राजस्थान के भौतिक प्रदेश
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राजस्थान के भौतिक प्रदेश

राजस्थान के भौतिक प्रदेश

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भौतिक प्रदेश दो शब्दों से मिलकर बना हैं

भौतिक or प्रदेश

भौतिक: –

स्थलमंडल पर उपस्थित सभी पर्वत पठार,मैदान,मरुश्थल,वन वनस्पति ,नदियाँ ,झीले आदि का अध्ययन करना

प्रदेश:-

क्षेत्र विशेष को प्रदेश कहते हैं

अर्थात स्थल मंडल का अध्ययन किसी क्षेत्र विशेष के रूप में करना भौतिक प्रदेश कहलाता हैं

राजस्थान के भौतिक प्रदेश को हम 4 भागों में बांटते हैं

  • 1.थार का मरुस्थल
  • 2. अरावली प्रदेश
  • 3. पूर्वी मैदान
  • 4.दक्षिण पूर्वी पठारी प्रदेश

राजस्थान के भौतिक प्रदेश की उत्पति के अवशेष

अब हम सभी भौतिक प्रदेशों को विस्तार से पढ़ते हैं

पश्चिमी मरुस्थल (थार के मरुस्थल )

यह टेथिस सागर का अवशेष हैं , सहारा के मरुस्थल का विस्तार हैं टेथिस सागर के अवशेष के प्रमाण :- 1.खारे पानी की झीले 2.अवसादी चट्टानें 3.जीवाश्म खनिज 4.प्राकृतिक वनस्पति

थार के मरुस्थल का नामकरण

थार के मरुस्थल  का नाम पाकिस्तान के एक जिले थारपारकर के नाम से हुआ और थार  शब्द की उत्पति “थल” शब्द से हुई जिसका अर्थ “रेत का टीला” होता हैं !

जानिए कैसे हैं थार का मरुस्थल सहारा के मरुस्थल का विस्तार ?

SAHRAA KE MARUSTHAL KA VISTAR
SAHRAA KE MARUSTHAL KA VISTAR
12 DIST THAR DESERT
12 DIST THAR DESERT

थार के मरुस्थल की विशेषताएं

  • सर्वाधिक जैव विविधता वाला मरुस्थल !
  • विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला मरुस्थल !
  • भारत के मानसून को प्रभावित करने वाला मरुस्थल! (न्यून वायु दाब केंद्र का निर्माण करके !)
  • गर्मियों में जल्दी गर्म और सर्दियों में जल्दी ठंडा होता हैं
  • भारत का सबसे गर्म क्षेत्र !
  • भारत का सर्वाधिक शुष्क क्षेत्र!

राजस्थान के संदर्भ में महत्वपूर्ण तथ्य 

  • थार के  मरुस्थल का क्षेत्रफल  राजस्थान के कुल क्षेत्रफल का 60% हैं !
  • और थार के मरुस्थल में जनसंख्या सम्पूर्ण राजस्थान की 41% हैं!
  • क्षेत्रफल ज्यादा और जनसँख्या कम हो वहाँ जनसँख्या घनत्व भी कम होता हैं इसलिए राजस्थान का सबसे कम जनसंख्या घनत्व वाला भौतिक प्रदेश भी थार का मरुश्थल हैं !
  • जनसँख्या घनत्व अर्थ है  1 वर्ग किलोमीटर में रहने  वाले व्यक्तियों की औसत संख्या

पश्चिमी मरुस्थल का वर्गीकरण 

CLASSIFICATION OF THAR DESERT
CLASSIFICATION OF THAR DESERT

शुष्क मरुस्थल

बालुका स्तूप मुक्त क्षेत्र : बालुका स्तूप का अर्थ होता हैं रेत के टीले पश्चिमी मरुस्थल में हमें अधिकतम रेत के टीले देखने को मिलते हैं लेकिन कुछ क्षेत्र पश्चिमी मरुस्थल में ऐसा भी हैं जहाँ रेतीली मिटटी न होकर पथरीली मिटटी हैं जहाँ पथरीली मिट्टी होगी वहाँ पर वायु द्वारा रेत का अपरदन नही होगा जब अपरदन नही होगा तो रेत के टीले नही बनेगे और इसलिए उसको हम कहेंगे की वो बालुका स्तूप से मुक्त क्षेत्र हैं

यह राजस्थान के तीन जिलो में मिलता हैं जैसलमेर ,बाड़मेर और जोधपुर में जैसलमेर में यह क्षेत्र पोकरण से रामगढ़ के बीच में मिलता हैं ! बाड़मेर में यह क्षेत्र शिव और रामसर तहसील के साथ साथ बालोतरा और पचपदरा के आसपास देखने को मिलते हैं ! और जोधपुर में यह जैसलमेर की सीमा के आसपास फलोदी-शेरगढ़ में देखने को मिलते हैं !

