुराई हुई चीजें थी, यह दर्शित करने की प्रवृत्ति रखने वाला होने के नाते सुसंगत है कि जो चीजें उसके कब्जे में थीं उसमें से हर एक और सबके बारे में वह जानता था कि वह चुराई हुई हैं।
(ख) क पर किसी अन्य व्यक्ति को कूटकृत सिक्का कपटपूर्वक परिदान करने का अभियोग है, जिसे वह परिदान करते समय जानता था कि वह कूटकृत है।
यह तथ्य कि उसके परिदान के समय क के कब्जे में वैसे ही दूसरे कूटकृत सिक्के थे, सुसंगत है।
यह तथ्य कि क एक कूटकृत सिक्के को, यह जानते हुए कि वह सिक्का कूटकृत है, उसे असली के रूप में किसी अन्य व्यक्ति को परिदान करने के लिए पहले भी दोषसिद्ध हुआ था, सुसंगत है।
(ग) ख के कुत्ते द्वारा, जिसका हिंसक होना ख जानता था, किए गए नुकसान के लिए ख पर क वाद लाता है।
ये तथ्य कि कुत्ते ने पहले भ, म और य को काटा था और यह कि उन्होंने ख से शिकायतें की थीं, सुसंगत हैं।
(घ) प्रश्न यह है कि क्या विनिमय-पत्र का प्रतिग्रहीता क यह जानता था कि उसके पाने वाले का नाम काल्पनिक है। यह तथ्य कि क ने उसी प्रकार से लिखित अन्य विनियमयपत्रों को इसके पहले कि वे पाने वाले द्वारा, यदि पाने वाला वास्तविक व्यक्ति होता तो, उसको पारेषित किए जा सकते, प्रतिग्रहित किया था, यह दर्शित करने के नाते सुसंगत है कि क यह जानता था कि पाने वाला व्यक्ति काल्पनिक है।
(ङ) क पर ख की ख्याति को अपहानि करने के आशय से एक लांछन प्रकाशित करके ख की मानहानि करने का अभियोग है |
यह तथ्य कि ख के बारे में क ने पूर्व प्रकाशन किए, जिनसे ख के प्रति क का वैमनस्य दर्शित होता है,
इस कारण सुसंगत है कि उससे प्रश्नगत विशिष्ट प्रकाशन द्वारा ख की ख्याति की अपहानि करने का, क का आशय साबित होता है |
ये तथ्य कि क और ख के बीच पहले कोई झगड़ा नहीं हुआ और कि क ने परिवादगत बात को जैसा सुना था वैसा ही दुहरा दिया था, यह दर्शित करने के नाते कि क का आशय ख की ख्याति की अपहानि करना नहीं था, सुसंगत है।
(च) ख द्वारा क पर यह वाद लाया जाता है कि ग के बारे में क ने ख से कपटपूर्ण व्यपदेशन किया कि ग शोधक्षम है, जिससे उत्प्रेरित होकर ख ने ग का, जो दिवालिया था, भरोसा किया और हानि उठाई।
यह तथ्य कि जब क ने ग को शोधक्षम व्यपदिष्ट किया था, तब ग को उसके पड़ोसी और उससे व्यवहार करने वाले व्यक्ति शोधक्षम समझते थे, यह दर्शित करने के नाते कि क ने व्यपदेशन सद्भावपूर्वक किया था, सुसंगत है।
(छ) क पर ख उस काम की कीमत के लिए वाद लाता है, जो ठेकेदार ग के आदेश से किसी गृह पर, जिसका क स्वामी है, ख ने किया था।
क का प्रतिवाद है कि ख का ठेका ग के साथ था।
यह तथ्य कि क ने प्रश्नगत काम के लिए ग को कीमत दे दी, इसलिए सुसंगत है कि उससे यह साबित होता है कि क ने सद्भावपूर्वक ग को प्रश्नगत काम का प्रबंध दे दिया था, जिससे कि ख के साथ ग अपने ही निमित्त, न कि क के अभिकर्ता के रूप में, संविदा करने की स्थिति में था।
(ज) क ऐसी सम्पत्ति का, जो उसने पड़ी पाई थी, बेईमानी से दुर्विनियोग करने का अभियुक्त है और प्रश्न यह है कि क्या जब उसने उसका विनियोग किया, उसे सद्भावपूर्वक विश्वास था कि वास्तविक स्वामी मिल नहीं सकता। यह तथ्य कि संपत्ति के खो जाने की लोक-सूचना उस स्थान में, जहाँ क था, दी जा चुकी थी, यह दर्शित करने के नाते सुसंगत है कि क को सद्भावपूर्वक यह विश्वास नहीं था कि उस संपत्ति का वास्तविक स्वामी मिल नहीं सकता।
यह तथ्य कि क यह जानता था या उसके पास यह विश्वास करने का कारण था कि सूचना कपटपूर्वक ग द्वारा दी गई थी, जिसने संपत्ति की हानि के बारे में सुन रखा था और जो उस पर मिथ्या दावा करने का इच्छुक था, यह दर्शित करने के नाते सुसंगत है कि क का सूचना के बारे में ज्ञान क के सद्भाव को नासाबित नहीं करता।
(झ) क पर ख को मार डालने के आशय से उस पर असन करने का अभियोग है। क का आशय दर्शित करने के लिए यह तथ्य साबित किया जा सकेगा कि क ने पहले भी ख पर असन किया था।
(ञ) क पर ख को धमकी भरे पत्र भेजने का आरोप है। इन पत्रों का आशय दर्शित करने के नाते क द्वारा ख को पहले भेजे गए धमकी भरे पत्र साबित किए जा सकेंगे।
(ट) प्रश्न यह है कि क्या क अपनी पत्नी ख के प्रति क्रूरता का दोषी रहा है।
अभिकथित क्रूरता के थोड़ी देर पहले या पीछे उनकी एक दूसरे के प्रति भावना की अभिव्यक्तियां सुसंगत तथ्य हैं।
(ठ) प्रश्न यह है कि क्या क कि मृत्यु विष से कारित की गई थी।
अपनी रूग्णावस्था में क द्वारा अपने लक्षणों के बारे में किए हुए कथन सुसंगत तथ्य हैं।
(ड) प्रश्न यह है कि क के स्वास्थ्य की दशा उस समय कैसी थी जिस समय उसके जीवन का बीमा कराया गया था। प्रश्नगत समय पर या उसके लगभग अपने स्वास्थ्य की दशा के बारे में क द्वारा किए गए कथन सुसंगत तथ्य हैं।
(ढ) क ऐसी उपेक्षा के लिए ख पर वाद लाता है जो ख ने उसे युक्तियुक्त रूप से अनुपयोग्य गाड़ी भाड़े पर देने द्वारा, की जिससे क को क्षति हुई थी।
यह तथ्य कि उस विशिष्ट गाड़ी की त्रुटि की और अन्य अवसरों पर भी ख का ध्यान आकृष्ट किया गया था, सुसंगत है।
यह तथ्य कि ख उन गाड़ियों के बारे में, जिन्हें वह भाड़े पर देता था, अभ्यासतः उपेक्षावान था, विसंगत है।
(ण) क साशय असन द्वारा ख की मृत्यु करने के कारण हत्या के लिए विचारित है।
यह तथ्य कि क ने अन्य अवसरों पर ख पर असन किया था, क का ख पर असन करने का आशय दर्शित करने के नाते सुसंगत है।
यह तथ्य कि क लोगों पर उनकी हत्या करने के आशय से असन करने का अभ्यासी था, विसंगत है।
(त) क का किसी अपराध के लिए विचारण किया जाता है।
यह तथ्य कि उसने कोई बात कही जिससे उस विशिष्ट अपराध के करने का आशय उपदर्शित होता है, सुसंगत है।
यह तथ्य कि उसने कोई बात कही जिससे उस प्रकार के अपराध करने की उसकी साधारण प्रवृत्ति उपदर्शित होती है, विसंगत है।

15.कार्य आकस्मिक या साशय था , इस प्रश्न पर प्रकाश डालने वाले तथ्य – जबकि प्रश्न यह कि कार्य आकस्मिक या साशय था या किसी विशिष्ट ज्ञान या आशय से किया गया था, तब यह तथ्य कि ऐसा कार्य समरूप घटनओ कि आवली का भाग था जिनमें से हर एक घटना के साथ, वह कार्य करने वाला व्यक्ति संपृक्त था, सुसंगत है |
दृष्टांत
(क) क पर यह अभियोग है कि अपने गृह के बीमे का धन अभिप्राप्त करने के लिए उसने उसे जला दिया।
ये तथ्य कि क कई गृहों में एक के पश्चात् दूसरे में रहा जिनमें से हर एक का उसने बीमा कराया, जिनमें से हर एक में आग लगी और जिन अग्निकांडों में से हर एक के उपरान्त क को किसी भिन्न बीमा कार्यालय से बीमा धन मिला, इस नाते सुसंगत है कि उनसे यह दर्शित होता है कि वे अग्निकांड आकस्मिक नहीं थे।
(ख) ख के ऋणियों से धन प्राप्त करने के लिए क नियोजित है। क का यह कर्तव्य है कि बही में अपने द्वारा
प्राप्त राशियां दर्शित करने वाली प्रविष्टियां करे। वह एक प्रविष्टि करता है जिससे यह दर्शित होता है कि किसी विशिष्ट अवसर पर उसे वास्तव में प्राप्त राशि से कम राशि प्राप्त हुई।
प्रश्न यह है कि क्या यह मिथ्या प्रविष्टि आकस्मिक थी या साशय।
ये तथ्य कि उसी बही में क द्वारा की गई अन्य प्रविष्टियां मिथ्या हैं और कि हर एक अवस्था में मिथ्या
प्रविष्टि के के पक्ष में है, सुसंगत है।
(ग) ख को कपटपूर्वक कूटकृत रुपया परिदान करने का क अभियुक्त है।
प्रश्न यह है कि क्या रुपए का परिदान आकस्मिक था।
यह तथ्य कि ख को परिदान करने के तुरंत पहले या पीछे क ने ग, घ और ङ को कूटकृत रुपए परिदान किये थे इस नाते सुसंगत है कि उनसे यह दर्शित होता है कि ख को किया गया परिदान आकस्मिक नहीं था।

कारबार के अनुक्रम का अस्तित्व कब सुसंगत है – जबकि प्रश्न यह कि क्या कोई विशिष्ट कार्य किया गया था, तब कारबार के ऐसे किसी भी अनुक्रम का अस्तित्व, जिसक अनुसार वह कार्य स्वभावत: किया जाता, सुसंगत है |
दृष्टांत
(क) प्रश्न यह है कि क्या एक विशिष्ट पत्र प्रेषित किया गया था।
ये तथ्य कि कारबार का यह साधारण अनुक्रम था कि वे सभी पत्र,जो किसी खास स्थान में रख दिए जाते थे,
डाक में डाले जाने के लिए ले जाए जाते थे और कि वह पत्र उस स्थान में रख दिया गया था, सुसंगत है।
(ख) प्रश्न यह है कि क्या एक विशिष्ट पत्र क को मिला। ये तथ्य कि वह सम्यक् अनुक्रम में डाक में डाला गया था, और कि वह पुनः प्रेषण केन्द्र द्वारा लौटाया नहीं गया था, सुसंगत है।

स्वीकृतियाँ

  1. स्वीकृति की परिभाषा – स्वीकृति वह मौखिक या दस्तावेजी या इलेक्ट्रोनिक रूप में अन्तर्विष्ट कथन है, जो किसी विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य के बारे में कोई अनुमान इंगित करता है और जो ऐसे व्यक्तियों में से किसी के द्वारा और ऐसी परिस्थितियों में किया गया है जो एतस्मिन पश्चात वर्णित है|
  2. स्वीकृति कार्यवाही के पक्षकार या उसके अभिकर्ता द्वारा – वे कथन स्वीकृतियाँ हैं, जिन्हें कार्यवाही के किसी पक्षकार ने किया हो,या ऐसे किसी पक्षकार के ऐसे किसी अभिकर्ता ने किया हो जिसे मामले की परिस्थियों में न्यायालय उन कथनों को करने के लिए उस पक्षकार द्वारा अभिव्यक्त या विवक्षित रूप से प्राधिकृत किया हुआ मानता हैं|
    प्रतिनिधिक रूप से वादकर्ता द्वारा – वाद के ऐसे पक्षकारो द्वारा, जो प्रतिनिधित हैसियत में वाद ला रहे हों या जिन पर प्रतिनिधिक हैसियत में वाद लाया जा रहा हो, किए गए कथन, जब तक कि वे उस समय न किए गए हों जबकि उनको करने वाला पक्षकार वैसी हैसियत धारण करता था स्वीकृतियाँ नहीं हैं|
    वे कथन स्वीकृतियाँ, जो –
    1) विषय- वस्तु में हितबद्ध पक्षकार द्वारा – ऐसे व्यक्तियों द्वारा किए गए हैं, जिनका कार्यवाही की विषय वस्तु में कोई सांपतिक या धन संबंधी हित है और जो इस प्रकार हितबध्द व्यक्तियों की हैसियत में वह कथन करते है, अथवा
    2) उस व्यक्ति द्वारा जिससे हित व्युत्पन्न हुआ हों – ऐसे व्यक्तियों द्वारा किया गए हैं, जिनसे वाद के पक्षकारो का वाद की विषय वस्तु में अपना हित व्युत्पन्न हुआ है; यदि वे कथन उन्हें करने वाले व्यक्तियों के हित के चालू रहने के दौरान में किए गए है |
  3. उन व्यक्तियों द्वारा स्वीकृतियाँ जिनकी स्थिति वाद के पक्षकारो के विरुद्ध साबित की जानी चाहिए – वे कथन, जो उन व्यक्तियों द्वारा किए गए हैं जिनकी वाद के किसी पक्षकार के विरुद्ध स्थिति या दायित्व साबित करना आवश्यक हैं, स्वीकृतियाँ हैं, यदि ऐसे कथन ऐसे व्यक्तियों द्वारा, या उन पर लाए गए वाद में ऐसी स्थिति या दायित्व के संबंध में ऐसे व्यक्तियों के विरुद्ध सुसंगत होते और यदि वे उस समय किए गए हों जबकि उन्हें करने वाला व्यक्ति ऐसी स्थिति ग्रहण किए हुए है या ऐसे दायित्व के अधीन हैं |
    दृष्टांत
    ख के लिए भाटक संग्रह का दायित्व क लेता है।
    ग द्वारा ख को शोध्य भाटक संग्रह न करने के लिए क पर ख वाद लाता है।
    क इस बात का प्रत्याख्यान करता है कि ग से ख को भाटक देय था।
    ग द्वारा यह कथन कि उस पर ख को भाटक देय है स्वीकृति है, और यदि क इस बात से इंकार करता है कि ग द्वारा ख को भाटक देय था तो वह क के विरुद्ध सुसंगत तथ्य है।
  4. वाद के पक्षकार द्वारा अभिव्यक्त रूप से निर्दिष्ट व्यक्तियों द्वारा स्वीकृतियाँ – वे कथन जो उन व्यक्तियों द्वारा किए गए हैं जिनको वाद के किसी पक्षकार ने किसी विवादग्रस्त विषय के बारे में जानकारी के लिए अभिव्यक्त रूप से निर्दिष्ट किया हैं, स्वीकृतियाँ हैं|
    दृष्टांत
    प्रश्न यह है कि क्या क द्वारा ख को बेचा हुआ घोड़ा अच्छा है।
    ख से क कहता है कि “जाकर ग से पूछ लो, ग इस बारे में सबकुछ जानता है”। ग का कथन स्वीकृति है।
  5. स्वीकृतियों का उन्हें करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध और उनके द्वारा या उनकी ओर से साबित किया जाना – स्वीकृतियाँ उन्हें करने वाले व्यक्ति के या उसके हित प्रतिनिधि के विरुद्ध सुसंगत हैं और साबित की जा सकेंगी, किन्तु उन्हें करने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से या उसके हित प्रतिनिधि द्व्रारा निम्नलिखित अवस्थाओं में के सिवाय उन्हें साबित नहीं किया जा सकेगा |
    1) कोई स्वीकृति उसे करने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से तब साबित की जा सकेगी, जबकि वह इस प्रक्रति की है की यदि उसे करने वाला व्यक्ति मर गया होता, तो वह अन्य व्यक्तियों के बीच धारा 32 के अधीन सुसंगत होती |
    2) कोई स्वीकृति उसे करने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से तब साबित की जा सकेगी, जबकि वह मन की या शरीर की सुसंगत या विवाध किसी दशा के अस्तित्व का ऐसा कथन है जो उस समय या उसके लगभग किया गया था जब मन की या शरीर की ऐसी दशा विद्यमान थी और ऐसे आचरण के साथ है जो उनकी असत्यता को अनधिसंभाव्य कर देता है |
    3) कोई स्वीकृति उसे करने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से साबित की जा सकेगी, यदि वह स्वीकृति के रूप में नहीं, किन्तु अन्यथा सुसंगत है |
    दृष्टांत
    (क) क और ख के बीच प्रश्न यह है कि अमुक विलेख कूटरचित है या नहीं। क प्रतिज्ञात करता है कि वह असली है, ख प्रतिज्ञात करता है कि वह कूटरचित है।
    ख का कोई कथन कि विलेख असली है, क साबित कर सकेगा तथा क का कोई कथन कि विलेख कूटरचित है, ख साबित कर सकेगा। किन्तु क अपना यह कथन कि विलेख असली है साबित नहीं कर सकेगा और न ख ही अपना यह कथन कि विलेख कूटरचित है, साबित कर सकेगा।
    (ख) किसी पोत के कप्तान, क का विचारण उस पोत को संत्यक्त करने के लिए किया जाता है।
    यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य दिया जाता है कि पोत अपने उचित मार्ग से बाहर ले जाया गया था।
    क अपने कारबार के मामूली अनुक्रम में अपने द्वारा रखी जाने वाली वह पुस्तक पेश करता है जिसमें वे संप्रेषण दर्शित है, जिनके बारे में यह अभिकथित है कि वे दिन-प्रतिदिन किए गए थे और जिनसे उपदर्शित है कि पोत अपने उचित मार्ग से बाहर नहीं ले जाया गया था। क इन कथनों को साबित कर सकेगा क्योंकि, यदि उसकी मृत्यु हो गई होती तो वे कथन अन्य व्यक्तियों के बीच धारा 32, खण्ड (2) के अधीन ग्राह्य होते।
    (ग) क अपने द्वारा कलकत्ता में किए गए अपराध का अभियुक्त है।
    वह अपने द्वारा लिखित और उस दिन लाहौर में दिनांकित और उसी दिन का लाहौर डाक चिह्न धारण करने वाला पत्र पेश करता है।
    पत्र की तारीख का कथन ग्राह्य है क्योंकि, यदि क की मृत्यु हो गई होती तो वह धारा 32, खण्ड (2) के अधीन ग्राह्य होता।
    (घ) क चुराए हुए माल को यह जानते हुए कि वह चुराया हुआ है प्राप्त करने का अभियुक्त है।
    वह यह साबित करने की प्रस्थापना करता है कि उसने उसे उसके मूल्य से कम में बेचने से इंकार किया था। यद्यपि ये स्वीकृतियाँ हैं तथापि क इन कथनों को साबित कर सकेगा, क्योंकि ये विवाद्यक तथ्यों से प्रभावित उसके आचरण के स्पष्टीकारक हैं।
    (ङ) क अपने कब्जे में कूटकृत सिक्का जिसका कूटकृत होना वह जानता था, कपटपूर्वक रखने का अभियुक्त है।
    वह यह साबित करने की प्रस्थापना करता है कि उसने एक कुशल व्यक्ति से उस सिक्के की परीक्षा करने को कहा था, क्योंकि उसे शंका थी कि वह कूटकृत है या नहीं और उस व्यक्ति ने उसकी परीक्षा की थी और उसने कहा था कि वह असली है।
    अंतिम पूर्ववर्ती दृष्टांत में कथित कारणों से क इन तथ्यों को साबित कर सकेगा।
    22) दस्तावेजों की अंतर्वस्तू के बारे में मौखिक स्वीकृतियाँ कब सुसंगत होती हैं – किसी दस्तावेज की अंतर्वस्तू के बारे में मौखिक स्वीकृतियाँ तब सुसंगत नहीं होती, जब तक उन्हें साबित करने की प्रस्थापना करने वाला पक्षकार यह दर्शित न कर दे की ऐसी दस्तावेज की अंतर्वस्तूओं का द्वितीयक साक्ष्य देने का वह एतस्मिनपश्चात दिए हुए नियमों के अधीन हकदार है, अथवा जब तक पेशी की गयी दस्तावेज का असली होना प्रश्नगत न हो
    22 क . इलेक्ट्रानिक अभिलेखों की अंतर्वस्तू के बारे में मौखिक स्वीकृतियाँ कब सुसंगत होती है – इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों की अंतर्वस्तूओं के बारे में मौखिक स्वीकृतियाँ तब सुसंगत नही होती, यदि पेश की गई इलेक्ट्रानिक अभिलेख की असलीयत प्रश्नगत नहीं है |
  6. सिविल मामलों में स्वीकृतियाँ कब सुसंगत होती है – सिविल मामलों में कोई भी स्वीकृति सुसंगत नहीं है, यदि वह या तो इस अभिव्यक्त शर्त पर की गई हो की उसका साक्ष्य नही दिया जायगा या ऐसी परिस्थितियों के अधीन दी गई हो जिनसे न्यायालय यह अनुमान कर सके की पक्षकार इस बात पर परस्पर सहमत हो गए थे की उसका साक्ष्य नहीं दिया जाना चाहिय |
    स्पष्टीकरण – इस धारा की कोई भी बात किसी बैरिस्टर, प्लीडर, अटर्नी या वकील को किसी ऐसी बात का साक्ष्य देने से छूट देने वाली नहीं मानी जाएगी जिसका साक्ष्य देने के लिए धारा 126 के अधीन उसे विवश किया जा सकता है |
  7. उत्प्रेरणा , धमकी या वचन द्वारा कराई गई संस्वीकृति दांडिक कार्यवाही में कब विसंगत होती है – अभियुक्त व्यक्ति द्वारा की गई संस्वीकृती दांडिक कार्यवाही में विसंगत होती हैं, यदि उसके किए जाने के बारे में न्यायालय को प्रतीत होता हो की अभियुक्त व्यक्ति के विरुद्ध आरोप के बारे में वह ऐसी उत्प्रेरणा, धमकी या वचन द्वारा कराई गई है जो प्राधिकारवन् व्यक्ति की ओर से दिया गया है और जो न्यायलय की राय में इसके लिए पर्याप्त हो कि वह अभियुक्त व्यक्ति को यह अनुमान करने के लिए उसे युक्तियुक्त प्रतीत होने वाले आधार देती है कि उसके करने से वह अपने विरुद्ध कार्यवाहियों के बारे में ऐहिक रूप का कोई फायदा उठाएगा या ऐहिक रूप कि किसी बुराई का परिवर्जन कर लेना |
  8. पुलिस ऑफिसर से कि गई संस्वीकृति का साबित न किया जाना – किसी पुलिस ऑफिसर से कि गई कोई भी संस्वीकृति किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति के विरुद्ध साबित न कि जाएगी |
  9. पुलिस कि अभिरक्षा में होते हुए अभियुक्त द्वारा कि गई संस्वीकृति का उसके विरुद्ध साबित न किया जाना – कोई भी संस्वीकृति, जो किसी व्यक्ति ने उस समय कि हो जब वह पुलिस ऑफिसर कि अभिरक्षा में हो, ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध साबित न की जाएगी जब तक कि वह मजिस्ट्रेट की साक्षात् उपस्थिति में न की गई हो |
    स्पष्टीकरण – इस धारा में “मजिस्ट्रेट” के अंतर्गत फोर्ट सेंट जार्ज की प्रेसीडेंसी में या अन्यत्र मजिस्ट्रेट के कृत्य निर्वहन करने वाला ग्रामीण नही आता है, जब तक कि वह ग्रामीण कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर,1882 (1882 का 10 ) के अधीन मजिस्ट्रेट को शक्तियों का प्रयोग करने वाला मजिस्ट्रेट न हो |
  10. अभियुक्त से प्राप्त जानकारी में से कितनी साबित की जा सकेगी – परंतु जब किसी तथ्य के बारे में यह अभिसाक्ष्य दिया जाता है कि किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति से, जो पुलिस ऑफिसर की अभिरक्षा में हो, प्राप्त जानकारी के परिणामस्वरूप उसका पता चला है, तब ऐसी जानकारी में से, उतनी चाहे वह संस्वीकृति की कोटि में आती हो या नहीं, जितनी एतद्रद्वारा पता चले हुए तथ्य से स्पष्टतया संबंधित है, साबित की जा सकेगी |
  11. उत्प्रेरणा , धमकी या वचन से पैदा हुए मन पर प्रभाव के दूर हो जाने के पश्चात की गई संस्वीकृति सुसंगत है – यदि ऐसी कोई संस्वीकृति, जैसी धारा 24 में निर्दिष्ट है, न्यायालय की राय में उसके मन पर प्रभाव के, जो ऐसी किसी उत्प्रेरणा, धमकी वचन से कारित हुआ है, पूर्णत: दूर हो जाने के पश्चात की गई है, तो वह सुसंगत है|
    29 . अन्यथा सुसंगत संस्वीकृति को गुप्त रखने के वचन आदि के कारण विसंगत न हो जाना – यदि ऐसी संस्वीकृति अन्यथा सुसंगत है तो वह केवल इसलिए कि वह गुप्त रखने के वचन के अधीन या उसे अभिप्राप्त करने के प्रयोजनार्थ अभियुक्त व्यक्ति से कि गई प्रवंचना के परिणामस्वरूप, या उस समय जबकि वह मत्त था, कि गई थी अथवा इसलिए कि ऐसे प्रश्नों के, चाहे उनका रूप कैसा ही क्यों न रहा हो, उत्तर में की गई थी जिनका उत्तर देना उसके लिए आवश्यक नहीं था, अथवा केवल इसलिए कि उसे यह चेतावनी नहीं दी गई थी कि वह ऐसी संस्वीकृति करने के लिए आबध्द नहीं था और कि उसके विरुद्ध उसका साक्ष्य दिया जा सकेगा, विसंगत नहीं हो जाती |
  12. साबित संस्वीकृति को , जो उसे करने वाले व्यक्ति तथा एक ही अपराध के लिए संयुक्त रूप से विचारित अन्य को प्रभावित करती है , विचार में लेना – जबकि एक से अधिक व्यक्ति एक ही अपराध के लिए संयुक्त रूप से विचारित है तथा ऐसे व्यक्तियों में से किसी एक के द्वारा, अपने को और ऐसे व्यक्तियों में से किसी अन्य को प्रभावित करने वाली कि गई संस्वीकृति को साबित किया जाता है, तब न्यायालय ऐसी संस्वीकृति को ऐसे अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध तथा ऐसी संस्वीकृति करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध विचार में ले सकेगा |
    स्पष्टीकरण – इस धारा में प्रयुक्त ‘अपराध’ शब्द के अंतर्गत उस अपराध का दुष्प्रेरणा या उसे करने का प्रयत्न आता है |
    दृष्टांत

(क) क और ख को ग की हत्या के लिए संयुक्ततः विचारित किया जाता है। यह साबित किया जाता है कि क ने कहा, “ख और मैने ग की हत्या की है” ख के विरुद्ध इस संस्वीकृति के प्रभाव पर न्यायालय विचार कर सकेगा। |
(ख) ग की हत्या करने के लिए क का विचारण हो रहा है। यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य है कि ग की हत्या क और ख द्वारा की गई थी और यह कि ख ने कहा था कि “क और मैने ग की हत्या की है”। न्यायालय इस कथन को क के विरुद्ध विचारार्थ नहीं ले सकेगा, क्योंकि ख संयुक्ततः विचारित नहीं हो रहा है |

  1. स्वीकृतियाँ निश्चायक सबूत नहीं है , किंतु विबंध कर सकती है – संस्वीकृतियां, स्वीकृत विषयों का निश्चायक सबूत नहीं है, किंतु एतस्मिनपश्चात् अंतर्विष्ट उपबंधों के अधीन विबंध के रूप में प्रवर्तित हो सकेंगीं
    उन व्यक्तियों के कथन , जिन्हें साक्ष्य में बुलाया नहीं जा सकता
  2. वे दशाएँ जिनमें उस व्यक्ति द्वारा सुसंगत तथ्य का किया गया कथन सुसंगत है , जो मर गया है या जो मिल नहीं सकता , इत्यादि – सुसंगत तथ्यों के लिखित या मौखिक कथन, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा किए गए थे, जो मर गया है या मिल नहीं सकता है या जो साक्ष्य देने के लिए असमर्थ हो गया है या जिसकी हाजिरी इतने विलंब या व्यय के बिना उपाप्त नहीं की जा सकती, जितना मामले की परिस्थितियों में न्यायलय को अयुक्तियुक्त प्रतीत होती है,
    निम्नलिखित दशाओं में स्वंयमेव सुसंगत है –
    (1) जबकि वह मृत्यु के कारण से संबंधित है – जबकि वह कथन किसी व्यक्ति द्वारा अपनी मृत्यु के कारण के बारे में या उस संव्यवहार की किसी परस्थिति के बारे में किया गया है जिसके फलस्वरूप उसकी मृत्यु हुई, तब उन मामलों में, जिनमें उस व्यक्ति की मृत्यु का कारण प्रश्नगत हो,
    ऐसे कथन सुसंगत है, चाहे उस व्यक्ति को, जिसने उन्हें किया है, उस समय जब वे किए गए थे मृत्यु की प्रत्याशंका थी या नहीं और चाहे उसे कार्यवाही की, जिसमें उस व्यक्ति की मृत्यु का कारण प्रश्नगत होत है, प्रकृति कैसी ही क्यों न हो |
    (2) अथवा कारोबार के अनुक्रम में किया गया है – जबकि कथन ऐसे व्यक्ति द्वारा कारबार के मामूली अनुक्रम में किया गया था तथा विशेषत: जबकि वह, उसके द्वारा कारबार के मामूली अनुक्रम में या वृतिक कर्तव्य के निर्वहन में रखी जाने वाली पुस्तकों में उसके द्वारा की गई किसी प्रविष्टि या किए गए ज्ञापन के रूप में है, अथवा उसके द्वारा धन, माल, प्रतिभूतियों, या किसी भी किस्म की संपति की प्राप्ति की लिखित या हस्ताक्षरित अभिस्वीकृति है, अथवा वाणिज्य में उपयोग में आने वाली उसके द्वारा लिखित या हस्ताक्षरित किसी दस्तावेज के रूप में है अथवा किसी पत्र या अन्य दस्तावेज की तारीख के रूप में है, की उसके द्वारा प्राय: दिनांकित, लिखित या हस्ताक्षरित की जाती थी |
    (3) अथवा करने वाले के हित के विरुद्ध है – जबकि वह कथन उसे करने वाले व्यक्ति के धन संबंधी या सांपत्तिक हित के विरुद्ध है जबकि, यदि वह सत्य हो, तो उसके कारण उस पर दांडिक अभियोजन या नुकसानी का वाद लाया जा सकता है या लाया जा सकता था |
    (4) अथवा लोक अधिकार या रूढ़ि के बारे में या साधारण हित के विषयों के बारे के कोई राय देता है – जबकि उस कथन में उपर्युक्त व्यक्ति की राय किसी ऐसे लोक अधिकार या रूढ़ि अथवा लोक या साधारण हित के विषय के अस्तित्व के बारे में है, जिसके अस्तित्व से, यादि वह अस्तित्व में होता हो तो उससे उस व्यक्ति का अवगत होना संभाव्य होता और जबकि ऐसे कथन ऐसे किसी अधिकार, रूढ़ि या बात के बारे में किसी संविवाद के उत्पन्न होने से पहले किया गया था |
    (5) अथवा नातेदारी से अस्तित्व से संबंधित है – जबकि वह कथन किन्ही ऐसे व्यक्तियों के बीच रक्त, विवाह या दत्तक ग्रहण पर आधारित किसी नातेदारी के अस्तित्व के संबंध में है | जिन व्यक्तियों की रक्त विवाह या दत्तक ग्रहण पर आधारित नातेदारी के बारे में उस व्यक्ति के पास, जिसने वह कथन किया है, ज्ञान के विशेष साधन थे और जब कि वह कथन विवादग्रस्त प्रश्न के उठाये जाने से पूर्व किया गया था |
    (6) अथवा कौटुम्बिक बातों से संबंधित विल या विलेख में किया गया है – जबकि वह कथन मृत व्यक्तियों के बीच रक्त, विवाह या दत्तक ग्रहण पर आधारित किसी नातेदारी के अस्तित्व के संबंध में है और उस कुटुम्ब कि बातों से, जिसका ऐसी मृत व्यक्ति अंग था, संबंधी किसी विल या विलेख में या किसी कुटुम्ब वंशावली में या किसी समाधि- प्रस्त, कुटुम्ब – चित्र या अन्य चीजों पर, जिन पर ऐसे कथन प्राय: किए जाते है, किया गया है और जब कि ऐसा कथन विवादग्रस्त प्रश्न के उठाने जाने से पूर्व किया गया था |
    (7) अथवा धारा 13, खंड (क) में वर्णित संव्यवहार से संबंधित दस्तावेज में किया गया है – जबकि वह कथन किसी ऐसे विलेख विल या अन्य दस्तावेज में अंतर्विष्ट है, जो किसी ऐसे संव्यवहार से संबंधित है, जैसा धारा 13, खंड (क) में वर्णित है |
    (8) अथवा कई व्यक्तियों द्वारा किया गया है और प्रश्नगत बात से सुसंगत भावनाएँ अभिव्यक्त करता है – जबकि वह कथन कई व्यक्तियों द्वारा किया गया था और प्रश्नगत बात से सुसंगत उनकी भावनाओं या धारणाओं को अभिव्यक्त करता है |
    दृष्टांत

(क) प्रश्न यह है कि क्या क की हत्या ख द्वारा की गई थी, अथवा
क की मृत्यु किसी संव्यवहार में हुई क्षतियों से हुई है, जिसके अनुक्रम में उससे बलात्संग किया गया था। प्रश्न यह है कि क्या उससे ख द्वारा बलात्संग किया गया था, अथवा
प्रश्न यह कि क्या क, ख द्वारा ऐसी परिस्थितियों में मारा गया था कि क की विधवा द्वारा ख पर वाद लाया जा सकता है। |
अपनी मृत्यु के कारण के बारे में क द्वारा किए गए वे कथन जो उसने क्रमशः विचाराधीन हत्या, बलात्संग और अनुयोज्य दोष को निर्देशित करते हुए किए हैं, सुसंगत तथ्य हैं।
(ख) प्रश्न क के जन्म की तारीख के बारे में है।
एक मृत शल्य-चिकित्सक की अपने कारबार के मामूली अनुक्रम में नियमित रूप में रखी जाने वाली डायरी में इस कथन की प्रविष्टि कि अमुक दिन उसने क की माता की परिचर्या की और उसे पुत्र का प्रसव कराया, सुसंगत तथ्य है।
(ग) प्रश्न यह है कि क्या क अमुक दिन कलकत्ते में था।
कारबार के मामूली अनुक्रम में नियमित रूप से रखी गई मृत सोलिसिटर की डायरी में यह कथन कि अमुक दिन वह सोलिसिटर कलकत्ता में एक वर्णित स्थान पर विनिर्दिष्ट कारबार के बारे में विचार-विमर्श करने के प्रयोजनार्थ क के पास रहा, सुसंगत तथ्य है।
(घ) प्रश्न यह है कि क्या कोई पोत मुम्बई बंदरगाह से अमुक दिन रवाना हुआ।
किसी वाणिज्यिक फर्म के, जिसके द्वारा वह पोत भाड़े पर लिया गया था, मृत भागीदार द्वारा लंदन स्थित अपने सम्पर्कियों को जिन्हें वह स्थोरा परेषित किया गया था, यह कथन करने वाला पत्र कि पोत मुम्बई
बंदरगाह से अमुक दिन चल दिया, सुसंगत तथ्य है।
(ङ) प्रश्न यह है कि क्या क को अमुक भूमि का भाटक दिया गया था।
क के मृत अभिकर्ता का क के नाम पत्र जिसमें यह कथन है कि उसने क के निमित्त भाटक प्राप्त किया है। और वह उसे क के आदेशाधीन रखे हुए है, सुसंगत तथ्य है।
(च) प्रश्न यह है कि क्या क और ख का विवाह वैध रूप से हुआ था।
एक मृत पादरी का यह कथन कि उसने उनका विवाह ऐसी परिस्थितियों में कराया था, जिनमें उसका कराना अपराध होता है, सुसंगत है।
(छ) प्रश्न यह है कि क्या एक व्यक्ति क ने, जो मिल नहीं सकता अमुक दिन एक पत्र लिखा था। यह तथ्य कि उसके द्वारा लिखित एक पत्र पर उस दिन की तारीख दिनांकित है, सुसंगत है।
(ज) प्रश्न यह है कि किसी पोत के ध्वंस का कारण क्या है।
कप्तान द्वारा, जिसकी हाजिरी उपाप्त नहीं की जा सकती, दिया गया प्रसाक्ष्य सुसंगत तथ्य है।
(झ) प्रश्न यह है कि क्या अमुक सड़क लोक-मार्ग है।
ग्राम के मृत ग्रामीण क के द्वारा किया गया कथन कि वह सड़क लोक मार्ग है, सुसंगत तथ्य है।
(ञ) प्रश्न यह है कि विशिष्ट बाजार में अमुक दिन अनाज की क्या कीमत थी।
एक मृत बनिए द्वारा अपने कारबार के मामूली अनुक्रम में किया गया कीमत का कथन सुसंगत तथ्य है|
(ट) प्रश्न यह है कि क्या क, जो मर चुका है, ख का पिता था।
क द्वारा किया गया यह कथन कि ख उसका पुत्र है, सुसंगत तथ्य है।
(ठ) प्रश्न यह है कि क के जन्म की तारीख क्या है।
क के मृत पिता द्वारा किसी मित्र को लिखा हुआ पत्र, जिसमें यह बताया गया है कि क का जन्म अमुक
दिन हुआ, सुसंगत तथ्य है।
(ड) प्रश्न यह है कि क्या और कब क और ख का विवाह हुआ था।
ख के मृत पिता ग द्वारा किसी याददाश्त-पुस्तक में अपनी पुत्री का क के साथ अमुक तारीख को विवाह
होने की प्रविष्टि सुसंगत तथ्य है। |
(ढ) दुकान की खिड़की में अभिदर्शित रंगित उपहासांकन में अभिव्यक्त अपमान-लेख के लिए ख पर क वाद लाता है। प्रश्न उपहासांकन की समरूपता तथा उसके अपमान लेखीय प्रकृति के बारे में है। इन बातों पर दर्शकों की भीड़ की टिप्पणियाँ साबित की जा सकेंगी।

  1. किसी साक्ष्य में कथित तथ्यों की सत्यता को पश्चातवर्ती कार्यवाही में साबित करने के लिए उस साक्ष्य की सुसंगति – वह साक्ष्य, जो किसी साक्षी ने किसी न्यायिक कार्यवाही में, या विधि द्वारा उसे लेने के लिए प्राधिकृत किसी व्यक्ति के सक्षम दिया है, उन तथ्यों की सत्यता को, जो उस साक्ष्य में कथित है, किसी पश्चातवर्ती न्यायिक कार्यवाही में या उसी न्यायिक कार्यवाही के आगामी प्रक्रम में साबित करने के प्रयोजन के लिए तब सुसंगत है, जबकि वह साक्षी मर गया है या मिल नहीं सकता है या वह साक्ष्य देने के लिए असमर्थ है या प्रतिपक्षी द्वारा उसे पहुँच के बाहर कर दिया गया है अथवा यदि उसकी उपस्थिति इतने विलंब या व्यय के बिना, जितना कि मामले की परस्थितियों में न्यायलय अयुक्तियुक्त समझता है, अभिप्राप्त नहीं की जा सकती:
    परंतु वह तब जबकि –
    वह कार्यवाही उन्हें पक्षकारों या उनके हित प्रतिनिधियों के बीच में थी,
    प्रथम कार्यवाही में प्रतिपक्षी को प्रतिपरीक्षा का अधिकार और अवसर था,
    विवाध प्रश्न प्रथम कार्यवाही में सारत: वही थे जो द्रितीय कार्यवाही में है |
    स्पष्टीकरण – दांडिक विचारण या जांच इस धारा के अर्थ के अंतर्गत अभियोजक और अभियुक्त के बीच कार्यवाही समझी जाएगी |
    विशेष परिस्थितियों में किए गए कथन
  2. लेखा – पुस्तकों की प्रविष्टियाँ , जिनमें वे शामिल हैं , जिन्हें इलेक्ट्रोनिक रूप में रखा गया है कब सुसंगत हैं — कारबार के अनुक्रम में नियमित रूप से रखी गई लेखा-पुस्तकों की प्रविष्टियाँ, जिनमें वे शामिल हैं जिन्हें इलेक्ट्रोनिक रूप में रखा गया है जब कभी वे ऐसे विषय का निर्देश करती हैं जिसमें न्यायालय को जाँच करनी है, सुसंगत हैं, किन्तु अकेले ऐसे कथन ही किसी व्यक्ति को दायित्व से भारित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं होंगे |
    दृष्टांत

ख पर क 1,000 रुपयों के लिए वाद लाता है और अपनी लेखा बहियों की वे प्रविष्टियां दर्शित करता है, जिनमें ख को इस रकम के लिए उसका ऋणी दर्शित किया गया है। ये प्रविष्टियाँ सुसंगत हैं, किन्तु ऋण साबित करने के लिए अन्य साक्ष्य के बिना पर्याप्त नहीं है।

  1. कर्तव्य पालन में की गई लोक अभिलेख या इलेक्ट्रोनिक अभिलेख की प्रविष्टियों की सुसंगति — किसी लोक या अन्य राजकीय पुस्तक, रजिस्टर या अभिलेख या इलेक्ट्रोनिक अभिलेख में की गई प्रविष्टि, जो किसी विवाद्यक या सुसंगत तथ्य का कथन करती है और किसी लोक सेवक द्वारा अपने पदीय कर्तव्य के निर्वहन में या उस देश की, जिसमें ऐसी पुस्तक, रजिस्टर या अभिलेख या इलेक्ट्रोनिक अभिलेख रखा जाता है, विधि द्वारा विशेष रूप से व्यादिष्ट कर्तव्य पालन में किसी अन्य व्यक्ति द्वारा की गई है, स्वयं सुसंगत तथ्य है |
  2. मानचित्रों , चार्टों और रेखांकों के कथनों की सुसंगति — विवाद्यक तथ्यों या सुसंगत तथ्यों के वे कथन जो प्रकाशित मानचित्रों या चार्टों में लोक विक्रय के लिए साधारणतः प्रस्थापित किए जाते हैं अथवा केंद्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के प्राधिकार के अधीन बनाए गए मानचित्रों या रेखांकों में किए गए है, उन विषयों के बारे में जो ऐसे मानचित्रों, चार्टों, रेखांकों में प्रायः रूपित या कथित होते हैं, स्वयं सुसंगत तथ्य है |
  3. किन्ही अधिनियमों या अधिसूचनाओं में अंतर्विष्ट लोक प्रकृति के तथ्य बारे में सुसंगति – जबकि न्यायालय को किसी लोक प्रकृति के तथ्य के तथ्य के अस्तित्व के बारे में राय बनानी है तब यूनाइटेड किंगडम की पार्लियामेंट के एक्ट में किसी केन्द्रीय अधिनियम, प्रांतीय अधिनियम या राज्य अधिनियम में या शासकीय राजपत्र में प्रकाशित किसी सरकारी अधिसूचना या क्राउन रिप्रेजेंटेटिव द्वारा की गई अधिसूचना में या लन्दन गजट या हिज मैजिस्टी के किसी डोमिनियम, उपनिवेश या कब्ज़ाधीन क्षेत्र का सरकारी राजपत्र तात्पर्यित होने वाले किसी मुद्रित पत्र में अंतर्विष्ट परिवर्णन में किया गया, उसका कोई कथन सुसंगत तथ्य है |
  4. विधि की पुस्तकों में अंतर्विष्ट किसी विधि के कथनों की सुसंगति – जबकि न्यायालय को किसी देश की विधि के बारे में राय बनानी है तब ऐसा विधि का कोई भी कथन, जो ऐसी किसी पुस्तक में अंतर्विष्ट है, जो ऐसे देश की सरकार के प्राधिकार के अधीन मुद्रित या प्रकाशित और ऐसी किसी विधि को अंतर्विष्ट करने वाली तात्पर्यित है और ऐसे देश के न्यायालयों के किसी विनिर्णय की कोई रिपोर्ट, जो ऐसे विनिर्णयों की रिपोर्ट से तात्पर्यित होने वाली किसी पुस्तक में अंतर्विष्ट हैं, सुसंगत है
    किसी कथन में से कितना साबित किया जाये
  5. जबकि कथन किसी बातचीत , दस्तावेज , इलेक्ट्रोनिक अभिलेख , पुस्तक अथवा पत्रों या कागज – पत्रों की आवली का भाग हो , तब क्या साक्ष्य दिया जाए – जबकि कोई कथन, जिसका साक्ष्य दिया जाता है, किसी वृहतर कथन का या किसी बातचीत का भाग है या किसी एकल दस्तावेज का भाग है या किसी ऐसी दस्तावेज में अंतर्विष्ट है, जो किसी पुस्तक का अथवा पत्रों या कागज-पत्रों की संसक्त आवली का भाग है या इलेक्ट्रोनिक अभिलेख के भाग में अंतर्विष्ट है, तब उस कथन, बातचीत, दस्तावेज, इलेक्ट्रोनिक अभिलेख, पुस्तक अथवा पत्रों या कागज-पत्रों की आवली के उतने का ही, न कि उतने से अधिक का साक्ष्य दिया जाएगा, जितना न्यायालय उस कथन की प्रकृति और प्रभाव को तथा उन परिस्थितियों को, जिनके अधीन वह किया गया था, पूर्णतः समझने के लिए उस विशष्ट मामले में आवश्यक विचार करता है |
    न्यायालयों के निर्णय कब सुसंगत है
  6. द्वितीय वाद या विचारण के वारणार्थ पूर्व निर्णय सुसंगत है – किसी ऐसे निर्णय, आदेश या डिक्री का अस्तित्व, जो किसी न्यायालय को किसी वाद के संज्ञान से या कोई विचारण करने से विधि द्वारा निवारित करता है, सुसंगत तथ्य है जबकि प्रश्न यह हो कि क्या ऐसे न्यायालय को ऐसे वाद का संज्ञान या विचारण करना चाहिए |
  7. प्रोबेट इत्यादि विषयक अधिकारिता के किन्ही निर्णयों की सुसंगति – किसी सक्षम न्यायालय के प्रोबेट विषयक, विवाह-विषयक, नावधिकरण-विषयक या दिवाला अधिकारिता के प्रयोग में दिया हुआ अंतिम निर्णय, आदेश या डिक्री, जो किसी व्यक्ति को, या से, कोई वैधिक हैसियत प्रदान करती या ले लेती है या जो सर्वत: न कि किसी विनिर्दिष्ट व्यक्ति के विरुद्ध किसी व्यक्ति को, ऐसी हैसियत का हक़दार या किसी विनिर्दिष्ट चीज का हक़दार घोषित करती है, तब सुसंगत है जबकि किसी विधिक हैसियत, या किसी ऐसी चीज पर ऐसे व्यक्ति के हक का अस्तित्व सुसंगत है |
    ऐसे निर्णय, आदेश या डिक्री इस बात का निश्चायक सबूत है-
    कि कोई विधिक हैसियत, जो वह प्रदत्त करती है, उस समय प्रोदभूत हुई जब ऐसा निर्णय, आदेश या डिक्री प्रवर्त्तन में आयी,
    कि कोई विधिक हैसियत, जिसके लिए वह किसी व्यक्ति को हक़दार घोषित करती है, उस व्यक्ति को उस समय प्रोदभूत हुई जो समय ऐसे निर्णय, आदेश या डिक्री द्वारा घोषित है कि उस समय यह व्यक्ति को प्रोदभूत हुई,
    कि कोई विधिक हैसियत, जिसे वह किसी ऐसे व्यक्ति से ले लेती है उस समय खत्म हुई जो उस समय ऐसे निर्णय, आदेश या डिक्री द्वारा घोषित है कि उस समय से वह हैसियत खत्म हो गई थी या खत्म हो जानी चाहिए |
    और कि कोई चीज, जिसके लिए वह किसी व्यक्ति को ऐसा हक़दार घोषित करती है उस व्यक्ति की उस समय संपत्ति थी जो समय ऐसे निर्णय, आदेश या डिक्री द्वारा घोषित है किस उस समय से वह चीज उसकी संपत्ति थी या होनी चाहिए |
  8. धारा 41 में वर्णित से भिन्न निर्णयों आदेशो या डिक्रियो की सुसंगति और प्रभाव – वे निर्णय, आदेश या डिक्रियाँ जो धारा 41 में वर्णित से भिन्न है यदि वे जाँच में सुसंगत लोक प्रकृति की बातों से संबंधित है, तो वे सुसंगत है किन्तु ऐसे निर्णय, आदेश या डिक्रियाँ उन बातों का निश्चायक सबूत नहीं है जिनका वे कथन करती है |
    दृष्टांत

क अपनी भूमि पर अतिचार के लिए ख पर वाद लाता है। ख उस भूमि पर मार्ग के लोक अधिकार का अस्तित्व अभिकथित करता है जिसका क प्रत्याख्यान करता है।
क द्वारा ग के विरुद्ध उसी भूमि पर अतिचार के लिए वाद में, जिसमें ग ने उसी मार्गाधिकार का अस्तित्व अभिकथित किया था, प्रतिवादी के पक्ष में डिक्री का अस्तित्व सुसंगत है, किन्तु वह इस बात का निश्चायक सबूत नहीं है कि वह मार्गाधिकार अस्तित्व में है।

  1. धाराओं 40,41 और 42 में वर्णित से भिन्न निर्णय आदि कब सुसंगत है – धाराएँ 40,41 और 42 में वर्णित से भिन्न निर्णय, आदेश या डिक्रियां विसंगत है जब तक कि वे ऐसे निर्णय, आदेश या डिक्री का अस्तित्व विवाद्यक तथ्य न हो, या वह इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध के अंतर्गत सुसंगत न हो |
    दृष्टांत

(क) क और ख किसी अपमान लेख के लिए जो उनमें से हर एक पर लांछन लगाता है, ग पर पृथक्-पृथक् वाद लाते हैं। हर एक मामले में ग कहता है कि वह बात, जिसका अपमान-लेखीय होना अभिकथित है, सत्य है और परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि वह अधिसंभाव्यत: या तो हर एक मामले में सत्य है या किसी में नहीं। ग के विरुद्ध क इस आधार पर कि ग अपना न्यायोचित साबित करने में असफल रहा नुकसानी की डिक्री अभिप्राप्त करता है। यह तथ्य ख और ग के बीच विसंगत है।
(ख) क अपनी पत्नी ग के साथ जारकर्म करने के लिए ख का अभियोजन करता है।
ख इस बात का प्रत्याख्यान करता है कि ग क की पत्नी है, किन्तु न्यायालय ख को जारकर्म के लिए दोषसिद्ध करता है।
तत्पश्चात् क के जीवनकाल में ख के साथ विवाह करने पर द्वि-विवाह के लिए ग अभियोजित की जाती है। ग कहती है कि वह क की पत्नी कभी नहीं थी।
ख के विरुद्ध दिया गया निर्णय ग के विरुद्ध विसंगत है।
(ग) ख का अभियोजन क इसलिए करता है कि उसने क की गाय चुराई है। ख दोषसिद्ध किया जाता है।
तत्पश्चात् क उस गाय के लिए जिसे ख ने दोषसिद्ध होने से पूर्व ग को बेच दिया था, ग पर वाद लाता है। ख के विरुद्ध वह निर्णय क और ग के बीच विसंगत है।
(घ) क ने ख के विरुद्ध भूमि के कब्जे की डिक्री अभिप्राप्त की है। ख का पुत्र ग परिणामस्वरूप क की हत्या करता है।
उस निर्णय का अस्तित्व अपराध का हेतु दर्शित करने के नाते सुसंगत है।
(ङ) क पर चोरी का और चोरी के लिए पूर्व दोषसिद्धि का आरोप है। पूर्व दोषसिद्धि विवाद्यक तथ्य होने के नाते सुसंगत है
(च) ख की हत्या के लिए क विचारित किया जाता है। यह तथ्य कि ख ने क पर अपमान लेख के लिए अभियोजन चलाया था और क दोषसिद्ध और दण्डित किया गया था, धारा 8 के अधीन विवाद्यक तथ्य का हेतु दर्शित करने के नाते सुसंगत है।

  1. निर्णय अभिप्राप्त करने में कपट या दुस्संधि अथवा न्यायालय की अक्षमता साबित की जा सकेगी – वाद या अन्य कार्यवाही का कोई भी पक्षकार यह दर्शित कर सकेगा कि कोई निर्णय, आदेश या डिक्री जो धारा 40,41 या 42 के अधीन सुसंगत है और जो प्रतिपक्षी द्वारा साबित की जा चुकी है, ऐसे न्यायालय द्वारा दी गई थी जो उसे देने के लिए अक्षम था, या कपट या दुस्संधि द्वारा अभिप्राप्त की गई थी |
    अन्य व्यक्तियों की रायें कब तक सुसंगत है
  2. विशेषज्ञों की रायें – जबकि न्यायालय को विदेशी विधि की या विज्ञान की या कला की किसी बात पर हस्तलेख या अंगुली चिन्हों की अनन्यता के बारे में राय बनानी हो तो तब उस बात पर ऐसी विदेशी विधि विज्ञान या कला में या हस्तलेख या अंगुली चिन्हों की अनन्यता विषयक प्रश्नों में विशेष कुशल व्यक्तियों की रायें सुसंगत तथ्य है |
    ऐसे व्यक्ति विशेषज्ञ कहलाते है |
    दृष्टांत

(क) प्रश्न यह है कि क्या क की मृत्यु विष द्वारा कारित हुई।
जिस विष के बारे में अनुमान है कि उससे क की मृत्यु हुई है, उस विष से पैदा हुए लक्षणों के बारे में विशेषज्ञों की रायें सुसंगत हैं।
(ख) प्रश्न यह है कि क्या क अमुक कार्य करने के समय चित्तविकृति के कारण उस कार्य की प्रकृति, या यह कि जो कुछ वह कर रहा है वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है, जानने में असमर्थ था। इस प्रश्न पर विशेषज्ञों की रायें सुसंगत हैं कि क्या क द्वारा प्रदर्शित लक्षणों से चित्तविकृति सामान्यतः दर्शित होती है तथा क्या ऐसी चित्तविकृति लोगों को उन कार्यों की प्रकृति जिन्हें वे करते हैं, या वह कि जो कुछ वे कर रहे हैं वह या तो दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है, जानने में प्रायः असमर्थ बना देती है।
(ग) प्रश्न यह है कि क्या अमुक दस्तावेज क द्वारा लिखी गई थी। एक अन्य दस्तावेज पेश की जाती है जिसका क द्वारा लिखा जाना साबित या स्वीकृत है। इस प्रश्न पर विशेषज्ञों की रायें सुसंगत हैं कि क्या दोनों दस्तावेजें एक ही व्यक्ति द्वारा या विभिन्न व्यक्तियों द्वारा लिखी गई थीं।
45 क . इलेक्ट्रोनिक साक्ष्य के परीक्षक की राय – जब न्यायालय को किसी कार्यवाही में किसी कम्प्युटर साधन या किसी अन्य इलेक्ट्रोनिक या अंकीय रूप में पारेषित या भंडारित किसी सूचना से संबंधित किसी विषय पर कोई राय बनानी होती है तब सूचना प्रौधोगिकी अधिनियम, 2000 (2000 क 21) की धारा 79 क में निर्दिष्ट इलेक्ट्रोनिक साक्ष्य के परीक्षक की राय सुसंगत तथ्य है |
स्पष्टीकरण – इस धारा के प्रयोजन के लिए, इलेक्ट्रोनिक साक्ष्य का कोई परीक्षक, विशेषज्ञ होगा|