बालुका स्तूप युक्त  क्षेत्र: जहाँ पर रेतीली मिट्टी हैं वो क्षेत्र बालुका स्तूप युक्त कहलाता हैं!

थार के मरुस्थल के प्रकार

CLASSIFICATION OF DESERT
CLASSIFICATION OF DESERT

अर्द्ध शुष्क मरुस्थल 

SEMI DESERT
SEMI DESERT

लूनी बेसिन

  • इसे गोड़वाड़ प्रदेश के नाम से जाना जाता हैं
  • यह लूनी नदी का प्रवाह क्षेत्र हैं जिसमे अरावली से निकलने वाली नदियों का प्रवाह क्षेत्र आता हैं 
  • पुरे मरुस्थल में यह क्षेत्र सबसे उपजाऊ हैं !
  • औसत ऊंचाई 100 से 120 मीटर
  • यहाँ पर जल भूमि सतह के बहुत नजदीक हैं इसलिए 10 से 15 मीटर गहराई खोदने पर पानी मिलता हैं जिसे रेजाणी पानी कहते हैं
  • लूनी बेसिन में लूनी नदी के प्रवाह क्षेत्र के जिले आते हैं पूर्वी नागौर , पूर्वी जोधपुर , पूर्वी बाड़मेर , जालोर और पाली अजमेर का नागौर का सीमा के आसपास का क्षेत्र

नागौरी उच्च भूमि

  • नागौरी उच्च भूमि का विस्तार लूनी बेसिन के उत्तर पच्छिम में शेखावाटी प्रदेश के दक्षिण पूर्व का क्षेत्र हैं!
  • औसत ऊंचाई 300 से 500 मीटर हैं
  • इसमें नागौर दक्षिण बीकानेर दक्षिण-पच्छिमी चुरू पच्छिमी सीकर के बीच का भाग आता हैं
  • यहां पर रेत में सोडियम क्लोराइड पाया जाता हैं इसलिए यहाँ की भूमि नमकीन भूमि हैं और बंजर हैं !
  • यहाँ पर कुछ क्षेत्र रेतीला हैं तो कुछ पठारी मरुस्थल हैं

शेखावाटी प्रदेश

  • चुरू , सीकर , झुंझुनू का सम्मिलित भाग शेखावाटी प्रदेश के नाम से जाना जाता हैं
  • यहाँ पर मौसमी नदी कांतली नदी बहती हैं
  • यह राजस्थान का बांगर कहलाता हैं
  • औसत ऊंचाई 450 मीटर हैं

बांगर क्या हैं !

बांगर  अनुपजाऊ भूमि होती हैं जब नदी उपजाऊ मिट्टी लाती हैं कुछ समय बाद वो नदी उस स्थान से प्रवाहित नहीं होकर अपना रास्ता बदल लेती हैं तो जो पुराना नदी द्वारा उपजाऊ क्षेत्र था वो धीरे धीरे अनुपजाऊ हो जाता हैं उसे ही बांगर कहते हैं !

घग्गर का मैदान

  • हनुमानगढ़ और गंगानगर का क्षेत्र घग्गर नदी का प्रवाह क्षेत्र हैं
  • यहाँ पर घग्गर नदी प्रवाहित होती हैं और अपने साथ जलोढ़ मिट्टी लाकर हनुमानगढ़ और गंगानगर में मैदान निर्मित करती हैं
  • पहले यह क्षेत्र पूर्णतया जलोढ़ मिट्टी के कारण उपजाऊ था लेकिन धीरे धीरे जलवायु परिवर्तन और कच्छ के रन से आई रेत ने इस भू भाग को रेतीला कर दिया और जलोढ़ मिटटी पूर्णतया ढक गयी इसलिए इसमें बालुका स्तुप मिलते हैं !