  1. विशेषज्ञों की रायों से संबंधित तथ्य – वे तथ्य, जो अन्यथा सुसंगत नहीं है सुसंगत होते हैं यदि वे विशेषज्ञों की रायों क समर्थन करते हों या उनसे असंगत हो जबकि ऐसी राये सुसंगत हो |
    दृष्टांत

(क) प्रश्न यह है कि क्या क को अमुक विष दिया गया था।
यह तथ्य सुसंगत है कि अन्य व्यक्तियों में भी, जिन्हें वह विष दिया गया था, अमुक लक्षण प्रकट हुए थे,
जिनका उस विष के लक्षण होना विशेषज्ञ प्रतिज्ञात या प्रत्याख्यात करते हैं।
(ख) प्रश्न यह है कि क्या किसी बंदरगाह में कोई बाधा अमुक समुद्र-भित्ति से कारित हुई है।
यह तथ्य सुसंगत है कि अन्य बंदरगाह, जो अन्य दृष्टियों से वैसे ही स्थित थे, किन्तु जहां ऐसी समुद्र भित्तियां नहीं थीं, लगभग उसी समय बाधित होने लगे थे।

  1. हस्तलेख के बारे में राय कब सुसंगत हैं – जबकि न्यायालय को राय बनानी हो की कोई दस्तावेज किस व्यक्ति ने लिखी या हस्ताक्षरित की थी, तब उस व्यक्ति के हस्तलेख से, जिसके द्वारा वह लिखी या हस्ताक्षरित की गई अनुमानित की जाती है, परिचित किसी व्यक्ति की यह राय कि वह उस व्यक्ति द्वारा लिखी या हस्ताक्षरित की गई थी| अथवा लिखी या हस्ताक्षरित नहीं की गई थी, सुसंगत तथ्य है |
    स्पष्टीकरण – कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के हस्तलेख से परिचित तब कहा जाता है जबकि उसने उस व्यक्ति को लिखते देखा है या जबकि स्वयं अपने द्वारा या अपने प्राधिकार के अधीन लिखित और उस व्यक्ति को संबोधित दस्तावेज के उत्तर में उस व्यक्ति द्वारा लिखी हुई तात्पर्यित होने वाली दस्तावेजें प्राप्त की हैं, या जबकि कारबार के मामूली अनुक्रम में उस व्यक्ति द्वारा लिखी हुई तात्पर्यित होने वाली दस्तावेजें उसके समक्ष बराबर रखी जाती रही हैं |
    दृष्टांत

प्रश्न यह है कि क्या अमुक पत्र लन्दन के एक व्यापारी क के हस्तलेख में है।
ख कलकत्ते में एक व्यापारी है जिसने क को पत्र संबोधित किए हैं तथा उसके द्वारा लिखे हुए तात्पर्यित होने वाले पत्र प्राप्त किए हैं। ग, ख का लिपिक है, जिसका कर्तव्य ख के पत्र व्यवहार को देखना और फाइल करना था। ख का दलाल घ है जिसके समक्ष क द्वारा लिखे गए तात्पर्यित होने वाले पत्रों को उनके बारे में उससे सलाह करने के लिए ख बराबर रखा करता था।
ख, ग और घ की इस प्रश्न पर राय कि क्या वह पत्र क के हस्तलेख में है सुसंगत है, यद्यपि न तो ख ने, न ग ने, न घ ने, क को लिखते हुए कभी देखा था।
47- क . इलेक्ट्रोनिक चिन्हक के बारे में राय कब सुसंगत है – जब न्यायालय को किसी व्यक्ति के इलेक्ट्रोनिक चिन्हक के बारे में राय बनानी हो, तब उस प्रमाणकर्ता प्राधिकारी की राय, जिसने इलेक्ट्रोनिक चिन्हक प्रमाणपत्र जारी किया है, सुसंगत तथ्य है|

  1. अधिकार या रुढ़ि के अस्तित्व के बारे में रायें कब सुसंगत हैं – जबकि न्यायालय को किसी साधारण रूढ़ि या अधिकार के अस्तित्व के बारे में राय बनानी हो, तब ऐसी रूढ़ि या अधिकार के अस्तित्व के बारे में उन व्यक्तियों की रायें सुसंगत हैं, जो यदि उसका अस्तित्व होता तो संभाव्य: उसे जानते होते |
    स्पष्टीकरण – “साधारण रुढ़ि या अधिकार” के अंतर्गत ऐसी रुढियाँ या अधिकार आते हैं जो व्यक्तियों के किसी काफी बड़े वर्ग के लिए सामान्य हैं |
    दृष्टांत

किसी विशिष्ट ग्राम के निवासियों का अमुक कूप के पानी का उपयोग करने का अधिकार इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत साधारण अधिकार है।

  1. प्रथाओं , सिद्धांतों आदि के बारे में रायें कब सुसंगत है – जबकि न्यायालय को, मनुष्यों के किसी निकाय या कुटुम्ब की प्रथाओं या सिद्धांतों के, किसी धार्मिक या खैराती प्रतिष्ठान के संविधान और शासन के, अथवा विशिष्ट जिले में विशष्ट वर्गों के लोगों द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले शब्दों या पदों के अर्थो के बारे में राय बनानी हो तब उनके संबंध में ज्ञान के विशेष साधन रखने वाले व्यक्तियों की रायें सुसंगत तथ्य है |
  2. नातेदारी के बारे में राय कब सुसंगत हैं – जबकि न्यायालय को एक व्यक्ति की किसी अन्य के साथ नातेदारी के बारे राय बनानी हो, तब ऐसी नातेदारी के अस्तित्व के बारे में ऐसे किसी व्यक्ति के आचरण द्वारा अभिव्यक्त राय जिसके कुटुम्ब के सदस्य के रूप में या अन्यथा उस विषय के संबंध में ज्ञान के विशेष साधन है, सुसंगत तथ्य है |
    परंतु भारतीय विवाह विच्छेद अधिनियम, 1869 (1869 का 4) के अधीन कार्यवाहियों में या भारतीय दंड संहिता, (1860 का 45) की धारा 494,495,497 या 498 के अधीन अभियोजना में ऐसी राय विवाह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं होगी
    दृष्टांत

(क) प्रश्न यह है कि क्या क और ख विवाहित थे।
यह तथ्य कि वे अपने मित्रों द्वारा पति और पत्नी के रूप में प्रायः स्वीकृत किए जाते थे और उनसे वैसा बर्ताव किया जाता था, सुसंगत है।
(ख) प्रश्न यह है कि क्या क ख का धर्मज पुत्र है। यह तथ्य कि कुटुम्ब के सदस्यों द्वारा क से सदा उस रूप में बर्ताव किया जाता था, सुसंगत है।

  1. राय के आधार कब सुसंगत है – जब कभी किसी जीवित व्यक्ति की राय सुसंगत है तब वे आधार भी, जिन पर वह आधारित है, सुसंगत है |
    दृष्टांत

कोई विशेषज्ञ अपनी राय बनाने के प्रयोजनार्थ किए हुए प्रयोगों का विवरण दे सकता है।
शील कब सुसंगत है

  1. सिविल मामलों में अध्यारोपित आचरण साबित करने के लिए शील विसंगत है – सिविल मामलों में यह तथ्य कि किसी सम्प्रक्त व्यक्ति का शील ऐसा है कि जो उस पर अध्यारोपित किसी आचरण को अधिसंभाव्य या अनधिसंभाव्य बना देता है, विसंगत है वहां तक के सिवाय जहाँ तक कि ऐसा शील अन्यथा सुसंगत तथ्यों से प्रकट होता है |
  2. दांडिक मामलों में पुर्वंतन अच्छा शील सुसंगत हैं – दांडिक कार्यवाही में यह तथ्य सुसंगत है कि अभियुक्त व्यक्ति अच्छे शील का है |
    53 क. कतिपय मामलों में शील या पूर्व लैगिक अनुभव के साक्ष्य क सुसंगत न होना – भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 354, धारा 354क, धारा 354ख, धारा 354ग,धारा 354घ, धारा 376, धारा 376क, धारा 376ख, धारा 376ग, धारा 376घ या धारा 376ड, के अधीन किसी अपराध के लिए किसी अभियोजन में या किसी ऐसे अपराघ के करने के प्रयत्न के लिए, जहाँ सम्मति का प्रश्न विवाध है, वहां पीडिता के शील या ऐसे व्यक्ति का किसी व्यक्ति के साथ पूर्व लैगिक अनुभव का साक्ष्य ऐसी सम्मति या सम्मति की गुणता के मुद्दे पर सुसंगत नहीं होगा |
  3. उत्तर में होने के सिवाय पूर्वतन बुरा शील सुसंगत नहीं है – दांडिक कार्यवहियों में यह तथ्य कि अभियुक्त व्यक्ति बुरे शील का हैं, विसंगत है, जब तक कि इस बात का साक्ष्य न दिया गया हो कि वह अच्छे शील का है जिसके दिए जाने की दशा में वह सुसंगत हो जाता हैं |
    स्पष्टीकरण 1- यह धारा उन मामलों में लागू नहीं है जिनमें किसी व्यक्ति का बुरा शील स्वयं विवाद्यक तथ्य है |
    स्पष्टीकरण 2- पूर्व दोषसिध्दि बुरे शील के साक्ष्य के रूप में सुसंगत है |
  4. नुकसानी पर प्रभाव डालने वाला शील – सिविल मामलों में, यह तथ्य कि किसी व्यक्ति का शील ऐसा है जिसमे नुकसानी की रकम पर, जो उसे मिलनी चाहिए, प्रभाव पड़ता है, सुसंगत है |
    स्पष्टीकरण – धारा 52,53,54 और 55 में ‘शील’ शब्द के अंतर्गत ख्याति और स्वाभाव दोनों आते है | किंतु धारा 54 में यथा उपबंधित के सिवाय केवल साधारण ख्याति व साधारण स्वभाव का ही, न कि ऐसे विशिष्ट कार्यों का, जिनके द्वारा ख्याति या स्वभाव दर्शित हुए थे, साक्ष्य दिया जा सकेगा |
    भाग 2
    सबूत के विषय में
    अध्याय 3
    तथ्य , जिनका साबित किया जाना आवश्यक नहीं है
  5. न्यायिक रूप से अपेक्षणीय तथ्य साबित करना आवश्यक नहीं है – जिस तथ्य की न्यायालय न्यायिक अवेक्षा करेगा, उसे साबित करना आवश्यक नहीं है |
  6. वे तथ्य जिनकी न्यायिक अवेक्षा न्यायालय को करनी होगी – न्यायालय निम्नलिखित तथ्यों की न्यायिक अवेक्षा करेगा-
    (1) भारत के राज्यक्षेत्र में प्रवृत समस्त विधियाँ,
    (2) यूनाइटेड किंगडम की पार्लियामेंट द्वारा पारित या एतत्पश्चात पारित किए जाने वाले समस्त पब्लिक एक्ट तथा वे समस्त स्थानीय और पर्सनल एक्ट जिनके बारे में यूनाइटेड किंगडम की पार्लियामेंट ने निर्दिष्ट किया है कि उनकी न्यायिक अवेक्षा की जाय,
    (3) भारतीय सेना, नौसेना या वायुसेना के लिए युध्द की नियमावली,
    (4) यूनाइटेड किंगडम पार्लियामेंट की, भारत की, संविधान सभा की, संसद की तथा किसी प्रांत या राज्यों में तत्समय प्रवृत विधियों के अधीन स्थापित विधान मंडलों की कार्यवाही का अनुक्रम,
    (5) ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैंड की यूनाइटेड किंगडम के तत्समय प्रभु का राज्यारोहण और राज्यहस्ताक्षर,
    (6) वे सब मुद्राएँ, जिनकी अंग्रेजी न्यायालय न्यायिक अवेक्षा करते हैं, भारत में के सब न्यायालयों की ओर से केन्द्रीय सरकार या क्राउन रिप्रेजेंटेटिव के प्राधिकार द्वारा भारत के बाहर स्थापित सब न्यायालयों की मुद्राएँ नावधिकरण ओर समुद्रीय अधिकारिता वाले न्यायालयों की और नोटरीज पब्लिक की मुद्राएँ और वे सब मुद्राएं जिनका कोई व्यक्ति संविधान या यूनाइटेड किंगडम की पार्लियामेंट के किसी एक्ट या भारत में विधि का बल रखने वाले अधिनियम या विनियम द्वारा उपयोग करने के लिए प्राधिकृत है,
    (7) किसी राज्य में किसी लोकपद पर तत्समय आरुढ़ व्यक्तियों के कोई पदारोहण, नाम, उपाधियों, कृत्य और हस्ताक्षर यदि ऐसे पद की पद पर उनकी नियुक्ति का तथ्य किसी शासकीय राज्य पत्र में अधिसूचित किया गया हो;
    (8) भारत सरकार द्वारा मान्यता पर हर राज्य या प्रभु का अस्तित्व, उपाधि और राष्ट्रीय ध्वज;
    (9) समय के प्रभाग, पृथ्वी के भौगोलिक प्रभाग तथा शासकीय राज्य पत्र में अधिसूचित लोक उत्सव, उपवास और अवकाश- दिन;
    (10) भारत सरकार के अधिपत्य के अधीन राज्य क्षेत्र;
    (11) भारत सरकार और अन्य किसी राज्य या व्यक्तियों के निकाय के बीच संधर्ष का प्रारंभ, चालू रहना और पर्यवसान;
    (12) न्यायालय के सदस्यों और ऑफिसरो के तथा उनके उपपदियों और अधीनस्थ ऑफिसरो और सहायकों और उसकी अदेशिकाओं के निष्पादन में कार्य करने वाले सब ऑफिसरों के भी, तथा सब अधिवक्ताओं, अटर्नियों, प्रोक्टरों, वकीलों, प्लीडरों और उसके समक्ष उपसंजात होने या कार्य करने के लिए किसी विधि द्वारा प्राधिकृत अन्य व्यक्तियों के नाम;
    (13) भूमि या समुद्र पर मार्ग का नियम |
    इन सभी मामलों में तथा लोक इतिहास, साहित्य, विज्ञान या कला के सब विषयों में भी न्यायालय समुपयुक्त निर्देश पुस्तकों या दस्तावेजों की सहायता ले सकेगा |
    यदि न्यायालय से किसी तथ्य की न्यायिक अवेक्षा करने को किसी व्यक्ति द्वारा प्रार्थना की जाती हैं, तो यदि और जब तक वह व्यक्ति कोई ऐसी पुस्तक या दस्तावेज पेश न कर दे, जिसे ऐसा न्यायालय अपने को ऐसा करने को समर्थ बनाने के लिए आवश्यक समझता है, न्यायालय ऐसा करने से इंकार कर सकेगा |
  7. स्वीकृत तथ्यों को साबित करना आवश्यक नहीं हैं – किसी ऐसे तथ्य को किसी कार्यवाही में साबित करना आवश्यक नहीं हैं, जिसे उस कार्यवाही के पक्षकार या उनके अभिकर्ता सुनवाई पर स्वीकार करने के लिए सहमत हो जाते हैं या जिसे सुनवाई के पूर्व किसी स्व-हस्ताक्षरित लेख द्वारा स्वीकार करने के लिए सहमत हो जाते हैं या जिसके बारे में अभिवचन संबंधी किसी तत्समय प्रवृत्त नियम के अधीन यह समझ लिया जाता है कि उन्होंने उसे अपने अभिवचनों द्वारा स्वीकार कर लिया हैं:
    परंतु न्यायालय स्वीकृत तथ्यों को ऐसी स्वीकृतियों द्वारा साबित किए जाने से अन्यथा साबित किया जाना अपने विवेकानुसार अपेक्षित कर सकेगा |
    अध्याय 4
    मौखिक साक्ष्य के विषय में
  8. मौखिक साक्ष्य द्वारा तथ्यों का साबित किया जाना – दस्तावेजों या इलेक्ट्रोनिक अभिलेख की अंतर्वस्तु के सिवाय सभी तथ्य मौखिक साक्ष्य द्वारा साबित किए जा सकेंगे |
  9. मौखिक साक्ष्य प्रत्यक्ष होना चाहिए – मौखिक साक्ष्य, समस्त अवस्थाओं में, चाहे वे कैसी ही हो प्रत्यक्ष ही होगा, अर्थात-
    यदि वह किसी देखे जा सकने वाले तथ्य के बारे में हैं, तो वह ऐसे साक्षी का ही साक्ष्य होगा जो कहता हैं कि उसने उसे देखा;
    यदि वह किसी सुने जा सकने वाले तथ्य के बारे में हैं, तो वह ऐसे साक्षी का ही साक्ष्य होगा जो कहता है कि उसने उसे सुना;
    यदि वह किसी ऐसे तथ्य के बारे में हैं जिसका किसी अन्य इन्द्रिय द्वारा या किसी अन्य रीति से बोध हो सकता था, तो वह ऐसे साक्षी का ही साक्ष्य होगा जो कहता हैं कि उसने उसका बोध उस इन्द्रिय द्वारा या उस रीति से किया;
    यदि वह किसी राय के, या उन अधिकारों के, जिन पर वह राय धारित हैं, बारे में हैं, तो वह उस व्यक्ति का ही साक्ष्य होगा जो वह राय उन आधारों पर धारण करता हैं;
    परंतु विशेषज्ञों की राय; जो सामान्यतः विक्रय के लिए प्रस्थापित की जाने वाली किसी पुस्तक में अभिव्यक्त है और वे आधार, जिन पर ऐसी राय धारित हैं, यदि रचयिता मर गया है, या वह मिल नहीं सकता हैं या वह साक्ष्य देने के लिए असमर्थ हो गया हैं या उसे इतने विलंब या व्यय के बिना, जितना न्यायालय अयुक्तियुक्त समझता है, साक्षी के रूप में बुलाया नहीं जा सकता है, ऐसी पुस्तकों को पेश करके साबित किए जा सकेंगे;
    परंतु यह भी कि यदि मौखिक साक्ष्य दस्तावेज से भिन्न किसी भौतिक चीज के अस्तित्व या दशा के बारे में हैं, तो न्यायालय, यदि वह ठीक समझे, ऐसी भौतिक चीज का अपने निरीक्षणार्थ पेश किया जाना अपेक्षित कर सकेगा |
    अध्याय 5
    दस्तावेजी साक्ष्य के विषय में
  10. दस्तावेजों की अंतर्वस्तु का सबूत – दस्तावेजों की अंतर्वस्तु या तो प्राथमिक या द्वितीयक साक्ष्य द्वारा साबित की जा सकेगी |
  11. प्राथमिक साक्ष्य – प्राथमिक साक्ष्य से न्यायालय के निरीक्षण के लिए पेश की गई दस्तावेज स्वयं अभिप्रेत हैं |
    स्पष्टीकरण 1- जहाँ कि कोई दस्तावेज कई मूल प्रतियों में निष्पादित हैं, वहां हर एक मूल प्रति उस दस्तावेज का प्राथमिक साक्ष्य है |
    जहाँ कि कोई दस्तावेज प्रतिलेख में निष्पादित है और हर एक प्रतिलेख पक्षकारो में से केवल एक पक्षकार या कुछ पक्षकारों द्वारा निष्पादित किया गया हैं, वहां हर एक प्रतिलेख उन पक्षकारों के विरुद्ध, जिन्होंने उसका निष्पादन किया हैं, प्राथमिक साक्ष्य हैं |
    स्पष्टीकरण 2- जहां कि अनेक दस्तावेजें एकरूपात्मक प्रक्रिया द्वारा बनाई गई है, जैसा कि शिलामुद्रण या फोटोचित्रण में होता है, वहां उनमें से हर एक शेष सब की अंतर्वस्तु का प्राथमिक साक्ष्य है, किंतु जहां कि वे सब किसी सामान्य मूल की प्रतियाँ हैं वहां वे मूल की अंतर्वस्तु का प्राथमिक साक्ष्य नहीं हैं |
    दृष्टांत

यह दर्शित किया जाता है कि एक ही समय एक ही मूल से मुद्रित अनेक प्लेकार्ड किसी व्यक्ति के कब्जे में रखे हैं। इन प्लेकार्डों में से कोई भी एक अन्य किसी की भी अन्तर्वस्तु का प्राथमिक साक्ष्य है, किन्तु उनमें से कोई भी मूल की अंतर्वस्तु का प्राथमिक साक्ष्य नहीं है।

  1. द्वितीयिक साक्ष्य – द्वितीयिक साक्ष्य से अभिप्रेत हैं और उसके अंतर्गत आते हैं-
    (1) एतस्मिन पश्चात अंतर्विष्ट उपबंधो के अधीन दी हुई प्रमाणित प्रतियाँ;
    (2) मूल से ऐसी यांत्रिक प्रकिया द्वारा, जो प्रकियाएँ स्वयं ही प्रति की शुद्धता सुनिश्चित करती हैं, बनाई गई प्रतियाँ तथा ऐसी प्रीतियों से तुलना की हुई प्रतिलिपियाँ;
    (3) मूल से बनाई गई या तुलना की गई प्रतियाँ;
    (4) उन पक्षकारों के विरुद्ध, जिन्होंने उन्हें निष्पादित नहीं किया हैं, दस्तावेजों के प्रतिलेख;
    (5) किसी दस्तावेज की अंतर्वस्तु का उस व्यक्ति द्वारा, जिसने स्वयं उसे देखा है, दिया हुआ मौखिक वृतांत |
    दृष्टांत

(क) किसी मूल का फोटोचित्र, यद्यपि दोनों की तुलना न की गई हो, तथापि यदि यह साबित किया जाता है कि फोटो चित्रित वस्तु मूल थी, उस मूल की अन्तर्वस्तु का द्वितीयक साक्ष्य है।
(ख) किसी पत्र की वह प्रति, जिसकी तुलना उस पत्र की, उस प्रति से कर ली गई है जो प्रतिलिपि यंत्र द्वारा तैयार की गई है, उस पत्र की अन्तर्वस्तु का द्वितीयक साक्ष्य है, यदि यह दर्शित कर दिया जाता है कि प्रतिलिपि यंत्र द्वारा तैयार की गई प्रति मूल से बनाई गई थी।
(ग) प्रति की नकल करके तैयार की गई, किन्तु तत्पश्चात् मूल से तुलना की हुई प्रतिलिपि द्वितीयक साक्ष्य है, किन्तु इस प्रकार तुलना नहीं की हुई प्रति मूल का द्वितीयक साक्ष्य नहीं है, यद्यपि उस प्रति की, जिससे वह नकल की गई है, मूल से तुलना की गई थी।
(घ) न तो मूल से तुलनाकृत प्रति का मौखिक वृत्तांत और न मूल के किसी फोटोचित्र या यंत्रकृत प्रति का मौखिक वृत्तांत मूल का द्वितीयक साक्ष्य है।

  1. दस्तावेजों का प्राथमिक साक्ष्य द्वारा साबित किया जाना – दस्तावेजें एतस्मिनपश्चात वर्णित अवस्थाओं के सिवाय, प्राथमिक साक्ष्य द्वारा साबित करती होंगी |
  2. अवस्थाएँ जिनमें दस्तावेजों के संबंध में द्वितीयिक साक्ष्य दिया जा सकेगा – किसी दस्तावेज के अस्तित्व, दशा या अंतर्वस्तु का द्वितीयिक साक्ष्य निम्नलिखित अवस्थाओं के में दिया जा सकेगा-
    (क) जबकि यह दर्शित कर दिया जाए या प्रतीत होता हो कि मूल ऐसे व्यक्ति के कब्जे में या शक्त्यधीन हैं जिसके विरुद्ध उस दस्तावेज का साबित किया जाना इप्सित है, अथवा जो न्यायालय कि आदेशिका की पहुँच के बाहर हैं, या उसे ऐसी आदेशिका के अध्यधीन नहीं हैं, अथवा जो उसे पेश करने के लिए वैध रूप से आबद्ध है, और जबकि ऐसा व्यक्ति धारा 66 में वर्णित सूचना के पश्चात उसे पेश नहीं करता हैं
    (ख) जब कि मूल के अस्तित्व, दशा या अंतर्वस्तु को उस व्यक्ति द्वारा, जिसके विरुद्ध उसे साबित किया जाना है या उसके हित प्रतिनिधि द्वारा लिखित रूप में स्वीकृत किया जाना साबित कर दिया हैं
    (ग) जब कि मूल नष्ट हो गया है, या खो गया है, अथवा जबकि उसकी अंतर्वस्तु का साक्ष्य देने की प्रस्थापना करने वाला पक्षकार अपने स्वयं के व्यतिक्रम या उपेक्षा अनुद्रभुत अन्य किसी कारण से उसे युक्तियुक्त समय में पेश नहीं कर सकता,
    (घ) जबकि मूल इस प्रकृति का है कि उसे आसानी से स्थानांतरित नहीं किया जा सकता
    (ङ) जब कि मूल धारा 74 के अर्थ के अंतर्गत एक लोक दस्तावेज है,
    (च) जब कि मूल ऐसी दस्तावेज़ है कि जिसकी प्रमाणित प्रति क साक्ष्य में दिया जाना इस अधिनियम द्वारा या भारत में प्रवृत किसी अन्य विधि द्वारा अनुज्ञात है
    (छ) जब कि मूल ऐसे अनेक लेखाओ या अन्य दस्तावेजो से गठित है जिनकी न्यायालय में सुविधापूर्वक परीक्षा नै कि जा सकती और वह तथ्य,जिसे साबित किया जाना है,संपूर्ण संग्रह का साधारण परिणाम है|
    अवस्थाओं (क), (ग) और (घ) में दस्तावेजों कि अंतर्वस्तु का कोई भी द्वितीयिक साक्ष्य ग्राहा है,
    अवस्था (ख) में यह लिखित स्वीकृति ग्राहा हैं,
    अवस्था (ड) या (च) में दस्तावेज की प्रमाणित प्रति ग्राहा हैं, किन्तु अन्य किसी भी प्रकार का द्वितीयिक साक्ष्य ग्राहा नहीं हैं,
    अवस्था (छ) में दस्तावेजों के साधारण परिणाम का साक्ष्य किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा दिया जा सकेगा जिसने उनकी परीक्षा की है और जो ऐसी दस्तावेजों की परीक्षा करने में कुशल है |
    65- क . इलेक्ट्रोनिक अभिलेख से संबंधित साक्ष्य के बारे में विशेष उपबंध – इलेक्ट्रोनिक अभिलेख की अंतर्वस्तु धारा 65-ख के उपबंधों के अनुसार साबित की जा सकेगी |
    65- ख . इलेक्ट्रोनिक अभिलेखों की ग्राहाता –
    (1) इस अधिनियम अभिलेख में अंतर्विष्ट किसी सूचना को भी, जो कम्प्यूटर द्वारा उत्पादित और किसी कागज पर मुद्रित, प्रकाशीय या चुम्बकीय मीडिया में भंडारित, अभिलिखित या नक़ल की गई हो (जिसे इसमें इसके पश्चात कम्प्यूटर निर्गम कहा गया है), तब एक दस्तावेज समझा जाएगा, यदि प्रश्नगत सूचना और कम्प्यूटर के संबंध में, इस धारा में उल्लिखित शर्ते पूरी कर दी जाती हैं और वह मूल की किसी अंतर्वस्तु या उसमें कथित किसी तथ्य के साक्ष्य के रूप में, जिसका प्रत्यक्ष साक्ष्य ग्राहा होता, अतिरिक्त सबूत या मूल को पेश किए बिना ही किन्ही कार्यवाहियों में ग्राह होगा |
    (2) कम्प्यूटर निर्गम की बाबत॒ उपधारा (1) में वर्णित शर्ते निम्नलिखित होंगी, अर्थात:-
    (क) सूचना से युक्त कम्प्यूटर निर्गम, कम्प्यूटर द्वारा उस अवधि के दौरान उत्पादित किया गया था जिसमें उस व्यक्ति द्वारा, जिसका कम्प्यूटर के उपयोग पर विधिपूर्ण नियंत्रण था, उस अवधि में नियमित रूप से किए गए किसी क्रियाकलाप के प्रयोजन के लिए, सूचना भंडारित करने या प्रसंस्करण करने के लिए नियमित रूप से कम्प्यूटर का उपयोग किया गया था;
    (ख) उक्त अवधि के दौरान, इलेक्ट्रोनिक अभिलेख में अंतर्विष्ट किस्म की सूचना या उस किस्म की जिसमे इस प्रकार अंतर्विष्ट सूचना व्युत्पन्न प्राप्त की जाती हैं, उक्त क्रियाकलापों के सामान्य अनुक्रम में कम्प्यूटर में नियमित रूप से भरी गई थी;
    (ग) उक्त अवधि के महत्वपूर्ण भाग में आद्योपांत, कम्प्यूटर समुचित रूप से कार्य कर रहा था अथवा यदि नहीं तो, उस अवधि के उस भाग की बाबत॒ जिसमें कम्प्यूटर समुचित रूप से कार्य नहीं कर रहा था या वह उस अवधि में प्रचालन में नहीं था, ऐसी अवधि नहीं थी जिसमें इलेक्ट्रोनिक अभिलेख या उसकी अंतर्वस्तु की शुद्धता प्रभावित होती हो; और
    (घ) इलेक्ट्रोनिक अभिलेख में अंतर्विष्ट सूचना ऐसी सूचना से पुनः उत्पादित या व्युत्पन्न की जाती हैं, जिसे उक्त क्रियाकलापों के सामान्य अनुक्रम में कम्प्यूटर में भरा गया था |
    (3) जहां किसी अवधि में उपधारा (2) के खंड (क) में यथा-उल्लिखित, उस अवधि के दौरान नियमित रूप से किए गए किन्हीं क्रियाकलापों के प्रयोजनों के लिए सूचना के भण्डारण या प्रसंस्करण क कार्य कम्यूटरों द्वारा नियमित रूप से निष्पादित किया गया था, चाहे वह—
    (क) उस अवधि में कम्प्यूटरों के प्रचालन के संयोजन द्वारा; या
    (ख) उस अवधि में उत्तरोत्तर प्रचालित कम्प्यूटरों द्वारा; या
    (ग) उस अवधि में उत्तरोतर प्रचालित कम्प्यूटरों के विभिन्न संयोजनों द्वारा; या
    (घ) उस अवधि में उत्तरोत्त प्रचालन को अन्तर्वलित करते हुए किसी अन्य रीति में हो, चाहे वह एक या अधिक कम्प्यूटरों और एक या अधिक कम्प्यूटरों के संयोजनों द्वारा किसी भी क्रम में हो,
    उस अवधि के दौरान उस प्रयोजन के लिए उपयोग किए गए सभी कम्प्यूटर इस धारा के प्रयोजनों के लिए एकल कम्प्यूटर के रूप में माने जाएंगे और इस धारा में कम्प्यूटर के प्रति निर्देश क तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा |
    (4) किन्हीं कार्यवाहियों में, जहाँ इस धारा के आधार पर साक्ष्य में विवरण दिया जाना वांछित है, निम्नलिखित बातों में से किसी बात को पूरा करते हुए प्रमाणपत्र, अर्थात:-
    (क) विवरण से युक्त इलेक्ट्रोनिक अभिलेख की पहचान करना और रीति का वर्णन करना जिससे इसका उत्पादन किया गया था;
    (ख) उस इलेक्ट्रोनिक अभिलेख के उत्पादन में अंतर्वलित किसी युक्ति को ऐसी विशिष्टियां देना, जो यह दर्शित करने के प्रयोजन के लिए समुचित हों, कि इलेक्ट्रोनिक अभिलेख का कम्प्यूटर द्वारा उत्पादन किया गया था;
    (ग) ऐसे विषयों में से किसी पर कार्यवाही करना, जिससे उपधारा (2) में उल्लिखित शर्ते संबंधित हैं,
    और किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर किए जाने के लिए तात्पर्यित होना, जो सुसंगत युक्ति के प्रचालन या सुसंगत क्रियाकलाप के प्रबंध के (जो भी समुचित हो) संबंध में उत्तरदायी पदीय हैसियत में हो प्रमाण-पत्र में कथित किसी विषय का साक्ष्य होगा; और इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए किसी ऐसे विषय के लिए यह कथन पर्याप्त होगा कि यह कथन करने वाले व्यक्ति के सर्वोत्तम ज्ञान और विश्वास के आधार पर कहा गया है |
    (5) इस धारा के प्रयोजनों के लिए:-
    (क) सूचना किसी कम्प्यूटर को प्रदाय की गई समझी जाएगी यदि किसी समुचित रूप में प्रदाय की गई हैं, चाहे इस प्रकार किया गया प्रदाय सीधे (मानव मध्यक्षेप सहित या रहित) या किसी समुचित उपस्कर के माध्यम द्वारा किया गया हो;
    (ख) चाहे किसी पदधारी द्वारा किए गए क्रियाकलापों के अनुक्रम में सूचना इसके भंडारित या प्रसंस्कृत किए जाने की दृष्टि से उक्त क्रियाकलापों के अनुक्रम से अन्यथा प्रचालित कम्प्यूटर द्वारा उक्त क्रियाकलापों के प्रयोजनों के लिए प्रदाय की जाती है | वह सूचना, यदि सम्यक॒ रूप से उस कम्प्यूटर को प्रदाय की जाती है तो, उन क्रियाकलापों के अनुक्रम में प्रदाय की गई समझी जाएगी;
    (ग) कम्प्यूटर उत्पाद को कम्प्यूटर द्वारा उत्पादित समझा जाएगा | चाहे यह इसके द्वारा सीधे उत्पादित हो (मानव मध्यक्षेप सहित या रहित) या किसी समुचित उपस्कर के माध्यम से हो |
    स्पष्टीकरण — इस धारा के प्रयोजनों के लिए, अन्य सूचना से व्युत्पन्न की गई सूचना के प्रति कोई निर्देश परिकलन, तुलना या किसी अन्य प्रक्रिया द्वारा उससे व्युत्पन्न के प्रति निर्देश होगा |
  3. पेश करने की सूचना के बारे में नियम – धारा 65, खंड (क) में निर्दिष्ट दस्तावेजों की अंतर्वस्तु का द्वितीयिक साक्ष्य तब तक न दिया जा सकेगा जब तक ऐसे द्वितीयिक साक्ष्य देने की प्रस्थापना करने वाले पक्षकार उस पक्षकार को, जिसके कब्जे में या शक्त्यधीन वह दस्तावेज है या उसके अर्टनी या प्लीडर को, उसे पेश करने के लिए ऐसी सूचना, जैसी कि विधि द्वारा विहित है और यदि विधि द्वारा कोई सूचना विहित नहीं हो तो ऐसी सूचना, जैसी न्यायालय मामले की परिस्थितियों के अधीन युक्तियुक्त समझता है, न दे दी हो :
    परंतु ऐसी सूचना निम्नलिखित अवस्थाओं में से किसी में अथवा किसी भी अन्य अवस्था में, जिसमें न्यायालय उसके दिए जाने से अभिमुक्ति प्रदान कर दे, द्वितीयिक साक्ष्य को ग्राहा बनाने के लिए अपेक्षित नहीं की जाएगी-
    (1) जबकि साबित की जाने वाली दस्तावेज स्वयं एक सूचना हैं,
    (2) जब कि प्रतिपक्षी को मामले की प्रकृति से यह जानना ही होगा कि उसे पेश करने की उससे अपेक्षा की जाएगी,
    (3) जब कि यह प्रतीत होता है या साबित किया जाता है की प्रतिपक्षी ने मूल पर कब्ज़ा कपट या बल द्वारा अभिप्राप्त कर लिया है,
    (4) जब कि मूल प्रतिपक्षी या उसके अभिकर्ता के पास न्यायालय में है,
    (5) जब कि प्रतिपक्षी या उसके अभिकर्ता ने उसका खो जाना स्वीकार कर लिया है,
    (6) जब कि दस्तावेज पर कब्ज़ा रखने वाला व्यक्ति न्यायालय की आदेशिका की पहुँच के बाहर है या ऐसी आदेशिका के अध्यधीन नहीं है |
  4. जिस व्यक्ति के बारे में अभिकथित है कि उसने पेश की गई दस्तावेज को हस्ताक्षरित किया था या लिखा था , उस व्यक्ति के हस्ताक्षर या हस्तलेख का साबित किया जाना – यदि कोई दस्तावेज किसी व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित या पूर्णतः या भगतः लिखी गई अभिकथित है तो यह साबित करना होगा कि वह हस्ताक्षर या उस दस्तावेज के उतने का हस्तलेख, जितने के बारे में यह अभिकथित है कि वह उस व्यक्ति के हस्तलेख में है, उसके हस्तलेख में है |
    67- क. इलेक्ट्रोनिक चिन्हक के बारे में सबूत – सुरक्षित इलेक्ट्रोनिक चिन्हक की दशा में के सिवाय, यदि यह अभिकथित हैं कि किसी हस्ताक्षरकर्ता का इलेक्ट्रोनिक चिन्हक इलेक्ट्रोनिक अभिलेख में लगाया गया हैं तो यह तथ्य साबित किया जाना चाहिए कि ऐसा इलेक्ट्रोनिक चिन्हक हस्ताक्षरकर्ता का इलेक्ट्रोनिक चिन्हक हैं |
  5. ऐसी दस्तावेज के निष्पादन का साबित किया जाना जिसका अनुप्रमाणित होना विधि द्वारा अपेक्षित है – यदि किसी दस्तावेज का अनुप्रमाणित होना विधि द्वारा अपेक्षित है तो उसे साक्ष्य के रूप में उपयोग में न लाया जाएगा जब तक कि कम से कम एक अनुप्रमाणक साक्षी, यदि कोई अनुप्रमाणक साक्षी जीवित और न्यायालय की आदेशिका के अध्यधीन हो तथा साक्ष्य देने के योग्य हो, उसका निष्पादन साबित करने के प्रयोजन से न बुलाया गया हो:
    परंतु ऐसी किसी दस्तावेज के निष्पादन का साबित करने के लिए, जो विल नहीं है और जो भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के उपबंधों के अनुसार रजिस्ट्रीकृत है| किसी अनुप्रमाणक साक्षी को बुलाना आवश्यक न होगा, जब तक कि उसके निष्पादन का प्रत्याख्यान उस व्यक्ति द्वारा, जिसके द्वारा, उसका निष्पादित होना तात्पर्यित है, निविर्दिष्ट: न किया गया हो |
  6. जब किसी भी अनुप्रमाणक साक्षी का पता न चले तब सबूत – यदि ऐसे किसी अनुप्रमाणक साक्षी का पता न चल सके अथवा यदि दस्तावेज का यूनाइटेड किंगडम में निष्पादित होना तात्पर्यित हो तो यह साबित करना होगा कि कम से कम एक अनुप्रमाणक साक्षी का अनुप्रमाण उसी के हस्तलेख में है तथा यह कि दस्तावेज का निष्पादन करने वाले व्यक्ति का हस्ताक्षर उसी व्यक्ति के हस्तलेख में है |
  7. अनुप्रमाणित दस्तावेज के पक्षकार द्वारा निष्पादन की स्वीकृति – अनुप्रमाणित दस्तावेज के किसी पक्षकार की अपने द्वारा उसका निष्पादन करने की स्वीकृति उस दस्तावेज के निष्पादन का उसके विरुद्ध पर्याप्त सबूत होगा, यधपि वह ऐसी दस्तावेज हो जिसका अनुप्रमाणित होना विधि द्वारा अपेक्षित हैं |
  8. जबकि अनुप्रमाणक साक्षी निष्पादन का प्रत्याख्यान करता है , तब सबूत – यदि अनुप्रमाणक साक्षी दस्तावेज के निष्पादन का प्रत्याख्यान करे या उसे उसके निष्पादन का स्मरण न हो, तो उसका निष्पादन अन्य साक्ष्य द्वारा साबित किया जा सकेगा |
  9. उस दस्तावेज का साबित किया जाना जिसका अनुप्रमाणित होना विधि द्वारा अपेक्षित नहीं है – कोई अनुप्रमाणित दस्तावेज, जिसका अनुप्रमाणित होना विधि द्वारा अपेक्षित नहीं है, ऐसे साबित की जा सकेगी मानो वह अनुप्रमाणित नहीं हो |
  10. हस्ताक्षर , लेख या मुद्रा की तुलना अन्यों से जो स्वीकृत या साबित है – यह अभिनिश्चित करने के लिए कि क्या कोई हस्ताक्षर, लेख या मुद्रा उस व्यक्ति की है, जिसके द्वारा उसका लिखा या किया जाना तात्पर्यित है, किसी हस्ताक्षर, लेख या मुद्रा की, जिसक बारे में, यह स्वीकृत है या न्यायालय को समाधानप्रद रूप में साबित कर दिया गया है कि वह उस व्यक्ति द्वारा लिखा या किया गया था, उससे, जिसे साबित किया जाना है, तुलना की जा सकेगी, यधपि वह हस्ताक्षर, लेख या मुद्रा किसी अन्य प्रयोजन के लिए पेश या साबित न की गई हो |
    न्यायालय में उपस्थित किसी व्यक्ति को किन्हीं शब्दों या अंको के लिखने के निदेश न्यायालय इस प्रयोजन से दे सकेगा कि ऐसे लिखे गए शब्दों या अंको की किन्हीं शब्दों या अंको की तुलना करने के लिए न्यायालय समर्थ हो सके जिनके बारे में अभिकथित है कि वे उस व्यक्ति द्वारा लिखे गए थे |
    यह धारा किन्हीं आवश्यक उपांतरों के साथ अंगुली छापों को भी लागू है |
    73- क. अंकीय चिन्हक के सत्यापन के बारे में सबूत — यह अभिनिश्चित करने के लिए कि क्या कोई अंकीय चिन्हक उस व्यक्ति का है जिसके द्वारा उसका लगाया जाना तात्पर्यित है, न्यायालय यह निदेश दे सकेगा कि:-
    (क) वह व्यक्ति या नियंत्रक या प्रमाणकर्ता प्राधिकारी अंकीय चिन्हक प्रमाण-पत्र पेश करे;
    (ख) कोई अन्य व्यक्ति अंकीय चिन्हक प्रमाण-पत्र में सूचीबध्द लोक कुंजी के लिए आवेदन करे और उस अंकीय चिन्हक को जिसका उस व्यक्ति द्वारा लगाया जाना तात्पर्यित है, सत्यापित करे |
    स्पष्टीकरण – इस धारा के प्रयोजनों के लिए, “नियंत्रक” से सूचना प्रौधौगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 17 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त नियंत्रक अभिप्रेत है |]
    लोक दस्तावेजें
  11. लोक दस्तावेजें – निम्नलिखित दस्तावेजें लोक दस्तावेजें हैं –
    (1) वे दस्तावेजें जो-
    (¡) प्रभुतासम्पन्न प्राधिकारी के,
    (¡¡) शासकीय निकायों और अधिकरणों के, तथा
    (¡¡¡) भारत के किसी भाग के या कॉमनवेल्थ के, किसी विदेश के विधायी, न्यायिक तथा कार्यपालिक लोक ऑफिसर के, कार्यों के रूप में या कार्यों के अभिलेख के रूप में है:
    (3) किसी राज्य में रखे गए प्राइवेट दस्तावेजों के लोक-अभिलेख |
  12. प्राइवेट दस्तावेज – अन्य सभी दस्तावेजे प्राइवेट है |
  13. लोक – दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियाँ – हर लोक आफिसर, जिसकी अभिरक्षा में कोई ऐसी लोक दस्तावेज है, जिसके निरीक्षण करने का किसी भी व्यक्ति को अधिकार है, माँग किए जाने पर उस व्यक्ति को उसकी प्रति उसके लिए विधिक फ़ीस चुकाए जाने पर प्रति के नीचे इस लिखित प्रमाण पत्र के सहित देगा कि वह, यथास्थिति, ऐसी दस्तावेज की या उसके भाग की शुद्ध प्रति है तथा ऐसा प्रमाण पत्र ऐसे ऑफिसर द्वारा दिनांकित किया जाएगा और उसके नाम और पदाभिधान से हस्ताक्षरित किया जाएगा तथा जब कभी ऐसा आफिसर विधि द्वारा किसी मुद्रा का उपयोग करने के लिए प्राधिकृत है तब मुद्रायुक्त किया जायेगा; तथा इस प्रकार प्रमाणित ऐसी प्रतियाँ प्रमाणित प्रतियाँ कहलाएगी |
    स्पष्टीकरण – जो कोई आफिसर पदीय कर्तव्य के मामूली अनुक्रम में ऐसी प्रतियाँ परिदान करने के लिए प्राधिकृत हैं, वह इस धारा के अर्थ के अंतर्गत ऐसी दस्तावेजों की अभिरक्षा रखता है, या समझा जाएगा |
  14. प्रमाणित प्रतियों के पेश करने के द्वारा दस्तावेजों का सबूत – ऐसी प्रमाणित प्रतियाँ उन लोक-दस्तावेजों की या उन लोक-दस्तावेजों के भागों की अंतर्वस्तु के सबूत में पेश की जा सकेगी जिनकी वे प्रतियाँ होना तात्पर्यित हैं |
  15. अन्य शासकीय दस्तावेजों का सबूत – निम्नलिखित लोक-दस्तावेजें निम्नलिखित रूप से साबित की जा सकेंगी:-
    (1) केन्द्रीय सरकार के किसी विभाग के, या क्राउन रिप्रेजेंटेटिव के, या किसी राज्य सरकार के, या किसी राज्य सरकार के किसी विभाग के कार्य, आदेश या अधिसूचनाएँ-
    उन विभागों के अभिलेखों द्वारा, जो क्रमशः उन विभागों के मुख्य पदाधिकारियों द्वारा प्रमाणित हैं:
    या किसी दस्तावेज द्वारा जो ऐसी किसी सरकार के या यथास्थिति क्राउन रिप्रेजेंटेटिव के आदेश द्वारा मुद्रित हुई तात्पर्यित है;
    (2) विधान मंडलों की कार्यवाहियाँ-
    क्रमशः उन निकायों के जर्नलों द्वारा या प्रकाशित अधिनियमों या संक्षिप्तियों द्वारा, या संप्रक्त सरकार के आदेश द्वारा मुद्रित होना तात्पर्यित होने वाली प्रतियों द्वारा;
    (3) हर मजेस्टी द्वारा या प्रिवी कौंसिल द्वारा या हर मजेस्टी की सरकार के किसी विभाग द्वारा निकाली गई उद्घोषणाएं, आदेश या विनियम |
    लंदन गजट में अंतर्विष्ट या क्वीन्स प्रिंटर द्वारा मुद्रित होना तात्पर्यित होने वाली प्रतियों या उद्धरणों द्वारा;
    (4) किसी विदेश की कार्यपालिका के कार्य या विधान-मंडल की कार्यवाहियाँ-
    उनके प्राधिकार से प्रकाशित, या उस देश में सामान्य: इस रूप में गृहीत जर्नलों द्वारा, या उस देश या प्रभु की मुद्रा के अधीन प्रमाणित प्रति द्वारा, या किसी केन्द्रीय अधिनियम में उनकी मान्यता द्वारा,
    (5) किसी राज्य के नगरपालिका निकाय की कार्यवाहियाँ;
    ऐसी कार्यवाहियों की ऐसी प्रति द्वारा, जो उनके विधिक पालक द्वारा प्रमाणित है, या ऐसे निकाय के प्राधिकार से प्रकाशित हुई तात्पर्यित होने वाली किसी मुद्रित पुस्तक द्वारा;
    (6) किसी विदेश की किसी अन्य प्रकार की लोक-दस्तावेजों-
    मूल द्वारा या उसके विधिक पालक द्वारा प्रमाणित किसी प्रति द्वारा, जिस प्रति के साथ किसी नोटरी पब्लिक की या भारतीय कौंसल या राजनयिक अभिकर्ता की मुद्रा के अधीन या प्रमाण पत्र है कि वह प्रति मूल की विधिक अभिरक्षा रखने वाले आफिसर द्वारा सम्यक॒ रूप से प्रमाणित है तथा उस दस्तावेज की प्रकृति उस विदेश की विधि के अनुसार साबित किए जाने पर |
    दस्तावेजों के बारे में उपधारणाएँ
  16. प्रमाणित प्रतियों के असली होने के बारे में उपधारणा – न्यायालय हर ऐसी दस्तावेज का असली होना उपधारित करेगा, जो ऐसा प्रमाणपत्र, प्रमाणित प्रति या अन्य दस्तावेज होनी तात्पर्यित है, जिसका किसी विशिष्ट तथ्य के साक्ष्य के रूप में ग्राह होना विधि द्वारा घोषित है और जिसका केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के किसी आफिसर द्वारा या जम्मू-काश्मीर राज्य के किसी ऐसे आफिसर द्वारा, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इसके लिए सम्यक॒ रूप से प्राधिकृत हो, सम्यक॒ रूप से प्रमाणित होना तात्पर्यित है :
    परंतु यह तब जबकि ऐसी दस्तावेज सारतः उस प्रारूप में हो तथा ऐसी रीति से निष्पादित हुई तात्पर्यित है जो विधि द्वारा तन्निमित निर्दिष्ट है |
    न्यायालय यह भी उपधारित करेगा कि कोई आफिसर, जिसके द्वारा ऐसी दस्तावेज का हस्ताक्षरित या प्रमाणित होना तात्पर्यित है, वह पदीय हैसियत, जिसका वह ऐसे कागज में दावा करता है, उस समय रखता था जब उसने उसे हस्ताक्षरित किया था |
  17. साक्ष्य के अभिलेख के तौर पर पेश की गई दस्तावेजों के बारे में उपधारणा – जब कभी किसी न्यायालय के समक्ष कोई ऐसी दस्तावेज पेश की जाती है, जिसका किसी न्यायिक कार्यवाही में या विधि द्वारा ऐसा साक्ष्य लेने के लिए प्राधिकृत किसी आफिसर के समक्ष, किसी साक्षी द्वारा दिए गए साक्ष्य या साक्ष्य के किसी भाग का अभिलेख या ज्ञापन होना, अथवा किसी कैदी या अभियुक्त का विधि के अनुसार लिया गया कथन या संस्वीकृति होना तात्पर्यित हो और जिसका किसी न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट द्वारा या उपर्युक्त जैसे किसी आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित हो, तब न्यायालय यह उपधारित करेगा-
    कि वह दस्तावेज असली है, कि उन परिस्थितियों के बारे में, जिनके अधीन वह लिया गया था, कोई कथन, जिनका उसको हस्ताक्षरित करने वाले व्यक्ति द्वारा किया जाना तात्पर्यित है, सत्य है तथा कि ऐसा साक्ष्य, कथन या संस्वीकृति सम्यक रूप से ली गई थी |
  18. राजपत्रों , समाचारपत्रों , पार्लियामेंट के प्राइवेट ऐक्टो और अन्य दस्तावेजों के बारे में उपधारणाएं – न्यायालय हर ऐसी दस्तावेज का असली होना उपधारित करेगा जिसका लंदन गजट या कोई शासकीय राजपत्र या ब्रिटिश क्राउन के किसी उपनिवेश, आश्रित देश या कब्जाधीन क्षेत्र का सरकारी राजपत्र होना या कोई समाचारपत्र या जर्नल होना, या क्राउन यूनाइटेड किंगडम कि पार्लियामेंट के प्राइवेट ऐक्ट की क्वीन्स प्रिंटर द्वारा मुद्रित प्रति होना तात्पर्यित है तथा हर ऐसी दस्तावेज का, जिसका ऐसी दस्तावेज होना तात्पर्यित है, जिसका किसी व्यक्ति द्वारा रखा जाना किसी विधि द्वारा निर्दिष्ट है, यदि ऐसी दस्तावेज सारतः उस प्रारूप में रखी गई हो, जो विधि द्वारा अपेक्षित है, और उचित अभिरक्षा में से पेश की गई हो, असली होना उपधारित करेगा |
    81- क. इलेक्ट्रोनिक रूप में राजपत्र के बारे में उपधारणा – न्यायालय, ऐसे प्रत्येक इलेक्ट्रोनिक अभिलेख के असली होने की उपधारणा करेगा, जो शासकीय राजपत्र होना तात्पर्यित है या जो ऐसा इलक्ट्रोनिक अभिलेख होना तात्पर्यित है, जिसको किसी विधि द्वारा किसी व्यक्ति द्वारा रखा जाना निर्दिष्ट है, यदि ऐसा इलेक्ट्रोनिक अभिलेख सारवान तौर पर विधि द्वारा अपेक्षित रूप में रखा गया है और उचित अभिरक्षा से पेश किया गया हो |
    स्पष्टीकरण – इलेक्ट्रोनिक अभिलेख का उचित अभिरक्षा में होना कहा जाता है, यदि वे ऐसे स्थल में और उस व्यक्ति की देखरेख में है, जहाँ और जिसके पास वे प्रकृत्या होनी चाहिए; किन्तु कोई भी अभिरक्षा अनुचित नहीं है, यदि यह साबित कर दिया जाए कि उस अभिरक्षा का उद्गम विधि सम्मत था या उस विशिष्ट मामले कि परिस्थितियाँ ऐसी हो, जिनसे ऐसा उद्गम अधिसंभाव्य हो जाता है|
  19. मुद्रा या हस्ताक्षर के सबूत के बिना इंगलैंड में ग्राहा दस्तावेज के बारे में उपधारणा – जबकि किसी न्यायालय के समक्ष कोई ऐसी दस्तावेज पेश की जाती है जिसका ऐसी दस्तावेज होना तात्पर्यित है जो इंगलैड या आयरलैण्ड के किसी न्यायालय में किसी विशिष्ट को साबित करने के लिए उस दस्तावेज की अभिप्रमाणीकृत करने वाली मुद्रा या स्टाम्प या हस्ताक्षर को उस व्यक्ति द्वारा जिसके द्वारा उसका हस्ताक्षरित किया जाना तात्पर्यित है, दावाकृत न्यायिक या पदीय हैसियत को साबित किए बिना इंग्लैण्ड या आयरलैण्ड में तत्समय प्रवृत विधि के अनुसार ग्राहा होती, तब न्यायालय उपधारित करेगा कि ऐसी मुद्रा, स्टाम्प या हस्ताक्षर असली है और उसको हस्ताक्षरित करने वाला व्यक्ति वह न्यायिक या पदीय हैसियत, जिसका वह दावा करना है, उस समय रखता था जब उसने उसे हस्ताक्षरित किया था |
    तथा दस्तावेज उसी प्रयोजन के लिए जिसके लिए वह इंग्लैण्ड या आयरलैण्ड में ग्राहा होती, ग्राहा होगी |
  20. सरकार के प्राधिकार द्वारा बनाए गए मानचित्रों या रेखांकों के बारे में उपधारणा – न्यायालय यह उपधारित करेगा कि वे मानचित्र या रेखांक जो केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के प्राधिकृत द्वारा बनाए गए तात्पर्यित हैं, वैसे ही बनाए गए थे और वे शुद्ध है किन्तु किसी मामले के प्रयोजनों के लिए बनाए गए मानचित्रों या रेखांकों के बारे में यह साबित करना होगा कि वे सही है |
  21. विधियों के संग्रह और विनिश्चयों की रिपोर्टों के बारे में उपधारणा – न्यायालय हर ऐसी पुस्तक का जिसका किसी देश की सरकार के प्राधिकार के अधीन मुद्रित या प्रकाशित होना और जिसमें उस देश की कोई विधियाँ अंतर्विष्ट होना तात्पर्यित है;
    तथा हर ऐसी पुस्तक का, जिसमें उस देश के न्यायालय के विनिश्चयों की रिपोर्ट अंतर्विष्ट होना तात्पर्यित है- असली होना उपधारित करेगा |
  22. मुख्तारनामों के बारे में उपधारणा – न्यायालय यह उपधारित करेगा कि हर ऐसी दस्तावेज जिसका मुख्तारनामा होना और नोटरी पब्लिक या किसी न्यायालय, न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट, भारतीय कौंसल या उपकौंसल या केंद्रीय सरकार के प्रतिनिधि के समक्ष निष्पादित और उस द्वारा अभिप्रमाणिकृत होना तात्पर्यित है, ऐसे निष्पादित और अभिप्रमाणिकृत कि गयी थी |
    85-क. इलेक्ट्रोनिक करारों के बारे में उपधारणा- न्यायालय यह उपधारणा करेगा कि हर ऐसा इलक्ट्रोनिक अभिलेख, जिसका ऐसा करार होना तात्पर्यित है जिस पर पक्षकारों के ²[इलक्ट्रोनिक हस्ताक्षर ] हैं, पक्षकारों के इलक्ट्रोनिक हस्ताक्षर लगाकर किया गया था |
    85- ख. इलेक्ट्रोनिक अभिलेखों और इलक्ट्रोनिक हस्ताक्षर के बारे में उपधारणा –
    (1) किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों में, जिनमें सुरक्षित इलक्ट्रोनिक अभिलेख अंतवर्लित है, जब तक कि इसके प्रतिकूल साबित नहीं कर दिया जाता, न्यायालय यह उपधारणा करेगा कि सुरक्षित इलक्ट्रोनिक अभिलेख किसी ऐसे विनिर्दिष्ट समय से, जिससे सुरक्षित प्रास्थिति संबंधित हैं, परिवर्तित नहीं किया गया है |
    (2) किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों में, जिनमें सुरक्षित इलक्ट्रोनिक हस्ताक्षर अंतवर्लित है, जब तक कि इसके प्रतिकूल साबित नहीं कर दिया जाता, न्यायालय यह उपधारित करेगा कि:-
    (क) उपयोगकर्ता द्वारा सुरक्षित इलेक्ट्रोनिक हस्ताक्षर इलक्ट्रोनिक अभिलेख को चिन्हित या अनुमोदित करने के आशय से लगाया गया है;
    (ख) सुरक्षित इलक्ट्रोनिक अभिलेख या सुरक्षित इलक्ट्रोनिक हस्ताक्षर की दशा में के सिवाय, इस धारा की कोई बात इलक्ट्रोनिक अभिलेख या इलक्ट्रोनिक हस्ताक्षर की अधिप्रमाणिकता और समग्रता बाबत कोई उपधारणा सृजित नहीं करेगी |
    85- ग. इलक्ट्रोनिक हस्ताक्षर प्रमाण पत्र के बारे में उपधारणा — जब तक कि इसके प्रतिकूल साबित नहीं कर दिया जाता, न्यायालय, यह उपधारित करेगा कि यदि उपयोगकर्ता द्वारा प्रमाणपत्र को स्वीकार किया गया था तो इलक्ट्रोनिक हस्ताक्षर प्रमाण-पत्र में सूचीबध्द सूचना सही है, उस सूचना के अलावा जो कि उपयोगकर्ता की सूचना के रूप में ऐसी सूचना है जिसे सत्यापित नहीं किया गया है |
  23. विदेशी न्यायिक अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियों के बारे में उपधारणा — न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि ऐसे किसी देश के, जो भारत का या हर मजेस्टी के अधिक्षेत्रों का भाग नहीं है न्यायिक अभिलेख की प्रमाणित प्रति तात्पर्यित होने वाली कोई दस्तावेज असली और शुद्ध है, यदि वह दस्तावेज किसी ऐसी रीति से प्रमणित हुई तात्पर्यित हो जिसका न्यायिक अभिलेखों की प्रतियों के प्रमाणन के लिए उस देश में साधारण: काम में लाई जाने वाली रीति होना ऐसे देश में या के लिए केन्द्रीय सरकार के किसी प्रतिनिधि द्वारा प्रमाणित है |
    जो आफिसर ऐसे किसी राज्य क्षेत्र या स्थान के लिए, जो भारत का या हर मजेस्टी के अधिक्षेत्रों का भाग नहीं है, साधारण खण्ड अधिनियम, 1897(1897का 10) की धारा 3, खण्ड (43) में यथा परिभाषित राजनैतिक अभिकर्ता है, वह एस धारा के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय सरकार का उस देश में, और के लिए प्रतिनिधि समझा जायगा जिसमें वह राज्य-क्षेत्र या स्थान समाविष्ट हैं |
  24. पुस्तकों , मानचित्रों और चार्टो के बारे में उपधारणा — न्यायालय यह उपधारित का सकेगा कि कोई पुस्तक, जिसे वह लोक या साधारण हित संबंधी बातों की जानकारी के लिए देखे और कोई प्रकाशित मानचित्र या चार्ट, जिसके कथन सुसंगत तथ्य हैं और जो उसके निरीक्षणार्थ पेश किया गया है, उस व्यक्ति द्वारा तथा उस समय और उस स्थान पर लिखा गया और प्रकाशित किया गया था जिनके द्वारा या जिस समय या जिस स्थान पर उसका लिखा जाना या प्रकाशित होना तात्पर्यित है |
  25. तार संदेशो के बारे में उपधारणा — न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि कोई संदेश, जो किसी तार घर से उस व्यक्ति को भेजा गया है, जिसे ऐसे संदेश का संबोधित होना तात्पर्यित है, उस संदेश के समरूप है जो भेजे जाने के लिए उस कार्यालय को जहां से वह संदेश पारेषित किया गया तात्पर्यित है, परिदत्त किया गया था, किन्तु न्यायालय उस व्यक्ति के बारे में, जिसने संदेश पारेषित किए जाने के लिए परिदत्त किया था, कोई उपधारणा नहीं करेगा |
    88क. इलक्ट्रोनिक संदेशो के बारे में उपधारणा— न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि प्रवर्तक द्वारा ऐसे प्रेषिती को किसी इलेक्ट्रोनिक डाक परिसेवक के माध्यम से अग्रेषित कोई इलेक्ट्रोनिक संदेश, जिसे ऐसे संदेश का संबोधित किया जाना तात्पर्यित है, उस संदेश के समरूप है, जो पारेषण के लिए उसके कम्प्यूटर में भरा गया था, किन्तु न्यायालय, उस व्यक्ति के बारे में, जिसके द्वारा ऐसा संदेश भेजा गया था, कोई उपधारणा नहीं करेगा |
    स्पष्टीकरण — इस धारा के प्रयोजनों के लिए “प्रेषिती” और “प्रवर्तक” पदों के वही अर्थ होंगे, जो सूचना प्रौधौगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ख) और (य-क) में है |]
  26. पेश न की गई दस्तावेजों के सम्यक निष्पादन आदि के बारे में उपधारणा — न्यायालय उपधारित करेगा कि हर दस्तावेज, जिसे पेश करने की अपेक्षा की गई थी और जो पेश करने की सूचना के पश्चात पेश नहीं की गई है, विधि द्वारा अपेक्षित प्रकार के अनुप्रमाणित, स्टाम्पित और निष्पादित की गई थी |
  27. तीस वर्ष पुरानी दस्तावेजों के बारे में उपधारणा — जहाँ कि कोई दस्तावेज, जिसका तीस वर्ष पुरानी होना तात्पर्यित है य साबित किया गया है, ऐसी किसी अभिरक्षा में से जिसे न्यायालय उस विशिष्ट ,मामले में उचित समझता है, पेश की गई है, वहां न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि ऐसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर और उसका हर अन्य भाग, जिसका किसी विशिष्ट व्यक्ति के हस्तलेख में होना तात्पर्यित है, और निष्पादित य अनुप्रमाणित दस्तावेज होने की दशा में यह उपधारित कर सकेगा कि वह उन व्यक्तियों द्वारा सम्यक रूप से निष्पादित और अनुप्रमाणित की गयी थी जिनके द्वारा उसका निष्पादित और अनुप्रमाणित होना तात्पर्यित है |
    स्पष्टीकरण — दस्तावेजों का उचित अभिरक्षा में होना कहा जाता है, यदि वे ऐसे स्थान में और उस व्यक्ति की देख-रेख में है, जहां और जिसके पास वे प्रकृत्या होनी चाहिए; किन्तु कोई भी अभिरक्षा अनुचित नहीं है, यदि यह साबित कर दिया जाए कि अभिरक्षा का उद्गम विधिसम्मत था या यदि उस विशिष्ट मामले की परिस्थितियाँ ऐसी हों जिनसे ऐसा उद्गम अधिसंभाव्य हो जाता है |
    यह स्पष्टीकरण धारा 81 को भी लागू है |
    दृष्टांत