राजस्थान में बनने वाले बालुकास्तूप

बालुका स्तूप रेत से बनने वाले टीलो को कहते हैं ! यह कई प्रकार के होते है जैसे अनुप्रस्थ यां अवरोधी अनुदैर्ध्य यां रेखीय बरखान/अर्धचन्द्राकार पेराबोलिक सब्रकाफिज तारा स्तूप

अनुप्रस्थ यां अवरोधी बालुकास्तूप

जब पवन चलती हैं तो पवनो के बिच में अवरोध आ जाता हैं अवरोध के कारण पवनो की दिशा के लम्बवत समकोण की तरह रेत जमा हो जाती हैं ऐसे रेत के टीलो को अनुप्रस्थ या अवरोधी बालूकास्तुप कहते हैं ! यह L आकार के दिखाई देते हैं

अनुप्रस्थ यां अवरोधी  बालुकास्तूप
अनुप्रस्थ यां अवरोधी बालुकास्तूप

बरखान बालुकास्तूप

बरखान अनुप्रस्थ का बड़ा रूप होता हैं ये बालुकास्तुप गतिशील और विनाशकारी होते है ! यह अवरोधी बालुका स्तूप का बड़ा रूप होते हैं

बरखान  बालुकास्तूप
बरखान बालुकास्तूप

अनुदैर्ध्य यां रेखीय/पव्नानुवृति बालुकास्तूप

जब पवन चलती है तो अपने साथ रेत लेकर चलती  है और कुछ रेत का भाग पवन के दोनों और समांतर जमा होता जाता हैं ! ऐसे रेत के टीलों को रेखीय और अनुदैर्ध्य रेत के टीले कहते हैं !

अनुदैर्ध्य यां रेखीय/पव्नानुवृति  बालुकास्तूप
अनुदैर्ध्य यां रेखीय/पव्नानुवृति बालुकास्तूप

पैराबोलिक बालुकास्तूप

बड़ी वनस्पति के अवरोध से पेड़ के तनो से टकराकर वायु के साथ उड़ रही धुल पेड़ के आसपास जमा हो जाती है जिससे बनने वाले बालुका स्तूप को पैराबोलिक  बालुका स्तूप कहते है

पैराबोलिक  बालुकास्तूप
पैराबोलिक बालुकास्तूप

सब्रकाफिज बालुकास्तूप

हवा की दिशा में छोटी वनस्पति का अवरोध आ जाता हो तब छोटे टीलें अनियमित श्रृंखला में बनने लग जाते है! ऐसे टीलों को लुनेट भी कहते हैं

तारा स्तूप बालुकास्तूप

तारे के आकार जैसे दिखने वाले तारा स्तूप का निर्माण वायु चलने के साथ वायु दो भागो में बंट जाती है 

तारा स्तूप   बालुकास्तूप
तारा स्तूप बालुकास्तूप

 थार के मरुस्थल में खनिज

मुख्यतया जैविक खनिज (पेट्रोलियम,प्राकतिक गैस और कोयला ) मरुस्थल में पेट्रोलियम पदार्थो की मुख्य रूप से दो  बेसिन हैं बाड़मेर –सांचोर बेसिन बीकानेर- नागौर बेसिन 

पेट्रोलियम के कुओं के नाम :- मंगला , भाग्यम , एश्वर्या, रागेश्वरी सरस्वती हैंØप्रक्रितक गैस जैसलमेर में मिलती हैØकोयला लिग्नाइट प्रकार का मिलता है बाड़मेर , नागौर और बीकानेर में

थार के मरुस्थल में वनस्पति

यहाँ पर वन कांटेदार और वनस्पति घास मिलती हैं घास के प्रमुख नाम सेवण, लिलोन , मुराद , करड, धामन आदि ! ये वनस्पति लाठी सीरिज में मिलती हैं लाठी सीरिज जैसलमेर में मिलती हैं वन के प्रमुख नाम खेजड़ी , रोहिड़ा बबूल कैर आदि

थार के मरुस्थल की जलवायु शुष्क व अर्धशुष्क हैं वर्षा शुष्क क्षेत्र में 25 सेमी से कम होती हैं और अर्धशुष्क क्षेत्र में 25 से 50 सेमी वर्षा होती हैं }मिट्टी शुष्क क्षेत्र में एंटीसोल(बलुई मिट्टी) और अर्धशुष्क क्षेत्र में एरिडोसोल(लाल बलुई मिट्टी) मिलती हैं

थार के मरूस्थल की प्रमुख  नदीयां  }घग्गर नदी , लूनी नदी व लूनी की सही नदियाँ

शब्दावली

रन/थल्ली

दो रेत के टीलों के बीच की भूमि अर्थात खाली जगह को रन कहते हैं!