(क) क भू-संपत्ति पर दीर्घकाल से कब्जा रखता आया है। वह उस भूमि संबंधी विलेख, जिनसे उस भूमि पर उसका हक दर्शित होता है, अपनी अभिरक्षा में से पेश करता है। यह अभिरक्षा उचित है।
(ख) क उस भू-संपत्ति से संबद्ध विलेख, जिसका वह बंधकदार है, पेश करता है। बंधककर्ता संपत्ति पर कब्जा रखता है। यह अभिरक्षा उचित है।

(ग) ख का संसंगी क, ख के कब्जे वाली भूमि से संबंधित विलेख पेश करता है, जिन्हें ख ने उसके पास सुरक्षित अभिरक्षा के लिए निक्षिप्त किया था। यह अभिरक्षा उचित है।

राज्य संशोधन
उत्तरप्रदेश — विद्यमान धारा, धारा 90(1) के रूप में पुनसँख्यांकित की जाएगी, और
(क) शब्द “तीस वर्ष” के स्थान पर “बीस वर्ष” प्रतिस्थापित किए जाएंगे, और
(ख) अग्रलिखित को नई धारा (2) के रूप में जोड़ा जावेगा अर्थात :-
“(2) जब कोई दस्तावेज जो उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट है, को दस्तावेज के पंजीयन संबंधी विधि के अनुसार पंजीकृत किया गया था और सम्यक् रूप से प्रमाणित उसकी प्रति प्रस्तुत की गई है तो न्यायालय उपधारणा कर सकेगा कि ऐसे दस्तावेज के हस्ताक्षर तथा उसका अन्य प्रत्येक भाग जिसका किसी विशिष्ट व्यक्ति का होना तात्पर्यित है उस व्यक्ति के हस्तलेख में है और उस व्यक्ति द्वारा अनुप्रमाणित है जिसके द्वारा उसका निष्पादित या अनुप्रमाणित होना तात्पर्यत है।”
धारा 90 के पश्चात् धारा 90-क अंतःस्थापित की जावेगी, अर्थात् :-
“90-क. (1) जब कोई पंजीकृत दस्तावेज या उसकी विधिवत अनुप्रमाणित प्रति या दस्तावेज की कोई अनुप्रमाणित प्रति जो कि न्यायालय के रिकार्ड का भाग है किसी की अभिरक्षा में से प्रस्तुत की जाती है जिसे न्यायालय किसी विशेष मामले में उचित समझता है तो न्यायालय यह उपधारणा कर सकेगा कि मूल दस्तावेज उस व्यक्ति द्वारा निष्पादित किया गया था जिसके द्वारा उसका निष्पादित किया जाना तात्पर्यत है।
(2) कोई दस्तावेज जो किसी वाद का या प्रतिरक्षा का आधार है या वादपत्र में या लिखित कथन में जिस पर विश्वास किया गया है, के बाबत् उक्त उपधारणा नहीं की जाएगी ।”
धारा 90 की उपधारा (1) में दिया गया स्पष्टीकरण इस धारा को भी लागू होगा।

[यू.पी. एक्ट संख्या 24 सन् 1954, धारा 2 (दिनांक 30-11-1954 से प्रभावशील)]

90-क, पाँच वर्ष पुराने इलक्ट्रोनिक अभिलेखों के बारे में उपधारणा — जहाँ कोई इलेक्ट्रोनिक अभिलेख, जिसका पाँच वर्ष पुराना होना तात्पर्यित है या साबित किया गया है, ऐसी किसी अभिरक्षा में जिसे नयायालय उस विशिष्ट मामले में उचित समझता है, पेश किया गया है, वहाँ न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि ऐसा इलेक्ट्रोनिक हस्ताक्षर जिसका किसी विशिष्ट व्यक्ति का इलेक्ट्रोनिक हस्ताक्षर होना तात्पर्यित है, उसके द्वारा या उसकी ओर से इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा लगाया गया था |
स्पष्टीकरण — इलेक्ट्रोनिक अभिलेख का उचित अभिरक्षा में होना कहा जाता है, यदि वे ऐसे स्थान में, और उस व्यक्ति की देखरेख में है, जहाँ और जिसके पास वे प्रकृत्या होनी चाहिए; किन्तु कोई भी अभिरक्षा अनुचित नहीं है, यदि यह साबित कर दिया जाए कि उस अभिरक्षा का उद्गम विधिसम्मत था या उस विशिष्ट मामले की परिस्थितियाँ ऐसी हों जिससे ऐसा उद्गम अधिसंभाव्य हो जाता है |
यह स्पष्टीकरण धारा 81-क को भी लागू होता है
अध्याय 6
दस्तावेजी साक्ष्य द्वारा मौखिक साक्ष्य के अपवर्जन के विषय में

  1. दस्तावेजों के रूप में लेखबद्ध संविदाओं , अनुदानों तथा संपत्ति के अन्य व्ययनों के निबंधनों का साक्ष्य – जबकि किसी संविदा के या अनुदान के या संपत्ति के किसी अन्य व्ययन के निबन्ध दस्तावेज के रूप में लेखबद्ध कर लिए गए हों, तब, तथा उन सब दशाओं में, जिनमें विधि द्वारा अपेश्रित है कि कोई बात दस्तावेज के रूप में लेखबद्ध की जाए, ऐसी संविदा, अनुदान या संपत्ति के अन्य व्ययन के निबंधनों के या ऐसी बात के साबित किए जाने के लिए स्वयं उस दस्तावेज के सिवाय, या उन दशाओं में जिनमें एतस्मिनपूर्व अन्तव्रिष्ट उपबंधों के अधीन द्रितीयिक साक्ष्य ग्राहा है, उसकी अन्तर्वस्‍तु के द्रितीयिक साक्ष्य के सिवाय कोई भी साक्ष्य नहीं दिया जाएगा |
    अपवाद 1- जबकि विधि द्वारा यह अपेक्षित है कि किसी लोक आफिसर की नियुक्ति लिखित रूप में हों और जब यह दर्शित किया गया है कि किसी विशिष्ट व्यक्ति ने ऐसे आफिसर के नाते कार्य किया है, तब उस लेख का, जिसके द्वारा वह नियुक्त किया गया था, साबित किया जाना आवश्यक नहीं है |
    अपवाद 2- जिन बिलों का भारत में प्रोबेट मिला है, वे प्रोबेट द्वारा साबित की जा सकेंगी |
    स्पष्टीकरण 1- यह धारा उन दशाओं को, जिनमें निर्दिष्ट संविदाएँ, अनुदान या सम्पत्ति के व्ययन एक ही दस्तावेज में अन्तव्रिष्ट है तथा उन दशाओं को, जिनमें वे एक से अधिक दस्तावेजों में अन्तव्रिष्ट है, समान रूप से लागू है |
    स्पष्टीकरण 2- जहाँ कि एक से अधिक मूल हैं, वहाँ केवल एक मूल साबित करना आवश्यक है |
    स्पष्टीकरण 3- इस धारा में निर्दिष्ट तथ्यों से भित्र किसी तथ्य का किसी भी दस्तावेज में कथन, उसी तथ्य के बारे में मौखिक साक्ष्य को ग्राहाता का प्रवारण नहीं करेगा |
    दृष्टांत

(क) यदि कोई संविदा कई पत्रों में अन्तर्विष्ट है, तो वे सभी पत्र, जिनमें वह अन्तर्विष्ट है, साबित करने होंगे।
(ख) यदि कोई संविदा किसी विनिमय -पत्र में अन्तर्विष्ट है, तो वह विनिमय-पत्र साबित करना होगा।
(ग) यदि विनिमय-पत्र तीन परतों में लिखित है, तो केवल एक को साबित करना आवश्यक है।
(घ) ख से कतिपय निबंधनों पर क नील के परिदान के लिए लिखित संविदा करता है। संविदा इस तथ्य का वर्णन करती है कि ख ने क को किसी अन्य अवसर पर मौखिक रूप से संविदाकृत अन्य नील का मूल्य चुकाया था।
मौखिक साक्ष्य पेश किया जाता है कि अन्य नील के लिए कोई संदाय नहीं किया गया। यह साक्ष्य ग्राह्य है |
(ङ)ख द्वारा दिए गए धन की रसीद ख को क देता है।
संदाय करने का मौखिक साक्ष्य पेश किया जाता है। यह साक्ष्य ग्राह्य है।

  1. मौखिक करार के साक्ष्य का अपवर्जन – जबकि किसी ऐसी संविदा, अनुदान या संपत्ति के अन्य व्ययन के निबंधनों को या किसी बात को, जिनके बारे में विधि द्वारा अपेक्षित है कि वह दस्तावेज के रूप में लेखबद्ध की जाएँ, अंतिम पिछली धारा के अनुसार साबित किया जा चुका हो, तब किसी ऐसी लिखत के पक्षकारो या उनके हित प्रतिनिधियों के बीच के किसी मौखिक करार या कथन का कोई भी साक्ष्य उसके निबंधनों का खंडन करने के या उनमें फेरफार करने के या जोड़ने के या उनमें से घटाने के प्रयोजन के लिए ग्रहण न किया जायेगा :
    परंतुक 1- ऐसा कोई तथ्य साबित किया जा सकेगा जो किसी दस्तावेज को अविधिमान्य बना दे या जो किसी व्यक्ति को तत्संबंधी किसी डिक्री या आदेश का हकदार बना दे, यथा कपट, अभित्रास, अवैधता, सम्यक निष्पादन का अभाव,किसी संविदाकारी पक्षकार में सामर्थ्य का अभाव, प्रतिफल का अभाव या निष्फलता या विधि की या तथ्य की भूल |
    परंतुक 2- किसी विषय के बारे में, जिसके बारे में दस्तावेज मौन है और जो उसके निबंधनों से असंगत नहीं है, किसी पृथक मौखिक करार का अस्तित्व साबित किया जा सकेगा |
    इस पर विचार करते समय कि यह परंतुक लागू होता है या नहीं, न्यायालय दस्तावेज के प्ररुपिता की मात्रा को ध्यान में रखेगा |
    परंतुक 3- ऐसी किसी संविदा, अनुदान या संपत्ति के व्ययन के अधीन कोई बाध्यता संलग्र होने की पुरोभाव्य शर्त गठित करने वाले किसी पृथक मौखिक करार का अस्तित्व साबित किया जा सकेगा |
    परंतुक 4- ऐसी किसी संविदा,अनुदान या संपत्ति के व्ययन को विखंडित या उपांतरित करने के लिए किसी सुभिन्न पाश्चिक मौलिक करार का अस्तित्व उन अवस्थाओं के सिवाय साबित किया जा सकेगा, जिनमें विधि द्वारा अपेश्रित है कि ऐसी संविदा, अनुदान या संपत्ति का व्ययन लिखित हो अथवा जिनमें दस्तावेज के रजिस्ट्रीकरण के बारे में तत्समय प्रवृत्त विधि के अनुसार उसका रजिस्ट्रीकरण किया जा चुका है |
    परंतुक 5- कोई प्रथा या रूढ़ी, जिसके द्वारा किसी संविदा में अभिव्यक्त रूप से वर्णित न होने वाली प्रसंगतियाँ उस प्रकार की संविदाओं से प्राय: उपाबद्ध रहती है, साबित की जा सकेगी :
    परंतु यह तब जबकि ऐसी प्रसंगतियों का उपाबंधन संविदा के अभिव्यक्त निबंधनों के विरुद्ध या उनसे असंगत न हो |
    परंतुक 6- कोई तथ्य, जो यह दर्शित करता है कि किसी दस्तावेज की भाषा वर्तमान तथ्यों से किस प्रकार संबंधित है, साबित जा सकेगा |
    दृष्टांत

(क) बीमा की एक पॉलिसी उस माल के लिए की गई जो “कलकत्ता से लंदन जाने वाले पोतों में हैं”। माल किसी विशिष्ट पोत से भेजा जाता है, जो पोत नष्ट हो जाता है। यह तथ्य कि वह विशिष्ट पोत उस पॉलिसी से मौखिक रूप से अपवादित था, साबित नहीं किया जा सकता।
(ख) ख को पहली मार्च, 1873 को 1,000 रुपये देने का पक्का लिखित करार क करता है। यह तथ्य कि उसी समय एक मौखिक करार हुआ था कि यह धन इकतीस मार्च तक न दिया जाएगा, साबित नहीं किया जा सकता।
(ग) “रामपुर चाय संपदा” नामक एक संपदा किसी विलेख द्वारा बेची जाती है, जिसमें विक्रीत संपत्ति का मानचित्र अंतर्विष्ट है। यह तथ्य कि मानचित्र में न दिखाई गई भूमि सदैव सम्पदा का भाग रूप मानी जाती रही थी और उस विलेख द्वारा उसका अन्तरित होना अभिप्रेत था, साबित नहीं किया जा सकता।
(घ) क किन्हीं खानों को, जो ख की संपत्ति है, किन्हीं निबंधनों पर काम में लाने का ख से लिखित करार करता है। उनके मूल्य के बारे में ख के दुर्व्यपदेशन द्वारा क ऐसा करने के लिए उत्प्रेरित हुआ था। यह तथ्य साबित किया जा सकेगा।
(ङ) ख पर क किसी संविदा के विनिर्दिष्ट पालन के लिए वाद संस्थित करता है और यह प्रार्थना भी करता है। कि संविदा का सुधार उसके एक उपबंध के बारे में किया जाए, क्योकि वह उपबंध उसमें भूल से अन्तःस्थापित किया गया था। क साबित कर सकेगा कि ऐसी भूल की गई थी, जिससे संविदा के सुधार करने का हक उसी विधि द्वारा मिलता है।
(च) क पत्र द्वारा ख का माल आदिष्ट करता है जिसमें संदाय करने के समय के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है और परिदान पर माल को प्रतिगृहीत करता है। ख मूल्य के लिए क पर वाद लाता है। क दर्शित कर सकेगा कि माल ऐसी अवधि के लिए उधार पर दिया गया था जो अभी अनवसित नहीं हुई है।
(छ) ख को क एक घोड़ा बेचता है और मौखिक वारण्टी देता है कि वह अच्छा है। ख को क इन शब्दों को लिखकर एक कागज देता है — “क से 500 रुपए में एक घोड़ा खरीदा”। ख मौखिक वारण्टी साबित कर सकेगा।
(ज) ख का बासा क भाड़े पर लेता है और एक कार्ड देता है जिसमें लिखा है, “कमरे 200 रुपए प्रतिमास”।
क यह मौखिक करार साबित कर सकेगा कि इन निबंधनों के अन्तर्गत भागतः भोजन भी था। ख का बासा क एक वर्ष के लिए भाड़े पर लेता है और उनके बीच अटर्नी द्वारा तैयार किया हुआ एक स्टाम्पित करार किया जाता है। वह करार भोजन देने के लिए विषय में मौन है। क साबित नहीं कर सकेगा कि मौखिक तौर पर उस निबंधन के अन्तर्गत भोजन देना भी था।
(झ) ख से शोध्य ऋण के लिए धन की रसीद भेजकर ऋण चुकाने का क आवेदन करता है। ख रसीद रख लेता है और धन नहीं भेजता। उस रकम के लिए वाद में क इसे साबित कर सकेगा।
(ञ) क और ख लिखित संविदा करते हैं जो अमुक अनिश्चित घटना के घटित होने पर प्रभावशील होनी है।
वह लेख ख के पास छोड़ दिया जाता है जो उसके आधार पर क पर वाद लाता है। क उन परिस्थितियों को दर्शित कर सकेगा जिनके अधीन वह परिदत्त किया गया था।

  1. संदिग्घार्थ दस्तावेज को स्पष्ट करने या उसका संशोधन करने के साक्ष्य का अपवर्जन – जबकि किसी दस्तावेज में प्रयुक्त भाषा देखते ही संदिग्घार्थ या त्रुटिपूर्ण है, तब उन तथ्यों का साक्ष्य नहीं दिया जा सकेगा जो उनका अर्थ दर्शित या उसकी त्रुटियों को पूर्ति कर दे |
    दृष्टांत (क) ख को क 1,000 रुपयों या 1,500 रुपयों में एक घोड़ा बेचने का लिखित करार करता है। यह दर्शित करने के लिए कि कौन-सा मूल्य दिया जाना था, साक्ष्य नहीं दिया जा सकता।
    (ख) किसी विलेख में रिक्त स्थान है। उन तथ्यों का साक्ष्य नहीं दिया जा सकता जो यह दर्शित करते हों कि उनकी किस प्रकार पूर्ति अभिप्रेत थी।
  2. विद्यमान तथ्यों को दस्तावेज के लागू होने के विरुद्ध साक्ष्य का अपवर्जन – जबकि दस्तावेज में प्रयुक्त भाषा स्वयं स्पष्ट हो और जबकि वह विद्यमान तथ्यों को ठीक-ठीक लागू होती हो, तब यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य नहीं दिया जा सकेगा कि वह ऐसे तथ्यों को लागू होने के लिए अभिप्रेत नहीं थी |
    दृष्टांत

ख को क “रामपुर में 100 बीघे वाली मेरी सम्पदा” विलेख द्वारा बेचता है। क के पास रामपुर में 100 बीघे वाली एक सम्पदा है। इस तथ्य का साक्ष्य नहीं दिया जा सकेगा कि विक्रयार्थ अभिप्रेत सम्पदा किसी भिन्न स्थान पर स्थित और भिन्न माप की थी।

  1. विद्यमान तथ्यों के संदर्भ में अर्थहीन दस्तावेज के बारे में साक्ष्य- जबकि दस्तावेज में प्रयुक्त भाषा स्वयं स्पष्ट हो, किंतु विद्यमान तथ्यों के संदर्भ में अर्थहीन हो, तो यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य दिया जा सकेगा कि वह एक विशिष्ट भाव में प्रयुक्त की गई थी |
    दृष्टांत

ख को क “मेरा कलकत्ते का गृह” विलेख द्वारा बेचता है।
क का कलकत्ते में कोई गृह नहीं था किन्तु यह प्रतीत होता है कि उसका हावड़ा में एक गृह था जो विलेख के निष्पादन के समय से ख के कब्जे में था।
इन तथ्यों को यह दर्शित करने के लिए साबित किया जा सकेगा कि विलेख का संबंध हावड़ा के गृह से था।

  1. उस भाषा के लागू होने के बारे में साक्ष्य जो कई व्यक्तियों में से केवल एक को लागू हो सकती है – जबकि तथ्य ऐसे है कि प्रयुक्त भाषा कई व्यक्तियों या चीजों में से किसी एक को लागू होने के लिए अभिप्रेत हो सकती थी तथा एक से अधिक को लागू होने के लिए अभिप्रेत नहीं हो सकती थी, तब उन तथ्यों का साक्ष्य दिया जा सकेगा जो यह दर्शित करते है कि उन व्यक्तियों या चीजों में से किसको लागू होने के लिए वह आशयित थी |
    दृष्टांत

(क) क, 1,000 रुपये में “मेरा सफेद घोड़ा” ख को बेचने का करार करता है। क के पास दो सफेद घोड़े हैं। उन तथ्यों का साक्ष्य दिया जा सकेगा जो यह दर्शित करते हों कि उनमें से कौन-सा घोड़ा अभिप्रेत था।
(ख) ख के साथ क हैदराबाद जाने के लिए करार करता है। यह दर्शित करने वाले तथ्यों का साक्ष्य दिया जा सकेगा कि दक्षिण का हैदराबाद अभिप्रेत था या सिंध का हैदराबाद।

  1. तथ्यों के दो संवर्गो में से , जिनमें से किसी एक को भी वह भाषा पूरी की पूरी ठीक – ठीक लागू नहीं होती , उसमें से एक को भाषा के लागू होने के बारे में साक्ष्य – जबकि प्रयुक्त भाषा भागत: विद्यमान तथ्यों के एक संवर्ग को और भागत: विद्यमान तथ्यों के अन्य संवर्ग को लागू होती है, किंतु वह पूरी की पूरी दोनों में से किसी एक को भी ठीक-ठीक लागू नहीं होती, तब यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य दिया जा सकेगा कि वह दोनों में से किसको लागू होने के लिए अभिप्रेत थी |
    दृष्टांत

ख को “मेरी भ में स्थित म के अधिभोग में भूमि” बेचने का क करार करता है। क के पास भ में स्थित भूमि है, किन्तु वह म के कब्जे में नहीं है तथा उसके पास म के कब्जे वाली भूमि है, किन्तु वह भ में स्थित नहीं है। यह दर्शित करने वाले तथ्यों का साक्ष्य दिया जा सकेगा कि उसका अभिप्राय कौन-सी भूमि बेचने का था।

  1. न पढ़ी जा सकने वाली लिपि आदि के अर्थ के बारे में साक्ष्य – ऐसी लिपि का, जो पढ़ी न जा सके या सामान्यत: समझी न जाती हो, विदेशी, अप्रचलित, पारिभाषिक, स्थानिक और प्रांतीय शब्द प्रयोगों का संक्षेपाक्षरों का और विशिष्ट भाव में प्रयुक्त शब्दों का अर्थ दर्शित करने के लिए साक्ष्य दिया जा सकेगा |
    दृष्टांत

एक मूर्तिकार, क “मेरी सभी प्रतिमाएँ” ख को बेचने का करार करता है। क के पास प्रतिमान और प्रतिमा बनाने के औजार भी हैं। यह दर्शित कराने के लिए कि वह किसे बेचने का अभिप्राय रखता था, साक्ष्य दिया जा सकेगा।

  1. दस्तावेज के निबंधनों में फेरफार करने वाले करार का साक्ष्य कौन दे सकेगा – वे व्यक्ति, जो किसी दस्तावेज के पक्षकार या उनके हित प्रतिनिधि नहीं है, ऐसे किन्हीं भी तथ्यों का साक्ष्य दे सकेंगे,जो दस्तावेज के निबंधनों में फेरफार करने वाले किसी समकालीन करार को दर्शित करने की प्रवत्ति रखते हों
    दृष्टांत

क और ख लिखित संविदा करते हैं कि क को कुछ कपास ख बेचेगा जिसके लिए संदाय कपास के परिदान किए जाने पर किया जाएगा। उसी समय वे एक मौखिक करार करते हैं कि क को तीन मास का प्रत्यय दिया जाएगा। क और ख के बीच यह तथ्य दर्शित नहीं किया जा सकता था, किन्तु यदि यह ग के हित पर प्रभाव डालता है, तो यह ग द्वारा दर्शित किया जा सकेगा।

  1. भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के विल संबंधी उपबंधों की व्यावृत्ति – इस अध्याय की कोई भी बात विल का अर्थ लगाने के बारे में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (1865 का 10)1 के किन्हीं भी उपबंधों पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जायेगी |
    भाग 3
    साक्ष्य का पेश किया जाना और प्रभाव
    अध्याय 7
    सबूत का भार के विषय में
  2. सबूत का भार — जो कोई न्यायालय से यह चाहता है कि वह ऐसे किसी विधिक अधिकार या दायित्व के बारे में निर्णय दे, जो उन तथ्यों के अस्तित्व पर निर्भर है, जिन्हें वह प्राख्यात करता है, उसे साबित करना होगा कि उन तथ्यों का अस्तित्व है |
    जब कोई व्यक्ति किसी तथ्य का अस्तित्व साबित करने के लिए आबद्ध है, तब यह कहा जाता है कि उस व्यक्ति पर सबूत का भार है |
    दृष्टांत

(क) क न्यायालय से चाहता है कि वह ख को उस अपराध के लिए दण्डित करने का निर्णय दे जिसके बारे में क कहता है कि वह ख ने किया है।
क को यह साबित करना होगा कि ख ने वह अपराध किया है।
(ख) क न्यायालय से चाहता है कि न्यायालय उन तथ्यों के कारण जिनके सत्य होने का वह प्राख्यान और ख
प्रत्याख्यान करता है, यह निर्णय दे कि वह ख के कब्जे में की अमुक भूमि का हकदार है। क को उन तथ्यों का अस्तित्व साबित करना होगा।

  1. सबूत का भार किस पर होता है — किसी वाद या कार्यवाही में सबूत का भार उस व्यक्ति पर होता है जो असफल हो जायेगा, यदि दोनों में से किसी भी और से कोई भी साक्ष्य न दिया जाये |
    दृष्टांत

(क) ख पर उस भूमि के लिए क वाद लाता है जो ख के कब्जे में है और जिसके बारे में क प्राख्यान करता है। कि वह ख के पिता ग की विल द्वारा क के लिए दी गई थी। यदि किसी भी ओर से कोई साक्ष्य नहीं दिया जाए, तो ख इसका हकदार होगा कि वह अपना कब्जा रखे रहे।
अतः सबूत का भार क पर है।
(ख) ख पर एक बंधपत्र मद्धे शोध्य धन के लिए के बाद लाता है।
उस बंधपत्र का निष्पादन स्वीकृत है, किन्तु ख कहता है कि वह कपट द्वारा अभिप्राप्त किया गया था, जिस बात का क प्रत्याख्यान करता है। यदि दोनों में से किसी भी ओर से कोई साक्ष्य नहीं दिया जाए, तो क सफल होगा, क्योंकि बंधपत्र विवादग्रस्त नहीं है और कपट साबित नहीं किया गया।
अतः सबूत का भार ख पर है।

  1. विशिष्ट तथ्य के बारे में सबूत का भार — किसी विशिष्ट तथ्य के सबूत का भार उस व्यक्ति पर होता है जो न्यायालय से यह चाहता है के उसके अस्तित्व में विश्वास करे, जब तक कि किसी विधि द्वारा यह उपबंधित न हो कि उस तथ्य के सबूत का भार किसी विशिष्ट व्यक्ति पर होगा |
    दृष्टांत

(क) ख को क चोरी के लिए अभियोजित करता है और न्यायालय से यह चाहता है कि न्यायालय यह विश्वास करे कि ख ने चोरी की स्वीकृति ग से की। क को यह स्वीकृति साबित करनी होगी।
(ख) ख न्यायालय से चाहता है कि वह यह विश्वास करे कि प्रश्नगत समय पर वह अन्यत्र था। उसे यह बात साबित करनी होगी।

  1. साक्ष्य को ग्राह बनाने के लिए जो तथ्य साबित किया जाना हो , उसे साबित करने का भार — ऐसे तथ्य को साबित करने का भार, जिसका साबित किया जाना किसी व्यक्ति को किसी अन्य तथ्य का साक्ष्य देने को समर्थ करने के लिए आवश्यक है, उस व्यक्ति पर है जो ऐसा साक्ष्य देना चाहता है |
    दृष्टांत

(क) ख द्वारा किए गए मृत्युकालिक कथन को क साबित करना चाहता है। क को ख की मृत्यु साबित करनी होगी।
(ख) क किसी खोई हुई दस्तावेज की अन्तर्वस्तु को द्वितीयक साक्ष्य द्वारा साबित करना चाहता है। क को यह साबित करना होगा कि दस्तावेज खो गई है।

  1. यह साबित करने का भार कि अभियुक्त का मामला अपवादों के अंतर्गत आता है — जबकि कोई व्यक्ति किसी अपराघ का अभियुक्त है, तब उन परिस्थितियों के अस्तित्व को साबित करने का भार, जो उस मामले को भारतीय दंड विधान, 1860(1860का 45) के साधारण अपवादों में से किसी के अंतर्गत या उसी संहिता के किसी अन्य भाग में, या उस अपराघ की परिभाषा करने वाली किसी विधि में, अंतर्विष्ट किसी विशेष अपवाद या परंतुक के अंतर्गत कर देती है, उस व्यक्ति पर है और न्यायालय ऐसी परिस्थितियों के अभाव की उपधारणा करेगा |
    दृष्टांत

(क) हत्या का अभियुक्त, क अभिकथित करता है कि वह चित्त-विकृति के कारण उस कार्य की प्रकृति नहीं जानता था। सबूत का भार क पर है।
(ख) हत्या का अभियुक्त, क, अभिकथित करता है कि वह गंभीर और अचानक प्रकोपन के कारण आत्मनियंत्रण की शक्ति से वंचित हो गया था। सबूत का भार क पर है।
(ग) भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 325 उपबंध करती है कि जो कोई उस दशा के सिवाय जिसके लिए धारा 335 में उपबंध है, स्वेच्छया घोर उपहति करेगा, वह अमुक दण्डों से दण्डनीय होगा। क पर स्वेच्छया घोर उपहति कारित करने का, धारा 325 के अधीन आरोप है। इस मामले को धारा 335 के अधीन लाने वाली परिस्थितियों को साबित करने का भार क पर है।

  1. विशेषतः ज्ञात तथ्य को साबित करने का भार — जबकि कोई तथ्य विशेषतः किसी व्यक्ति के ज्ञान में है, तब उस तथ्य को साबित करने का भार उस पर है |
    दृष्टांत

(क) जबकि कोई व्यक्ति किसी कार्य को उस आशय से भिन्न किसी आशय से करता है, जिसे उस कार्य का स्वरूप और परिस्थितियाँ इंगित करती हैं, तब उस आशय को साबित करने का भार उस पर है।
(ख) क पर रेल से बिना टिकट यात्रा करने का आरोप है। यह साबित करने का भार कि उसके पास टिकट था, उस पर है |

  1. उस व्यक्ति की मृत्यु साबित करने का भार जिसका तीस वर्ष के भीतर जीवित होना ज्ञात है — जबकि प्रश्न यह है कि कोई मनुष्य जीवित है या मर गया है और यह दर्शित किया गया है कि वह तीस वर्ष के भीतर जीवित था तब यह साबित करने का भार कि वह मर गया है उस व्यक्ति पर है जो उसे प्रतिज्ञात करता है |
  2. यह साबित करने का भार कि वह व्यक्ति , जिसके बारे में सात वर्ष से कुछ सुना नहीं गया है , जीवित है — परंतु जबकि प्रश्न यह है कि कोई मनुष्य जीवित है या मर गया है और यह साबित किया गया है कि उसके बारे में सात वर्ष से उन्होंने कुछ नहीं सुना है, जिन्होंने उसके बारे में यदि वह जीवित होता तो स्वाभाविकतया सुना होता, तब यह साबित करने का भार कि वह जीवित है, उस व्यक्ति पर चला जाता है जो उसे प्रतिज्ञात करता है |
  3. भागीदारी , भू – स्वामी और अभिधारी , मालिक और अभिकर्ता के मामलों में सबूत का भार — जबकि प्रश्न यह है कि क्या कोई व्यक्ति भागीदार, भू-स्वामी और अभिधारी या मालिक और अभिकर्ता है और यह दर्शित कर दिया गया है कि वे इस रूप में कार्य करते है तब यह साबित करने का भार कि क्रमशः इन संबंधो में वे परस्पर उपस्थित नहीं है या अवस्थित होने से परिविरत हो चुके है, उस व्यक्ति पर है, उसे प्रतिज्ञात करता है |
  4. स्वामित्व के बारे में सबूत का भार — जबकि प्रश्न यह है कि क्या कोई व्यक्ति ऐसी किसी चीज का स्वामी है जिस पर उसका कब्जा होना दर्शित किया गया है, तब यह साबित करने का भार कि वह स्वामी नहीं है, उस व्यक्ति पर है जो प्रतिज्ञात करता है कि वह स्वामी नहीं है
  5. उन संव्यवहारों में सदभाव का साबीत किया जाना , जिसमें एक पक्षकार का संबंध सक्रिय विश्वास का है — जहां कि उन पक्षकारों के बीच के संव्यवहार के सदभाव के बारे में प्रश्न है, जिनमें से एक-दूसरे के प्रति सक्रिय विश्वास की स्थिति में है वहां, उस संव्यवहार के सदभाव को साबित करने का भार उस पक्षकार पर है जो सक्रिय विश्वास की में है |
    दृष्टांत

(क) कक्षीकार द्वारा अटर्नी के पक्ष में किये गए विक्रय का सदभाव कक्षीकार द्वारा लाए गए वाद में प्रश्नगत है। संव्यवहार का सदभाव साबित करने का भार अटर्नी पर है।
(ख) पुत्र द्वारा, जो कि हाल ही में प्राप्तवय हुआ है, पिता को किए गए किसी विक्रय का सदभाव पुत्र द्वारा लाए गए वाद में प्रश्नगत है। संव्यवहार के सदभाव को साबित करने का भार पिता पर है।
111क. कुछ अपराधों के बारे में उपधारणा—
(1) जहां कोई व्यक्ति उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट ऐसे किसी अपराघ के-
(क) ऐसे किसी क्षेत्र में, जिसे उपद्रव को दबाने के लिए और लोक व्यवस्था की बहाली और उसे बनाए रखने के लिए उपबंध करने वाली तत्समय प्रवृत किसी अधिनियमित के अधीन विक्षुब्‍ध क्षेत्र घोषित किया गया है, या
(ख) ऐसे किसी क्षेत्र में, जिसमें एक मास से अधिक की अवधि के लिए लोक शांति में व्यापक विघ्न रहा है,
किए जाने का अभियुक्त है और यह दर्शित किया जाता है कि ऐसा व्यक्ति ऐसे क्षेत्र में किसी स्थान पार ऐसे समय पर था जब ऐसे किसी सशस्त्र बल या बलों के, जिन्हें लोक व्यवस्था बनाए रखने का भार सौंपा गया है, ऐसे सदस्यों पर जो अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे है, आक्रमण करने के लिए या उनका प्रतिरोध करने के लिए उस स्थान पर या उस स्थान से अग्नायुधों या विस्फोटकों का प्रयोग किया गया था, वहां जब तक तद्प्रतिकूल दर्शित नहीं किया जाता है यह उपधारणा की जाएगी कि ऐसे व्यक्ति ने ऐसा अपराध किया है |
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट अपराध निम्नलिखित हैं, अर्थात
(क) भारतीय दंड संहिता, 1860 (1860 का 45) की धारा 121, धारा 121-क; धारा 122 या धारा 123 के अधीन कोई अपराध,
(ख) अपराधिक षड्यंत्र या भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (1860 का 45) की धारा 122 का धारा 123 के अधीन कोई अपराध करने का प्रयत्न या उसका दुष्प्रेरण |

  1. विवाहित स्थिति के दौरान में जन्म होना धर्मजत्व का निश्चायक सबूत है — यह तथ्य कि किसी व्यक्ति का जन्म उसकी माता और किसी पुरुष के बीच विधिमान्य विवाह को कायम रखते हुए या उसका विघटन होने के उपरांत माता के अविवाहित रहते हुए दो सौ अस्सी दिन के भीतर हुआ था, इस बात का निश्चायक सबूत होगा कि वह उस पुरुष का धर्मज पुत्र है, जब तक कि यह दर्शित न किया जा सके कि विवाह के पक्षकारों की परस्पर पहुंच ऐसे किसी समय नहीं थी जब उसका गर्भाधान किया जा सकता था |
  2. राज्य क्षेत्र के अध्यर्पण का सबूत — शासकीय राजपत्र में यह अधिसूचना कि ब्रिटिश राज्यक्षेत्र का कोई भाग, किसी भारतीय राज्य, राजा या शासक को गवर्मेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 के भाग 3 के प्रारंभ से पूर्व (26 ज . 5, अ. 2) अध्यर्पित किया गया है, इस बात का निश्चायक सबूत होगा कि ऐसे राज्यक्षेत्र का ऐसी अधिसूचना में वर्णित तारीख को विधिमान्य अध्यर्पण हुआ |
    113-क. किसी विवाहित स्त्री द्वारा आत्महत्या के दुष्प्रेरण को बारे में उपधारणा — जब प्रश्न यह है कि किसी स्त्री द्वारा आत्महत्या का करना उसके पति के किसी नातेदार द्वारा दुष्प्रेरित किया गया है, और यह दर्शित किया गया है कि उसने अपने विवाह की तारीख से सात वर्ष की अवधि के भीतर आत्महत्या की थी और यह कि उसके पति या उसके पति के ऐसे नातेदार ने उसके प्रति क्रूरता की थी, तो न्यायालय मामले की सभी अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह उपधारणा कर सकेगा कि ऐसी आत्महत्या उसके पति या उसके पति के ऐसे नातेदार द्वारा दुष्प्रेरित की गई थी |
    स्पष्टीकरण — इस धारा के प्रयोजनों के लिए “क्रूरता” का वही अर्थ है, जो भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 498-क में है |
    113-ख. दहेज मृत्यु के बारे में उपधारणा- जब प्रश्न यह है कि किसी व्यक्ति ने किसी स्त्री की दहेज मृत्यु की है और यह दर्शित किया जाता है कि मृत्यु के कुछ पूर्व ऐसे व्यक्ति ने दहेज की माँग के लिए, या उसके संबंध में उस स्त्री के साथ क्रूरता की थी या उसको तंग किया था तो न्यायालय यह उपधारणा करेगा कि ऐसा व्यक्ति ने दहेज मृत्यु कारित की थी |
    स्पष्टीकरण — इस धारा के प्रयोजनों के लिए “दहेज मृत्यु” का वही अर्थ है जो भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 304 ख में है |
  3. न्यायालय किन्हीं तथ्यों का अस्तित्व उपधारित कर सकेगा — न्यायालय ऐसे किसी तथ्य का अस्तित्व उपधारित कर सकेगा जिसका घटित होना उस विशिष्ट मामले के तथ्यों के संबंध में प्राकृतिक धटनाओं, मानवीय आचरण तथा लोक प्राइवेट कारबार के सामान्य अनुक्रम को ध्यान में रखते हुए वह संभाव्य समझता है |
    दृष्टांत

न्यायालय उपधारित कर सकेगा :-
(क) कि चुराए हुए माल पर जिस मनुष्य का चोरी के शीघ्र उपरान्त कब्जा है, जब तक कि वह अपने कब्जे का कारण न बता सके, या तो वह चोर है या उसने माल को चुराया हुआ जानते हुए प्राप्त किया है;
(ख) कि सह-अपराधी विश्वसनीयता के अयोग्य है, जब तक कि तात्विक विशिष्टियों में उसकी संपुष्टि नहीं होती;
(ग) कि कोई प्रतिगृहीत या पृष्ठांकित विनिमयपत्र समुचित प्रतिफल के लिए प्रतिगृहीत या पृष्ठांकित किया गया था;
(घ) कि ऐसी कोई चीज या चीजों की दशा अब भी अस्तित्व में है, जिसका उतनी कालावधि से, जितनी में ऐसी चीजें या चीजों की दशाएं प्रायः अस्तित्व शून्य हो जाती है, लघुतर कालावधि में अस्तित्व में होना दर्शित किया गया है:
(ङ) कि न्यायिक और पदीय कार्य नियमित रूप में संपादित किए गए हैं।
(च) कि विशिष्ट मामलों में कारबार के सामान्य अनुक्रम का अनुसरण किया गया है
(छ) कि यदि वह साक्ष्य जो पेश किया जा सकता था और पेश नहीं किया गया है, पेश किया जाता तो, उस व्यक्ति के अननुकूल होता, जो उसका विधारण किए हुए है;
(ज) कि यदि कोई मनुष्य ऐसे किसी प्रश्न का उत्तर देने से इंकार करता है, जिसका उत्तर देने के लिए वह विधि द्वारा विवश नहीं है, तो उत्तर यदि दिया जाता, उसके अननुकूल होता;
(झ) कि जब किसी बाध्यता का सृजन करने वाली दस्तावेज बाध्यताधारी के हाथ में है, तब उस बाध्यता का उन्मोचन हो चुका है। किन्तु न्यायालय यह विचार करने में कि ऐसे सूत्र उसके समक्ष के विशिष्ट मामले को लागू होते हैं या नहीं, निम्नलिखित प्रकार के तथ्यों का भी ध्यान रखेगा :-
दृष्टांत (क) के बारे में — किसी दुकानदार के पास उसके गल्ले में कोई चिह्नित रुपया उसके चुराए जाने के शीघ्र पश्चात् है और वह उसके कब्जे का कारण विनिर्दिष्टत: नहीं बता सकता, किन्तु अपने कारबार के अनुक्रम में वह रुपये लगातार प्राप्त कर रहा है;
दृष्टांत (ख) के बारे में — एक अत्यन्त ऊँचे शील का व्यक्ति, क, किसी मशीनरी को ठीक-ठीक लगाने में किसी उपेक्षापूर्वक कार्य द्वारा किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करने के लिए विचारित है। वैसा ही अच्छे शील का व्यक्ति, ख, जिसने मशीनरी लगाने के उस काम में भाग लिया था, ब्यौरेवार वर्णन करता है कि क्या-क्या किया गया था, और क की और स्वयं अपनी सामान्य असावधानी स्वीकृत और स्पष्ट करता है;
दृष्टांत (ख) के बारे में — कोई अपराध कई व्यक्तियों द्वारा किया जाता है, अपराधियों में से तीन क, ख और ग घटनास्थल पर पकड़े जाते हैं और वे एक-दूसरे से अलग रखे जाते हैं। अपराध का विवरण उनमें से हर एक ऐसा देता है जो घ को आलिप्त करता है और ये विवरण एक दूसरे को किसी ऐसी रीति में सम्पुष्ट करते हैं जिससे उनमें यह अति अनधिसम्भाव्य हो जाता है कि उन्होंने इसके पूर्व मिलकर कोई योजना बनाई थी।
दृष्टांत (ग) के बारे में — किसी विनिमय-पत्र का लेखीवाल के व्यापारी था। प्रतिगृहीता ख पूर्णतः क के असर के अधीन एक युवक और नासमझ व्यक्ति था;
दृष्टांत (घ) के बारे में — यह साबित किया गया है कि कोई नदी अमुक मार्ग में पाँच वर्ष पूर्व बहती थी, किन्तु यह ज्ञात है कि उस समय से ऐसी बाढ़ आई हैं जो उसके मार्ग को परिवर्तित कर सकती थी;
दृष्टांत (ङ) के बारे में — कोई न्यायिक कार्य, जिसकी नियमितता प्रश्नगत है, असाधारण परिस्थितियों में किया गया था;
दृष्टांत (च) के बारे में — प्रश्न यह है कि क्या कोई पत्र प्राप्त हुआ था। उसका डाक में डाला जाना दर्शित किया गया है किन्तु डाक के सामान्य अनुक्रम में उपद्रवों के कारण विघ्न पड़ा था;
दृष्टांत (छ) के बारे में — कोई मनुष्य किसी ऐसी दस्तावेज को पेश करने से इंकार करता है जिसका असर किसी अल्प महत्व की ऐसी संविदा पर पड़ता है, जिसके आधार पर उसके विरुद्ध वाद लाया गया है, किन्तु जो उसके कुटुम्ब की भावनाओं और ख्याति को भी क्षति पहुंचा सकती है;
दृष्टांत (ज) के बारे में — कोई मनुष्य किसी प्रश्न का उत्तर देने से इंकार करता है जिसका उत्तर देने के लिए वह विधि द्वारा विवश नहीं है, किन्तु उसका उत्तर उसे उस विषय से असंसक्त विषयों में हानि पहुंचा सकता है, जिसके संबंध में वह पूछा गया है;
दृष्टांत (झ) के बारे में — कोई बंधपत्र बाध्यताधारी के कब्जे में है, किन्तु मामले की परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि हो सकता है उसने उसे चुराया हो।
114क. बलात्संग के लिए कतिपय अभियोजन में सम्मति के न होने के बारे में उपधारणा – भारतीय दंड संहिता(1860 का 45) की धारा 376 की उपधारा (2) के खंड (क), खंड (ख), खंड (ग), खंड (घ), खंड (ड), खंड (च), खंड (छ), खंड (ज), खंड (झ), खंड (ञ), खडं (ट), खंड (ठ), खंड (ड), खंड (ढ), के अधीन बलात्संग के किसी अभियोजन में, जहाँ अभियुक्त द्वारा मैथुन किया जाना साबित हो जाता है और प्रश्न यह है कि क्या वह उस स्त्री की, जिसके बारे में यह अभिकथन किया गया है कि उससे बलात्संग किया गया है, सम्मति के बिना किया गया और ऐसी स्त्री अपने साक्ष्य में न्यायालय के समक्ष यह कथन करती है कि उसने सम्मति नहीं दी थी, वहाँ न्यायालय यह उपधारणा करेगा कि उसने सम्मति नहीं दी थी |

स्पष्टीकरण – इस धारा में “मैथुन” से भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 375 के खंड (क) से खंड (घ) में वर्णित कोई कार्य अभिप्रेत होगा |

राज्य संशोधन

छत्तीसगढ़ — धारा 114क के पश्चात्, निम्नलिखित अंत:स्थापित किया जाए, अर्थात् :-

“114ख. भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 354, धारा 354क, धारा 354ख, धारा 354ग, धारा 354घ, धारा 509, धारा 509क या धारा 509ख के अधीन कारित अपराधों के संबंध में उपधारणा —

जब प्रश्न यह है कि क्या भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 354, धारा 354क, धारा 354ख, धारा 354ग, धारा 354घ, धारा 509, धारा 509क या धारा 509ख के अंतर्गत किसी व्यक्ति ने अपराध कारित किया है और यदि पीड़ित, न्यायालय के समक्ष यह कथन करती है कि उसका यौन उत्पीड़न हुआ या उसकी लज्जा भंग हुई अथवा उसके कपड़े उतारे गए अथवा उसका पीछा किया गया या उसकी निजता में हस्तक्षेप किया गया अथवा वह किन्हीं साधनों द्वारा यौन उत्पीड़ित की गई, यथास्थिति, वहां न्यायालय, जब तक कि विपरीत साबित न हो, तब तक यह उपधारणा कर सकेगा कि ऐसा अपराध उस व्यक्ति द्वारा कारित किया गया है।”।

[देखें दण्ड विधि (छ.ग. संशोधन) अधिनियम, 2013 (25 सन् 2015), धारा 14 (दि. 21-7-2015 से प्रभावशील)। छ.ग. राजपत्र (असा.) दि. 21-7-2015 पृष्ठ 777-778(9) पर प्रकाशित ।]

अध्याय 8
विबंध

  1. विबंध — जबकि एक व्यक्ति ने अपनी घोषणा, कार्य या लोप द्वारा अन्य व्यक्ति को विश्वास साशय कराया है या कर लेने दिया है कि कोई बात सत्य है और ऐसे विश्वास पर कार्य कराया या करने दिया है, तब न तो उसे और न उसके प्रतिनिधि को अपने और ऐसे व्यक्ति के, या उसके प्रतिनिधि के बीच किसी वाद या कार्यवाही में उस बात की सत्यता का प्रत्याख्यान करने दिया जाएगा |
    दृष्टांत

क साशय और मिथ्या रूप से ख को यह विश्वास करने के लिए प्रेरित करता है कि अमुक भूमि क की है, और तदद्वारा द्वारा ख को उसे क्रय करने और उसका मूल्य चुकाने के लिए उत्प्रेरित करता है।
तत्पश्चात् भूमि क की सम्पत्ति हो जाती है और क इस आधार पर कि विक्रय के समय उसका उसमें हक नहीं था, विक्रय अपास्त करने की ईप्सा करता है। उसे अपने हक का अभाव साबित नहीं करने दिया जाएगा।

  1. अभिधारी का और कब्जाधीन व्यक्ति के अनुज्ञप्तिधारी का विबंध — स्थावर संपत्ति के किसी भी अधिकारी को या ऐसे अभिधारी से व्युत्पन्न अधिकार से वादा करने वाले व्यक्ति को, ऐसी अभिधृति के चालू रहते हुए, इसका प्रत्याख्यान न करने दिया जायेगा कि ऐसे अभिधारी के भू-स्वामी का ऐसी स्थावर संपत्ति पर, उस अभिवृत्ति के आरंभ पर हक था तथा किसी भी व्यक्ति को, जो किसी स्थावर संपत्ति पर उस पर कब्जाधारी व्यक्ति की अनुज्ञप्ति द्वारा आया है, इसका प्रत्याख्यान न करने दिया जायेगा कि ऐसे व्यक्ति को उस समय, जब ऐसी अनुज्ञप्ति दी गई थी, ऐसे कब्जे का हक था |
  2. विनिमय पत्र के प्रतिग्रहीता का , उपनिहिती का या अनुज्ञप्तिधारी का विबंध — किसी विनिमय – पत्र के प्रतिगृहीत को इसका प्रत्याख्यान करने की अनुज्ञा न दी जायेगी कि लेखीवाल को ऐसा विनिमय – पत्र लिखने या उसे पृष्ठांकित करने का प्राधिकार था, और न किसी उपनिहिती या अनुज्ञप्तिधारी को इसका प्रत्याख्यान करने दिया जायेगा कि उपनिधाता या अनुज्ञापक को उस समय, जब ऐसा उपनिधान या अनुज्ञप्ति आरंभ हुई, ऐसे उपनिधान करने या अनुज्ञप्ति अनुदान करने का प्राधिकार था |
    स्पष्टीकरण 1- किसी विनिमय – पत्र का प्रतिग्रहीती इसका प्रत्याख्यान कर सकता है कि विनिमय – पत्र वास्तव में उस व्यक्ति द्वारा लिखा गया था जिसके द्वारा लिखा गया वह तात्पर्यित है |
    स्पष्टीकरण 2- यदि कोई उपनिहिती, उपनिहित माल उपनिधाता से अन्य किसी व्यक्ति को परिदत्त करता है, तो वह साबित कर सकेगा कि ऐसे व्यक्ति का उस पर उपनिधाता के विरुद्ध अधिकार था |
    अध्याय 9
    साक्षियों के विषय में
  3. कौन साक्ष्य दे सकेगा — सभी व्यक्ति साक्ष्य देने के लिए सक्षम होंगे, जब तक कि न्यायालय का यह विचार न हो कि कोमल वयस, अतिवार्धक्य शरीर के या मन रोग या इसी प्रकार के किसी अन्य कारण से वे उनसे किए गए प्रश्नों को समझने से या उन प्रश्नों के युक्तिसंगत उत्तर देने से निवारित हैं |
    स्पष्टीकरण — कोई पागल व्यक्ति साक्ष्य देने के लिए अक्षम नहीं है, जब तक कि वह अपने पागलपन के कारण उससे किए गए प्रश्नों को समझने से या उनके युक्तिसंगत उत्तर देने से निवारित न हो |
  4. साक्षी का मौखिक रूप से संसूचित करने में असमर्थ होना — ऐसा कोई साक्षी, जो बोलने में असमर्थ है, ऐसी किसी अन्य रीति में, जिससे वह उसे बोधगम्य बना सकता है जैसे कि लिखकर या संकेत चिन्हों द्वारा, अपना साक्ष्य दे सकेगा; किंतु ऐसा लेखन लिखित रूप में होना चाहिए और खुले न्यायालय में प्रकट संकेत चिन्ह तथा इस प्रकार दिया गया साक्ष्य मौखिक साक्ष्य माना जाएगा:
    परंतु यदि साक्षी मौखिक रूप से संसूचित करने में असमर्थ है तो न्यायालय कथन अभिलिखित करने में किसी द्विभाषित या विशेष प्रबोधक की सहायता लेगा और ऐसे कथन की वीडियो फिल्म तैयार की जा सकेगी |
  5. सिविल वाद के पक्षकार और उनकी पत्नियाँ या पति दांडिक विचारण के अधीन व्यक्ति का पति या पत्नी — सभी सिविल कार्यवाहियों में वाद पक्षकार और वाद के किसी पक्षकार या पति या पत्नी सक्षम साक्षी होंगे | किसी व्यक्ति के विरुद्ध दांडिक कार्यवाही में उस व्यक्ति का पति या पत्नी सक्षम साक्षी होगा या होगी |
  6. न्यायाधीश और मजिस्ट्रेट — कोई भी न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट न्यायालय में ऐसे न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट के नाते अपने स्वयं के आचरण के बारे में, या ऐसी किसी बात के बारे में, जिसका ज्ञान उसे ऐसे न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट के नाते न्यायालय में हुआ, किन्हीं प्रश्नों का उत्तर देने के लिए ऐसे किसी न्यायालय के विशेष आदेश के सिवाय, जिसके वह अधीनस्थ है, विवश नहीं किया जाएगा; किंतु अन्य बातों के बारे में, जो उसकी उपस्थिति में उस समय घटित हुई थी, जब वह ऐसे कार्य कर रहा था उसकी परीक्षा की जा सकेगी |
    दृष्टांत

(क) सेशन न्यायालय के समक्ष अपने विचारण में क कहता है कि अभिसाक्ष्य मजिस्ट्रेट ख द्वारा अनुचित रूप से लिया गया था। तदविषयक प्रश्नों का उत्तर देने के लिए ख को किसी वरिष्ठ न्यायालय के विशेष आदेश के सिवाय विवश नहीं किया जा सकता।
(ख) मजिस्ट्रेट ख के समक्ष मिथ्या साक्ष्य देने का क सेशन न्यायालय के समक्ष अभियुक्त है। वरिष्ठ न्यायालय के विशेष आदेश के सिवाय ख से यह नहीं पूछा जा सकता है कि क ने क्या कहा था।
(ग) क सेशन न्यायालय के समक्ष इसलिए अभियुक्त है कि उसने सेशन न्यायाधीश ख के समक्ष विचारित होते समय किसी पुलिस ऑफिसर की हत्या करने का प्रयत्न किया। ख की यह परीक्षा की जा सकेगी कि क्या घटित हुआ था।

  1. विवाहित स्थिति के दौरान में की गई संसूचनाएँ — कोई भी व्यक्ति, जो विवाहित है या जो विवाहित रह चूका है, किसी संसूचना को, जो किसी व्यक्ति द्वारा, जिससे वह विवाहित है या रह चूका है, विवाहित स्थिति के दौरान में उसे दी गई थी, प्रकट करने के लिए विवश न किया जायेगा और न वह किसी ऐसी संसूचना को प्रकट करने के लिए अनुज्ञात किया जायेगा, जब तक वह व्यक्ति, जिसने वह संसूचना दी है या उसका हित-प्रतिनिधि सम्मत न हो, सिवाय उन वादों में, जो विवाहित व्यक्तियों के बीच हों, या उन कार्यवाहियों में, जिसमें एक विवाहित व्यक्ति दूसरे के विरुद्ध किए गए किसी अपराध के लिए अभियोजित है |
  2. राज्य का कार्य – कलापों के बारे में साक्ष्य — कोई भी व्यक्ति राज्य के किसी भी कार्य-कलापों से संबंधित अप्रकाशित शासकीय अभिलेखों से व्युत्पन्न कोई भी साक्ष्य देने के लिए अनुज्ञात न किया जायेगा, सिवाय संपृक्त विभाग के प्रमुख ऑफिसर की अनुज्ञा के को ऐसी अनुज्ञा देगा या उसे विधारित करेगा, जैसा करना वह ठीक समझे |
  3. शासकीय संसूचननाएँ — कोई भी लोक ऑफिसर उसे शासकीय विश्वास में दी हुई संसूचनाओं को प्रकट करने के लिए विवश नहीं किया जायेगा, जबकि वह समझता है कि उस प्रकटन से लोक हित की हानि होगी |
  4. अपराधों के करने के बारे में जानकारी — कोई भी मजिस्ट्रेट या पुलिस ऑफिसर या कहने के लिए विवश नहें किया जायेगा कि किसी अपराध के लिए जाने के बारे में उसे कोई जानकारी कहां से मिली और किसी भी राजस्व ऑफिसर को यह कहने के लिए विवश नहीं किया जायेगा कि उसे लोक राजस्व के विरुद्ध किसी अपराध के लिए जाने के बारे में कोई जानकारी कहां से मिली
    स्पष्टीकरण — इस धारा में “राजस्व ऑफिसर’ से लोक राजस्व की किसी शाखा के कारबार में या के बारे में नियोजित ऑफिसर अभिप्रेत है |
  5. वृत्तिक संसूचनाएँ — कोई भी बैरिस्टर, अर्टनी, प्लीडर या वकील अपने पक्षकार की अभिव्यक्त संपत्ति के सिवाय ऐसी किसी संसूचना को प्रकट करने के लिए, जो उसके ऐसे बैरिस्टर, अटर्नी , प्लीडर या वकील की हैसियत में नियोजन के अनुक्रम में या के प्रयोजनार्थ उसके पक्षकार द्वारा, या की और से उसे दी गई हो अथवा किसी दस्तावेज की, जिससे वह अपने वृत्तिक नियोजन के अनुक्रम में या के प्रयोजनार्थ परिचित हो गया है, अंतर्वस्तु या दशा कथित करने को अथवा किसी सलाह को, को ऐसे नियोजन के अनुक्र म में या के प्रयोजनार्थ उसने अपने पक्षकार को दी है, प्रकट करने के लिए किसी भी समय अनुज्ञात नहीं दिया जायेगा :
    परंतु इस धारा की कोई भी बात निम्नलिखित बात को प्रकटीकरण से संरक्षण न देगी—
    (1) किसी भी अवैध प्रयोजन को अग्रसर करने में दी गई कोई ऐसी संसूचना;
    (2) ऐसा कोई भी तथ्य जो किसी बैरिस्टर, प्लीडर, अर्टर्नी, या वकील ने अपनी ऐसी हैसियत में नियोजन के अनुक्रम में सम्प्रेक्षित किया हो, और जिसने दर्शित हो कि उसके नियोजन के प्रारंभ के पश्चात कोई अपराध या प्रकट किया गया है |
    यह तत्वहीन है कि ऐसे बैरिस्टर, प्लीडर, अटर्नी या वकील का ध्यान ऐसे तथ्य के प्रति उसके पक्षकार के द्वारा या की ओर से आकर्षित किया गया था या नहीं |
    स्पष्टीकरण — इस धारा में कथित बाध्यता नियोजन के अवसित हो जाने के उपरांत भी बनी रहती है |
    दृष्टांत

(क) कक्षीकार क, अटर्नी ख से कहता है, “मैने कूटरचना की है और मैं चाहता हूं कि आप मेरी प्रतिरक्षा करें”। यह संसूचना प्रकटन से संरक्षित है, क्योंकि ऐसे व्यक्ति की प्रतिरक्षा आपराधिक प्रयोजन नहीं है, जिसका दोषी होना ज्ञात हो।
(ख) कक्षीकार क, अटर्नी ख से कहता है, “मैं संपत्ति पर कब्जा कूटरचित विलेख के उपयोग द्वारा अभिप्राप्त करना चाहता हूं और इस आधार पर वाद लाने की मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ”।
यह संसूचना आपराधिक प्रयोजन के अग्रसर करने में की गई होने से प्रकटन से संरक्षित नहीं है।
(ग) क पर गबन का आरोप लगाए जाने पर वह अपनी प्रतिरक्षा करने के लिए अटर्नी ख को प्रतिधारित करता है। कार्यवाही के अनुक्रम में ख देखता है कि क की लेखाबही में यह प्रविष्टि की गई है कि क द्वारा उतनी रकम देनी है जितनी के बारे में अभिकथित है कि उसका गबन किया गया है, जो प्रविष्टि उसके नियोजन के आरंभ के समय उस बही में नहीं थी।
यह ख द्वारा अपने नियोजन के अनुक्रम में सम्प्रेक्षित ऐसा तथ्य होने से, जिससे दर्शित होता है कि कपट उस कार्यवाही के प्रारंभ होने के पश्चात् किया गया है, प्रकटन से संरक्षित नहीं है।

  1. धारा 126 दुभाषित आदि को लागू होगी — धारा 126 के उपबंध दुभाषियों ओर बैरिस्टरों, प्लीडरों, अटर्नियों ओर वकीलों के लिपिकों या सेवकों को लागू होंगे |
  2. साक्ष्य देने के लिए स्वयंमेव उधत होने से विशेषाधिकार अधित्यक्त नहीं हो जाता — यदि किसी वाद का कोई पक्षकार स्वप्रेरण से ही या अन्यथा उसमें साक्ष्य देता है तो यह न समझा जायेगा कि तदद्वारा उसने ऐसे प्रकटन के लिए, जैसा धारा 126 में वर्णित है, सम्मति दे दी है, तथा यदि किसी वाद या कार्यवाही का कोई पक्षकार ऐसे किसी बैरिस्टर, प्लीडर, अटर्नी या वकील को साक्षी के रूप में बुलाता है, यह कि उसने ऐसे प्रकटन के लिए अपनी सम्मति दे दी है केवल तभी समझा जायेगा, जबकि यह ऐसे बैरिस्टर, अटर्नी या वकील से उन बातों के बारे में प्रश्न करे जिनके प्रकटन के लिए वह ऐसे प्रश्नों के अभाव में स्वाधीन न होता |
  3. विधि सलाहकारों से गोपनीय संसूचनाएँ — कोई भी व्यक्ति किसी गोपनीय संसूचना को, जो उसके ओर उसके विधि-वृत्तिक सलाहकार के बीच हुई, न्यायालय को प्रकट करने के लिए विवश नहीं किया जायेगा, जब तक कि वह अपने को साक्षी के तौर पर पेश न कार दे; ऐसे पेश करने की दशा में किन्हीं भी ऐसी संसूचनाओं को, जिन्हें उस किसी साक्ष्य को स्पष्ट करने के लिए जानना, जो उसने दिया है, न्यायालय को आवश्यक प्रतीत हो, प्रकट करने के लिए विवश किया जा सकेगा, किंतु किन्हीं भी अन्य संसूचनाओं को नहीं |
  4. जो साक्षी पक्षकार नहीं है उसके हक विलेखों का पेश किया जाना — कोई भी साक्षी, जो वाद का पक्षकार नहीं है, किसी संपत्ति-संबंधी अपने हक-विलेखों को या किसी ऐसी दस्तावेज को, जिसके बल पर वह गिरवीदार या बंधकदार के रूप में कोई संपत्ति धारण करता है या किसी दस्तावेज को, जिसका पेशकरण उसे अपराध में फसानें की प्रवृति रखता है, उन्हें पेश करने के लिए विवश नहीं किया जायेगा, जब तक कि उसने ऐसे विलेखों के पेशकरण की ईप्सा रखने वाले व्यक्ति के साथ, या ऐसे किसी व्यक्ति के साथ जिसने व्युत्पन्न अधिकार से वह व्यक्ति दावा करता है, उन्हें पेश करने का लिखित करार न कर लिया हो |
  5. उन दस्तावेजों या इलेक्ट्रोनिक अभिलेखों का पेश किया जाना, जिन्हें दूसरा व्यक्ति, जिसका उन पर कब्जा है, पेश करने से इंकार कर सकता था— कोई भी व्यक्ति अपने कब्जे में की ऐसे दस्तावेजों या अपने नियंत्रण वाले इलेक्ट्रोनिक अभिलेखों को पेश करने के लिए, जिनको पेश करने के लिए कोई अन्य व्यक्ति, यदि वे उसके कब्जे या नियंत्रण में होते, पेश करने से इन्कार करने का हक़दार होता, विवश नहीं किया जाएगा, जब तक कि ऐसा अंतिम वर्णित व्यक्ति उन्हें पेश करने के लिए सम्मति नहीं देता |
  6. इस आधार पर कि उत्तर उसे अपराध में फँसाएगा , साक्षी उत्तर देने से क्षम्य न होगा — कोई साक्षी किसी वाद या किसी सिविल दांडिक कार्यवाही में विवाद्यक विषय से सुसंगत किसी विषय के बारे में किए गए किसी प्रश्न का उत्तर देने से एस आधार पर क्षम्य नहीं होंगा कि ऐसे प्रश्न का उत्तर ऐसे साक्षी को अपराध में फँसायेगा, या उसकी प्रवृति प्रत्यक्षत: या परोक्षतः अपराध में फंसाने की होगी अथवा ऐसे साक्षी को किसी किस्म की शास्ति या समपहरण के लिए उच्छन्न करेगा या इसकी प्रवृति प्रत्यक्षतः या परोक्षतः उच्छन्न करने की होगी |
    परंतुक — परंतु ऐसा कोई भी उत्तर, जिसे देने के लिए कोई साक्षी विवश किया जायेगा, उसे गिरफ्तारी या अभियोजन के अध्यधीन नहीं करेगा ओर न ऐसे उत्तर द्वारा मिथ्या साक्ष्य देने के लिए अभियोजन में के सिवाय वह उसके विरुद्ध किसी दांडिक कार्यवाही में साबित किया जायेगा |
  7. सह – अपराधी — सह-अपराधी, अभियुक्त व्यक्ति के विरुद्ध सक्षम साक्षी होगा ओर कोई दोषसिद्धि केवल इसलिए अवैध नहीं है कि वह सह-अपराधी के असंपुष्ट परिसाक्ष्य के आधार पर की गई है |
  8. साक्षियों की संख्या — किसी मामले में किसी तथ्य को साबित करने के लिए साक्षियों की कोई विशिष्ट संख्या अपेक्षित नहीं होगी |
    अध्याय 10
    साक्षियों की परीक्षा के विषय में
  9. साक्षियों के पेशकरण ओर उनकी परीक्षा का क्रम — साक्षियों के पेशकरण ओर उनकी परीक्षा का क्रम क्रमशः सिविल ओर दंड प्रकिया से तत्समय संबंधित विधि ओर पध्दति द्वारा तथा ऐसी विधि के अभाव में न्यायालय के विवेक द्वारा विनियमित होगा |
  10. न्यायाधीश साक्ष्य की ग्राह्राता के बारे में निश्चय करेगा — जबकि दोनों में से कोई पक्षकार किसी तथ्य का साक्ष्य देने की प्रस्थापना करता है, तब न्यायाधीश साक्ष्य देने की प्रस्थापना करने वाले पक्षकार से पूछ सकेगा कि अभिकथित तथ्य, यदि वह साबित हो जाए, किस प्रकार सुसंगत होगा ओर यदि न्यायाधीश यह समझता है कि वह तथ्य यदि साबित हो गया हो सुसंगत होगा, तो वह उस साक्ष्य को ग्रहण करेगा अन्यथा नहीं |
    यदि वह तथ्य, जिसका साबित करना प्रस्थापित है, जिसका साक्ष्य किसी अन्य तथ्य के साबित होने पर ही ग्राह्रा होता है, तो ऐसा अंतिम वर्णित तथ्य प्रथम वर्णित तथ्य का साक्ष्य दिए जाने के पूर्व साबित करना होगा, जब तक कि पक्षकार ऐसे तथ्य को साबित करने का वचन न दे दे ओर न्यायालय ऐसे वचन से संतुष्ट न हो जाए |
    यदि एक अभिकथित तथ्य की सुसंगति अन्य अभिकथित तथ्य के प्रथम साबित होने पर निर्भर हो, तो न्यायाधीश अपने विवेकानुसार या तो दूसरे तथ्य के साबित होने के पूर्व प्रथम तथ्य का साक्ष्य दिया जाना अनुज्ञात कर सकेगा या प्रथम तथ्य का साक्ष्य दिए जाने के पूर्व द्वितीय तथ्य का साक्ष्य दिए जाने की अपेक्षा का सकेगा |
    दृष्टांत

(क) यह प्रस्थापना की गई है कि एक व्यक्ति के, जिसका मृत होना अभिकथित है, सुसंगत तथ्य के बारे में एक कथन को, जो कि धारा 32 के अधीन सुसंगत है, साबित किया जाए।
इससे पूर्व कि उस कथन का साक्ष्य दिया जाए उस कथन के साबित करने की प्रस्थापना करने वाले व्यक्ति को यह तथ्य साबित करना होगा कि वह व्यक्ति मर गया है।
(ख) यह प्रस्थापना की गई है कि ऐसी दस्तावेज की अन्तर्वस्तु को, जिसका खोई हुई होना कथित है, प्रतिलिपि द्वारा साबित किया जाए। | यह तथ्य कि मूल खो गया है प्रतिलिपि पेश करने की प्रस्थापना करने वाले व्यक्ति को वह प्रतिलिपि पेश करने से पूर्व साबित करना होगा।
(ग) क चुराई हुई सम्पत्ति को यह जानते हुए कि वह चुराई हुई है प्राप्त करने का अभियुक्त है। यह साबित करने की प्रस्थापना की गई है कि उसने उस सम्पत्ति के कब्जे का प्रत्याख्यान किया। इस प्रत्याख्यान की सुसंगति सम्पत्ति की अनन्यता पर निर्भर है। न्यायालय अपने विवेकानुसार या तो कब्जे के प्रत्याख्यान के साबित होने से पूर्व सम्पत्ति की पहचान की जानी अपेक्षित कर सकेगा, या संपत्ति की पहचान की जाने के पूर्व कब्जे का प्रत्याख्यान साबित किए जाने की अनुज्ञा दे सकेगा।
(घ) किसी तथ्य (क) के, जिसका किसी विवाद्यक तथ्य का हेतुक या परिणाम होना कथित है, साबित करने की प्रस्थापना की गई है। कई मध्यांतरिक तथ्य (ख), (ग) और (घ) हैं, जिनका इसके पूर्व की तथ्य (क) उस विवाद्यक तथ्य का हेतुक या परिणाम माना जा सके, अस्तित्व में होना दर्शित किया जाना आवश्यक है। न्यायालय या तो ख, ग या घ के साबित किए जाने के पूर्व क के साबित किए जाने की अनुज्ञा दे सकेगा, या क का साबित किया जाना अनुज्ञात करने के पूर्व ख, ग और घ का साबित किया जाना अपेक्षित कर सकेगा।

  1. मुख्य परीक्षा — किसी साक्षी की उस पक्षकार द्वारा, जो उसे बुलाता है, परीक्षा उसकी मुख्य परीक्षा कहलाएगी |
    प्रतिपरीक्षा — किसी साक्षी की प्रतिपक्षा द्वारा दी गयी परीक्षा उसकी प्रतिपरीक्षा कहलाएगी |
    पुनः परीक्षा — किसी साक्षी की प्रतिपरीक्षा के पश्चात उसकी उस पक्षकार द्वारा, जिसने उसे बुलाया था, परीक्षा उसकी पुनः परीक्षा कहलाएगी |
  2. परीक्षाओं का क्रम — साक्षियों से प्रथमः मुख्य परीक्षा होगी, तत्पश्चात (यदि प्रतिपक्षी ऐसा चाहे तो) प्रतिपरीक्षा होगा, तत्पश्चात (यदि उसे बुलाने वाला पक्षकार ऐसा चाहे तो) पुनः परीक्षा होगी |
    परीक्षा ओर प्रतिपरीक्षा को सुसंगत तथ्यों से संबंधित होना होगा, किंतु प्रतिपरीक्षा का उन तथ्यों तक सीमित रहना आवश्यक नहीं हैं, जिनका साक्षी ने अपनी मुख्य परीक्षा में परिसाक्ष्य दिया है |
    पुनःपरीक्षा की दशा — पुनः परीक्षा उन बातों से स्पष्टीकरण के प्रति उद्दिष्ट होगी जो प्रतिपरीक्षा में निर्दिष्ट हुए हों, तथा यदि पुनःपरीक्षा में न्यायालय की अनुज्ञा से कोई नई बात प्रविष्ट की गई हो, तो प्रतिपक्षी उस बात के बारे में अतिरिक्त प्रतिपरीक्षा कर सकेगा |
  3. किसी दस्तावेज को पेश करने के लिए समनित व्यक्ति की प्रतिपरीक्षा — किसी दस्तावेज को पेश करने के लिए समनित व्यक्ति केवल इस तथ्य के कारण कि वह उसे पेश करता है साक्षी नहीं हो जाता तथा यदि ओर जब तक वह साक्षी के तौर पर बुलाया नहीं जाता, उसकी प्रतिपरीक्षा नहीं की जा सकती |
  4. शील का साक्ष्य देने वाले साक्ष्य — शील का साक्ष्य देने वाले साक्षियों की प्रतिपरीक्षा ओर पुन:परीक्षा की जा सकेगी |
  5. सूचक प्रश्न — कोई प्रश्न, जो उस उत्तर को सुझाता है, जिसे पूछने वाला व्यक्ति पाना चाहता है या पाने की आशा करता है, सूचक प्रश्न कहा जाता है |
  6. उन्हें कब नहीं पूछना चाहिए — सूचक प्रश्न, मुख्य परीक्षा में या पुनः परीक्षा में, यदि विरोधी पक्षकार द्वारा आक्षेप किया जाता है, न्यायालय की अनुज्ञा के बिना नहीं पूछे जाने चाहिए |
    न्यायालय उन बातों के बारे में, जो पुनःस्थापना के रूप में या निर्विवाद या जो उसकी राय में पहले से ही पर्याप्त रूप से साबित हो चुके हैंम सूचक प्रश्नों के लिए अनुज्ञा देगा |
  7. उन्हें कब पूछा जा सकेगा — सूचक प्रश्न प्रतिपरीक्षा में पूछे जा सकेंगे |
  8. लेखबद्ध विषयों के बारे में साक्ष्य — किसी साक्षी से, जबकि वह परीक्षाधीन है, यह पूछा जा सकेगा कि क्या कोई संविदा, अनुदान या संपत्ति का अन्य व्ययन, जिसके बारे में वह साक्ष्य दे रहा है, किसी दस्तावेज में अंतर्विष्ट नहीं था, और यदि वह कहता है कि वह था, या यदि वह किसी ऐसी दस्तावेज की अंतर्वस्तु के बारे में कोई कथन करने ही वाला है, जिसे न्यायालय की राय में, पेश किया जाना चाहिए, तो प्रतिपक्षी आक्षेप कर सकेगा कि ऐसा साक्ष्य तब तक नहीं दिया जाए जब तक ऐसी दस्तावेज पेश नहीं कर दी जाती, या जब तक वे तथ्य साबित नहीं कर दिए जाते, जो उस पक्षकार को, जिसने साक्षी को बुलाया है, उसका द्वितीयक साक्ष्य देने का हक देते है |
    स्पष्टीकरण — कोई साक्षी उन कथनों का, जो दस्तावेजों की अंतर्वस्तु के बारे में अन्य व्यक्तियों द्वारा किए गए थे, मौखिक साक्ष्य दे सकेगा, यदि ऐसे कथन स्वयमेव सुसंगत तथ्य हैं |
    दृष्टांत

प्रश्न यह है कि क्या क ने ख पर हमला किया।
‘ग’ अभिसाक्ष्य देता है कि उसने ‘क’ को ‘घ’ से यह कहते सुना है कि “ख ने मुझे एक पत्र लिखा था, जिसमें मुझ पर चोरी का अभियोग लगाया था और मैं उससे बदला लूंगा।” यह कथन हमले के लिए ‘क’ का आशय दर्शित करने वाला होने के नाते सुसंगत है और उसका साक्ष्य दिया जा सकेगा, चाहे पत्र के बारे में कोई अन्य साक्ष्य न भी दिया गया हो।

  1. पूर्वतन लेखबद्ध कथनों के बारे में प्रतिपरीक्षा — किसी साक्षी की उन पूर्वतन कथनों के बारे में, जो उसने लिखित रूप में किए है या जो लेखबद्ध किए गए हैं और जो प्रश्नगत बातों से सुसंगत हैं, ऐसा लेख उसे दिखाए बिना, या ऐसे लेख के साबित हुए बिना, प्रतिपरीक्षा की खंडन करने का आशय है तो उस लेख को साबित किए जा सकने के पूर्व उसका ध्यान उस लेख के उन भागों की और आकर्षित करना होगा जिनका उपयोग उसका खंडन करने के प्रयोजन से किया जाना हैं |
  2. प्रतिपरीक्षा में विधिपूर्व प्रश्न — जबकि किसी साक्षी से प्रतिपरीक्षा की जाती है, तब उसने एतस्मिनपूर्व निर्दिष्ट प्रश्नों के अतिरिक्त ऐसे कोई भी पूछे जा सकेंगे, जिनकी प्रवृति-
    (1) उसकी सत्यवादिता परखने की है,
    (2) यह पता चलाने की है कि वह कौन है और जीवन में उसकी स्थिति क्या है, अथवा
    (3) उसके शील को दोष लगाकर उसकी विश्वनीयता को धक्का पहुँचाने की है, चाहे ऐसे प्रश्नों का उत्तर उसे प्रत्यक्षतः या परोक्षत: अपराध में फँसाने की प्रवृति रखता हो, या उसे किसी शास्ति या समपहरण के लिए उच्छन्न करता हो या प्रत्यक्षत: या परोक्षतः उच्छन्न करने की प्रवृति रखता हो:
    परंतु भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 376क, धारा 376ख, धारा 376ग, धारा 376घ, या धारा 376ङ के अधीन किसी अपराध के लिए या ऐसे किसी अपराध को करने के लिए किसी अभियोजन में, जहाँ सम्मति का प्रश्न विवाध है, वहाँ पीडितों की प्रतिपरीक्षा में उसके साधारण अनैतिक आचरण या किसी व्यक्ति के साथ पूर्व लैगिक अनुभव के बारे में ऐसी सम्मति या सम्मति की प्रकृति के लिए साक्ष्य देना या प्रश्नों को पूछना अनुज्ञेय नहीं होगा |
  3. साक्षी को उत्तर देने के लिए कब विवश किया जाए — यदि ऐसा कोई प्रश्न उस वाद या कर्यवाही से सुसंगत किसी बात से संबंधित है, तो धारा 132 के उपबंध उसको लागू होंगे |
  4. न्यायालय विनिश्चित करेगा कि कब प्रश्न पूछा जाएगा और साक्षी को उत्तर देने के लिए कब विवश किया जाएगा — यदि ऐसा कोई प्रश्न ऐसी बात से संबंधित है, जो उस वाद या कार्यवाही से वहां तक के सिवाय, जहां तक कि वह साक्षी के शील को दोष लगाकर उसकी विश्वसनीयता पर प्रभाव डालती है, सुसंगत नहीं हैं, तो न्यायालय विनिश्चित करेगा कि साक्षी को उत्तर देने के लिए विवश किया जाए या नहीं और यदि वह ठीक समझे तो साक्षी को सचेत कर सकेगा कि वह उसका उत्तर देने के लिए आबद्ध नहीं है | अपने विवेक का प्रयोग करने में निम्नलिखित विचारों को ध्यान में रखेगा-
    (1) ऐसे प्रश्न उचित है, यदि वे ऐसी प्रकृति के हैं कि उनके द्वारा प्रवहण किए गए लांछन की सत्यता उस विषय में, जिसका वह साक्षी परिसाक्ष्य देता है, साक्षी की विश्वनीयता के बारे में न्यायालय की राय पर गंभीर प्रभाव डालेगी;
    (2) ऐसे प्रश्न अनुचित हैं, यदि उनके द्वारा प्रवहण किया गया लांछन ऐसी बातों के संबंध में है जो समय में उतनी अतीत हैं या जो इस प्रकार की है कि लांछन की सत्यता उस विषय में, जिसका वह साक्षी परिसाक्ष्य देता है, साक्षी की विश्वनीयता के बारे में न्यायालय की राय पर प्रभाव नहीं डालेगी या बहुत थोड़ी मात्रा में प्रभाव डालेगी;
    (3) ऐसे प्रश्न अनुचित है, यदि साक्षी के शील के विरुद्ध किए गए लांछन के महत्व और उसके साक्ष्य के महत्व के बीच भरी अनुपात है;
    (4) न्यायालय, यदि वह ठीक समझे, साक्षी के उत्तर देने के इंकार करने पर यह अनुमान लगा सकेगा कि उत्तर यदि दिया जाता तो, प्रतिकूल होता |
  5. युक्तियुक्त आधारों के बिना प्रश्न न पूछा जाएगा — कोई भी ऐसा प्रश्न, जैसा कि धारा 148 में निर्दिष्ट है नहीं पूछा जाना चाहिए, जब तक कि पूछने वाले व्यक्ति के पास यह सोचने के लिए युक्तियुक्त आधार न हो कि वह लांछन, जिसका उससे प्रवहण होता है, सुधारित है |
    दृष्टांत

(क) किसी बैरिस्टर को किसी अटर्नी या वकील द्वारा अनुदेश दिया गया है कि एक महत्वपूर्ण साक्षी डकैत है। उस साक्षी से यह पूछने के लिए कि क्या वह डकैत है, यह युक्तियुक्त आधार है।
(ख) किसी वकील को न्यायालय में किसी व्यक्ति द्वारा जानकारी दी जाती है कि एक महत्वपूर्ण साक्षी डकैत है। जानकारी देने वाला वकील द्वारा प्रश्न किए जाने पर अपने कथन के लिए समाधानप्रद कारण बताता है। उस साक्षी से यह पूछने के लिए कि क्या वह डकैत है यह युक्तियुक्त आधार है।
(ग) किसी साक्षी से, जिसके बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं है, अटकलपच्चू पूछा जाता है कि क्या वह डकैत है। यहां इस प्रश्न के लिए कोई युक्तियुक्त आधार नहीं है।
(घ) कोई साक्षी, जिसके बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं है, अपने जीवन के ढंग और जीविका के साधनों के बारे में पूछे जाने पर असमाधानप्रद उत्तर देता है उससे यह पूछने का कि क्या वह डकैत है यह युक्तियुक्त आधार हो सकता है।

  1. युक्तियुक्त आधारों के बिना प्रश्न पूछे जाने की अवस्था में न्यायालय की प्रक्रिया — यदि न्यायालय की यह राय हो कि कोई प्रश्न युक्तियुक्त आधारों के बिना पूछा गया था, तो यदि वह किसी बैरिस्टर, प्लीडर, वकील या अटर्नी द्वारा पूछा गया था, तो वह मामले की परिस्थितियों को उच्च न्यायायलय को या अन्य प्राधिकारी को, जिसके ऐसा बैरिस्टर, प्लीडर, वकील या अटर्नी अपनी वृत्ति के प्रयोग में अधीन है, रिपोर्ट कर सकेगा |
  2. अशिष्ट और कलंकात्मक प्रश्न — न्यायालय किन्हीं प्रश्नों का या पूछताछों का, जिन्हें वह अशिष्ट या कलंकात्मक समझता है चाहे ऐसे प्रश्न या जांच न्यायालय के समक्ष प्रश्नों को कुछ प्रभावित करने की प्रवृति रखते हों, निषेध कर सकेगा, जब तक कि वे विवाद्यक तथ्यों के या उन विषयों के संबंध में न हों, जिनका ज्ञात होना यह अवधारित करने के लिए आवश्यक है कि विवाद्यक तथ्य विद्यमान थे या नहीं |
  3. अपमानित या क्षुब्ध करने के लिए आशयित प्रश्न — न्यायालय ऐसे प्रश्न का निषेध करेगा, जो उसे ऐसा प्रतीत होता है कि वह अपमानित या क्षुब्ध करने के लिए आशयित है, या जो यधपि स्वयं में उचित है, तथापि रूप में न्यायालय को ऐसा प्रतीत होता है कि वह अनावश्यक तौर पर संतापकारी है |
  4. सत्यवादिता परखने के प्रश्नों के उत्तरों का खंडन करने के लिए साक्ष्य का अपवर्जन — जब कि किसी साक्षी से ऐसा कोई प्रश्न पूछा गया हो, जो जांच से केवल वहीं तक सुसंगत है जहां तक कि वह उसके शील को क्षति पहुंचाकर उसकी विश्वसनीयता को धक्का पहुँचाने की प्रवृति रखता है और उसने उसका उत्तर दे दिया हो, तब उसका खंडन करने के लिए कोई साक्ष्य नहीं दिया जाएगा, किन्तु यदि यह मिथ्या उत्तर देता है; तो तत्पश्चात उस पर मिथ्या साक्ष्य देने का आरोप लगया जा सकेगा |
    अपवाद 1- यदि किसी साक्षी से पूछा जाएं कि क्या वह तत्पूर्व किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध हुआ था, और वह उसका प्रत्याख्यान करे, तो उसकी पूर्व दोषसिद्ध का साक्ष्य दिया जा सकेगा |
    अपवाद 2- यदि किसी साक्षी से उसकी निष्पक्षता पर अधिक्षेप करने की प्रवृति रखने वाला कोई प्रश्न पूछा जाए और वह सुझाए हुए तथ्यों के प्रत्याख्यान द्वारा उसका उत्तर देता है, तो उसका खंडन किया जा सकेगा|
    दृष्टांत

(क) किसी निम्नांकक के विरुद्ध एक दावे का प्रतिरोध कपट के आधार पर किया जाता है। दावेदार से पूछा जाता है कि क्या उसने एक पिछले संव्यवहार में कपटपूर्ण दावा नहीं किया था। वह इसका प्रत्याख्यान करता है। यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य प्रस्थापित किया जाता है कि उसने ऐसा दावा सचमुच किया था। यह साक्ष्य अग्राह्य है।
(ख) किसी साक्षी से यह पूछा जाता है कि क्या वह किसी ओहदे से बेईमानी के लिए पदच्युत नहीं किया गया था। वह इसका प्रत्याख्यान करता है। यह दर्शित करने के लिए कि वह बेईमानी के लिए पदच्युत किया गया था साक्ष्य प्रस्थापित किया जाता है। यह साक्ष्य ग्राह्य नहीं है।
(ग) क प्रतिज्ञात करता है कि उसने अमुक दिन ख को लाहौर में देखा। क से पूछा जाता है कि क्या वह स्वयं उस दिन कलकत्ते में नहीं था। वह इसका प्रत्याख्यान करता है। यह दर्शित करने के लिए कि क उस दिन कलकत्ते में था साक्ष्य प्रस्थापित किया जाता है। यह साक्ष्य ग्राह्य है, इस नाते नहीं कि वह क का एक तथ्य के बारे में खण्डन करता है, जो उसकी विश्वसनीयता पर प्रभाव डालता है, वरन इस नाते कि वह इस अभिकथित तथ्य का खण्डन करता है कि ख प्रश्नगत दिन लाहौर में देखा गया था। इनमें से हर एक मामले में साक्षी पर, यदि उसका प्रत्याख्यान मिथ्या था, मिथ्या साक्ष्य देने का आरोप लगाया जा सकेगा।
(घ) क से पूछा जाता है कि क्या उसके कुटुम्ब और ख के, जिसके विरुद्ध वह साक्ष्य देता है, कुटुम्ब में कुल बैर नहीं रहा था। वह इसका प्रत्याख्यान करता है। उसका खण्डन इस आधार पर किया जा सकेगा कि यह प्रश्न उसकी निष्पक्षता पर अधिक्षेप करने की प्रवृत्ति रखता है।

  1. पक्षकार द्वारा अपने ही साक्षी से प्रश्न —
    (1) न्यायालय उस व्यक्ति को, जो साक्षी को बुलाता है, उस साक्षी से कोई ऐसे प्रश्न करने की अपने विवेकानुसार अनुज्ञा दे सकेगा, जो प्रतिपक्षी द्वारा प्रतिपरीक्षा में किए जा सकते हैं|
    (2) इस धारा की कोई बात उपधारा (1) के अधीन इस प्रकार किए गए अनुज्ञात व्यक्ति को ऐसे साक्षी के साक्ष्य के किसी भाग का अवलम्ब लेने के हक से वंचित नहीं करेगी |]
  2. साक्षी की विश्वसनीयता पर अधिक्षेप — किसी साक्षी की विश्वसनीयता पर प्रतिपक्षी द्वारा, या न्यायालय की सम्मति से उस पक्षकार द्वारा, जिसने उसे बुलाया है, निम्नलिखित प्रकारों से अधिक्षेप किया जा सकेगा-
    (1) उन व्यक्तियों के साक्ष्य के साक्ष्य द्वारा, जो यह परिसाक्ष्य देते हैं कि साक्षी के बारे में अपने ज्ञान के आधार पर वे उसे विश्वसनीयता का अपात्र समझते है;
    (2) यह साबित किए जाने द्वारा कि साक्षी को रिश्वत दी गई है, या उसने रिश्वत की प्रस्थापना प्रतिगृहीत कर ली है, या उसे अपना साक्ष्य देने के लिए अन्य भ्रष्ट उत्प्रेरणा मिली है;
    (3) उसके साक्ष्य के किसी ऐसे भाग से, जिसका खंडन किया जा सकता है, असंगत पिछले कथनों को साबित करने द्वारा;
    (4) […….विलुप्त]
    स्पष्टीकरण — कोई साक्षी, जो किसी अन्य साक्षी को विश्वसनीयता के लिए अपात्र घोषित करता है, अपने से की गई मुख्य परीक्षा में अपने विश्वास के कारणों को चाहे न बताए, किन्तु प्रतिपरीक्षा में उससे उनके कारणों को पूछा जा सकेगा, और उन उत्तरों का, जिन्हें वह देता है, खंडन नहीं किया जा सकता; तथापि यदि वे मिथ्या हों तो तत्पश्चात उस पर मिथ्या साक्ष्य देने का आरोप लगाया जा सकेगा|
    दृष्टांत

(क) ख को बेचे गए और परिदान किए गए माल के मूल्य के लिए ख पर क वाद लाता है। ग कहता है कि उसने ख को माल का परिदान किया। यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य प्रस्थापित किया जाता है कि किसी पूर्व अवसर पर उसने कहा था कि उसने उस माल का परिदान ख को नहीं किया था। यह साक्ष्य ग्राह्य है।
(ख) ख की हत्या के लिए क पर अभ्यारोप लगाया गया है। ग कहता है कि ख ने मरते समय घोषित किया था कि क ने ख को यह घाव किया था, जिससे वह मर गया|
यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य प्रस्थापित किया जाता है कि किसी पूर्व अवसर पर ग ने कहा था कि घाव क द्वारा या उसकी उपस्थिति में नहीं किया गया था। यह साक्ष्य ग्राह्य है।

  1. सुसंगत तथ्य के साक्ष्य की संपुष्टि करने की प्रवृति रखने वाले प्रश्न ग्राह्रा होंगे — जबकि कोई साक्षी, जिसकी संपुष्टि करना आशयित हो, किसी सुसंगत तथ्य का साक्ष्य देता तब उससे ऐसी अन्य किन्हीं भी परिस्थितियों के बारे में प्रश्न किया जा सकेगा, जिन्हें उसने उस समय या स्थान पर, या के निकट संप्रेक्षित किया जिस पर ऐसा सुसंगत तथ्य घटित हुआ, यदि न्यायालय की यह राय हो कि ऐसी परिस्थितियां, यदि वे साबित हो जाएँ, साक्षी उस सुसंगत तथ्य के बारे में, जिसका वह साक्ष्य देता है. परिसाक्ष्य को सम्पुष्ट करेंगी |
    दृष्टांत

क एक सह-अपराधी किसी लूट का, जिसमें उसने भाग लिया था, वृत्तांत देता है। वह लूट से असंसक्त विभिन्न घटनाओं का वर्णन करता है जो उस स्थान को और जहां कि वह लूट की गई थी, जाते हुए और वहां से आते हुए मार्ग में घटित हुई थीं।
इन तथ्यों का स्वतंत्र साक्ष्य स्वयं उस लूट के बारे में उसके साक्ष्य को सम्पुष्ट करने के लिए दिया जा सकेगा।

  1. उसी तथ्य के बारे में पश्चातवर्ती अभिसाक्ष्य की सम्पुष्टि करने के लिए साक्षी के पूर्वतन कथन साबित किए जा सकेंगे — किसी साक्षी के परिसाक्ष्य की सम्पुष्टि करने के लिए ऐसे साक्षी द्वारा उसी तथ्य से संबंधित, उस समय पर या के लगभग जब वह तथ्य घटित हुआ था, किया हुआ या उस तथ्य का अन्वेषण करने के लिए विधि द्वारा सक्षम किसी प्राधिकारी के समक्ष किया हुआ पूर्वतन कथन साबित किया जा सकेगा|
  2. साबित कथन के बारे में जो कथन धारा 32 या 33 के अधीन सुसंगत है कौन सी बातें साबित की जा सकेंगी — जब कभी कोई कथन, जो धारा 32 या 33 के अधीन सुसंगत है, साबित कर दिया जाए, तब चाहे उसके खंडन के लिए या सम्पुष्टि के लिए या उसके द्वारा वह किया गया था उस व्यक्ति की विश्वसनीयता को अधिक्षिप्त या पुष्ट करने के लिए वे सभी बातें साबित की जा सकेंगी जो यदि वह व्यक्ति साक्षी के रूप में बुलाया गया हो और उसने प्रतिपरीक्षा में सुझाई हुई बात की सत्यता का प्रत्याख्यान किया होता तो साबित की जा सकतीं |
  3. स्मृति ताजी करना — कोई साक्षी, जबकि वह परीक्षा के अधीन है, किसी ऐसे लेख को देख करके, जो कि स्वयं उसने उस संव्यवहार के समय जिसके संबंध में उससे प्रश्न किया जा रहा है, या इतने शीघ्र पश्चात बनाया हो कि न्यायालय इसे सम्भाव्य समझता हो कि वह संव्यवहार उस समय उसकी स्मृति में ताजा था, अपनी स्मृति को ताजा कर सकेगा ;
    साक्षी उपर्युक्त प्रकार के किसी ऐसे लेख को भी देख सकेगा जो किसी अन्य व्यक्ति द्वारा तैयार किय गया हो और उस साक्षी द्वारा उपर्युक्त समय के भीतर पढ़ा गया हो, यदि वह उस लेख का उस समय, जब कि उसने उसे पढ़ा था, सही होना जानता था |
    साक्षी स्मृति ताजी करने के लिए दस्तावेज की प्रतिलिपि का उपयोग कब कर सकेगा — जब कभी साक्षी अपनी स्मृति किसी दस्तावेज को देखने से ताजी कर ताजी का सकता है तब वह न्यायालय की अनुज्ञा से, ऐसी दस्तावेज की प्रतिलिपि को देख सकेगा |
    परंतु यह तब जबकि न्यायालय का समाधान हो गया हो कि मूल पेश न करने के लिए पर्याप्त कारण है |
  4. धारा 159 में वर्णित दस्तावेज में कथित तथ्यों के लिए परिसाक्ष्य — कोई साक्षी किसी ऐसी दस्तावेज में जैसी धारा 159 में है, वर्णित तथ्यों का भी, चाहे उसे स्वयं उन तथ्यों का विनिर्दिष्ट स्मरण नहीं हो, परिसाक्ष्य दे सकेगा, यद उसे यकीन है कि वे तथ्य उस दस्तावेज में ठीक-ठीक अभिलिखित थे |
    दृष्टांत

कोई लेखाकार कारबार के अनुक्रम में नियमित रूप से रखी जाने वाली बहियों में उसके द्वारा अभिलिखित तथ्यों का परिसाक्ष्य दे सकेगा, यदि वह जानता हो कि बहियाँ ठीक-ठीक रखी गई थीं, यद्यपि वह प्रविष्ट किए गए विशिष्ट संव्यवहारों को भूल गया हो।

  1. स्मृति ताजी करने के लिए प्रयुक्त लेख के बारे में प्रतिपक्षी का अधिकार — पूर्ववर्ती अंतिम दो धाराओं के उपबंधों के अधीन देखा गया कोई लेख पेश करना और प्रतिपक्षी को दिखाना होगा, यदि वह उसकी अपेक्षा करे | ऐसा पक्षकार, यदि वह चाहे, उस साक्षी के बारे में प्रतिपरीक्षा कर सकेगा |
  2. दस्तावेजों का पेश किया जाना — किसी दस्तावेज के पेश करने के लिए समनित साक्षी यदि वह उसके कब्जे में और शक्यधीन हो ऐसे किसी आक्षेप के होने पर भी, जो उसे पेश करने या उसकी ग्राह्राता के बारे में हो, उस न्यायालय में लाएगा | ऐसे किसी आक्षेप की विधिमान्यता न्यायालय द्वारा विनिश्चित की जाएगी |
    न्यायालय, यदि वह ठीक समझे, उस दस्तावेज का, यदि वह राज्य की बातों से संबंधित न हो, निरीक्षण कर सकेगा या अपने को उसकी ग्राह्राता अवधारित करने के योग्य बनाने के लिए अन्य साक्ष्य ले सकेगा |
    दस्तावेजों का अनुवाद — यदि ऐसे प्रयोजन के लिए किसी दस्तावेज का अनुवाद कराना आवश्यक हो तो न्यायालय, यदि वह ठीक समझे, अनुवादक को निर्देश दे सकेगा कि वह उसकी अंतर्वस्तु को गुप्त रखे, सिवाय जबकि दस्तावेज को साक्ष्य में दिया जाना हो, तथा यदि अनुवादक ऐसे निदेश की अवज्ञा करे, तो यह धारित किया जाएगा कि उसने भारतीय दंड संहिता (1860 का 45), की धारा 166 के अधीन अपराध किया है |
  3. मंगाई गई और सूचना पर पेश की गई दस्तावेज का साक्ष्य के रूप में दिया जाना — जबकि कोई पक्षकार किसी दस्तावेज को, जिसे पेश करने की उसने दूसरे पक्षकार को सूचना दी है, मांगता है और ऐसी दस्तावेज पेश की जाती है और उस पक्षकार द्वारा, जिसने उसके पेश करने की मांग की थी, निरीक्षित हो जाती है, तब यदि उसे पेश करने वाला पक्षकार उससे ऐसा करने की अपेक्षा करता है, तो वह उसे साक्ष्य के रूप में देने के लिए आबद्ध होगा
  4. सूचना पाने पर जिस दस्तावेज के पेश करने से इंकार कर दिया गया है उसकी साक्ष्य के रूप में उपयोग में लाना — जबकि कोई पक्षकार ऐसी किसी दस्तावेज को पेश करने से इंकार कर देता है जिसे पेश करने की उसे सूचना मिल चुकी है तब वह तत्पश्चात उस दस्तावेज को दूसरे पक्षकार की सम्मति के या न्यायालय के आदेश के बिना साक्ष्य के रूप में उपयोग में नहीं ला सकेगा |
    दृष्टांत

ख पर किसी करार के आधार पर क वाद लाता है और वह ख को उसे पेश करने की सूचना देता है। विचारण में क उस दस्तावेज की मांग करता है और ख उसे पेश करने से इंकार करता है। क उसकी अंतर्वस्तु का द्वितीयक साक्ष्य देता है। क द्वारा दिए हुए द्वितीयक साक्ष्य का खण्डन करने के लिए या यह दर्शित करने के लिए कि वह करार स्टांपित नहीं है, ख दस्तावेज को ही पेश करना चाहता है। वह ऐसा नहीं कर सकता।

  1. प्रश्न करने या पेश करने का आदेश देने की न्यायालय की शक्ति — न्यायाधीश सुसंगत तथ्यों का पता चलाने के लिए या उनका उचित सबूत अभिप्राप्त करने के लिए, किसी भी रूप में, किसी भी समय, किसी भी साक्षी या पक्षकारों से, किसी सुसंगत या विसंगत तथ्य के बारे में कोई भी प्रश्न, जो वह चाहे, पूछ सकेगा तथा किसी भी दस्तावेज या चीज को पेश करने का आदेश दे सकेगा और न तो पक्षकार और न उनके अभिकर्ता हक़दार होंगे कि वे किसी भी ऐसे प्रश्न या आदेश के प्रति कोई भी आक्षेप करें, न ऐसे किसी भी प्रश्न के प्रत्युतर में दिए गए किसी भी उत्तर पर किसी भी साक्षी की न्यायालय की इजाजत के बिना प्रतिपरिक्षा करने के हक दार होंगे:
    परंतु निर्णय को उन तथ्यो पर, जो इस अधिनियम द्वारा सुसंगत घोषित किए गए हैं और जो सम्यक॒ रूप से साबित किए गए हों, आधारित होना होगा :
    परंतु यह भी कि न तो यह धारा न्यायाधीश को किसी साक्षी को किसी ऐसे प्रश्न उत्तर देने के लिए या किसी ऐसी दसतावेज को पेश करने को विवश करने के लिए प्राधिकृत करेगी, जिसका उत्तर देने से या जिसे पेश करने से, यदि प्रतिपक्षी द्वारा वह प्रश्न पूछा गया होता या वह दस्तावेज मंगायी गई होती, तो ऐसा साक्षी दोनों धाराओं को सम्मिलित करते हुए धारा 121 से धारा 131 पर्यन्त धाराओं के अधीन इंकार करने का हकदार होता और न न्यायाधीश कोई ऐसा प्रश्न पूछेगा जिसका पूछना किसी अन्य व्यक्ति के लिए धारा 148 या धारा 149 के अधीन अनुचित होता; और न वह एतस्मिनपूर्व अपवादित दशाओं के सिवाय किसी भी दस्तावेज के प्राथमिक साक्ष्य का दिया जाना अभिमुक्त करेगा |
  2. जूरी या असेसरों की प्रश्न करने के शक्ति — जूरी द्वारा या असेसरों की सहायता से विचारित मामलों में जूरी या असेसर साक्षियों से कोई भी ऐसे प्रश्न न्यायाधीश के माध्यम से इजाजत से कर सकेंगे, जिन्हें न्यायाधीश स्वयं कर सकता हो और जिन्हें वह उचित समझे |
    अध्याय 11
    साक्ष्य के अनुचित ग्रहण और अग्रहण के विषय में
  3. साक्ष्य के अनुचित ग्रहण या अग्रहण के लिए नवीन विचारण हैं होगा — साक्ष्य का अनुचित ग्रहण या अग्रहण स्वयमेव किसी भी मामले में नवीन विचारण के लिए या किसी विनिश्चय के उलटे जाने के लिए आधार नहीं होगा, यदि उस न्यायालय को, जिसके समक्ष ऐसा आक्षेप उठाया गया है, यह प्रतीत हो की आक्षिप्त और ग्रहीत उस साक्ष्य के बिना भी विनिश्चय के न्यायोचित ठहराने के लिए यथेष्ट साक्ष्य था अथवा यह कि यदि अग्रहीत साक्ष्य लिया भी गया तो उससे विनिश्चय में फेरफार न होना चाहिए था
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