पोकरण ,लवा, कानोता(जैसलमेर)

थोब (बाड़मेर )

बाप रन (जोधपुर )

प्लाया झील

रन में जब वर्षा ऋतू में पानी भर जाता हैं तो वो रन एक झील के समान दिखने लगती है और इसे ही प्लाया झील कहते हैं

जोहड़

शेखावटी क्षेत्र  में जोहड़ वर्षा जल संरक्षण की एक परम्परागत विधि / संरचना है। 

सर

गंगानगर, बीकानेर,जैसलमेर ,बाड़मेर जिलों में वर्षा जल संरक्षण की एक परम्परागत विधि / संरचना है।

नाड़ी

बाड़मेर जोधपुर जिलों में वर्षा जल संरक्षण की एक परम्परागत विधि / संरचना है।

खड़ीन

जैसलमेर में पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा प्रयोग में लायी गयी वर्षा जल संरक्षण की एक परम्परागत विधि / संरचना है।

यह सब तालाब के ही अलग अलग क्षेत्र में नाम हैं

कूबड़ पट्टी}नागौर व अजमेर जिले के कुछ क्षेत्रों  में  जल मे फ्लोराइड की अत्यधिक मात्रा होने के कारण यहाँ  के निवासियों की हड्डियों में टेढ़ापन आने के कारण पीठ झुक जाती हैं | इस कारण  इसे कूबड़ पट्टी कहा जाता है |

नेहड़

सांचोर और बाड़मेर में लूनी नदी के अपवाह क्षेत्र को नेहड़ कहते हैं

लघु मरुस्थल

कच्छ के रन से बीकानेर के उतर तक का क्षेत्र लघु मरुस्थल कहला हैं

आकल वुड

 जैसलमेर के पोकरण से रामगढ़ के बिच का क्षेत्र जहाँ पर अवसादी चट्टानें हैं इन चट्टानों में लकड़ी जीवाश्म के प्राचीनतम अवशेष मिले हैं ! जिसे आकल वुड फसिल पार्क कहते हैं

यह चट्टानें जुरेसिक और इओसिन युग की हैं }

अरावली पर्वतीय प्रदेश

राजस्थान के भौतिक प्रदेश में अब हम पढेंगे अरावली प्रदेश को

  • अरावली गोडवाना लैंड का भाग हैं ,
  • इसका निर्माण प्री –कैंम्ब्रियन युग में हुआ था, इसलिए  यह विश्व की प्राचीनतम वलित पर्वतमाला हैं !
  • अरावली आर्कियन पर्वतमाला हैं ,
  • जो पर्वत प्री केम्ब्रियन काल अर्थात अजोइक महाकल्प में बनते है उन्हें आर्कियन /चार्नियन पर्वत कहते हैं !
PARVAT NIRMAN KARM OR NAAM
PARVAT NIRMAN KARM OR NAAM

वलित पर्वतों का निर्माण पृथ्वी के आंतरिक परतों द्वारा उत्पन अन्तर्जात बल के कारण होता हैं !

पर्वत निर्माण के लिए अन्तर्जात बल के कारण  विवर्तनिक संचलन से पर्वतनिर्माणकारी संचलन होता है जिसमें  संपीडन होता है जिससे वलन पड़ता हैं और वलित पर्वत यां मोड़दार पर्वत का का निर्माण होता हैं !

कैसे होता है अन्तर्जात बल के कारण वालन आइये जानते हैं ?

ANTRJAAT BAL SE HONE WALI KRIYA
ANTRJAAT BAL SE HONE WALI KRIYA

अरावली के निर्माण को समझने के लिए हमें प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत पढना होगा!

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत हेरी हेस ने दिया था

यह सिद्धांत अल्फ्रेड वैगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत और आर्थर होम्स के समुद्री नितल सिद्धांत पर ही आधारित था

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी के अन्दर प्लेटें होती हैं जिनकी गति के कारण पृथ्वी पर अनेक प्रकार की क्रिया होती हैं !

PLATEO KI GATI
PLATEO KI GATI

अपसारी गति

  • अपसारी गति प्लेटें एक दुसरे से दूर जाती हैं 
  • दुर्बल मंडल में संवाहनीय धाराओं के द्वारा बल लगता हैं जिससे पृथ्वी की आंतरिक परतें टूटने लगती हैं आंतरिक परतें टूटने से भ्रंशन की क्रिया होती हैं जिससे महासागरों में भूकम्प आता है जो सुनामी का कारण बनता हैं 
  • परतें जब टूटती हैं पृथ्वी के अंदर दाब कम हो जाता हैं जिससे पृथ्वी के अन्दर के पदार्थ पिघलने लगता है और मैग्मा बन जाता हैं जो महासागर की सतह पर आकर जमा हो जाता हैं  जिससे द्वीपों का निर्माण होता हैं •

अभीसारी गति

PLETO KI ABHISARI GATI
PLETO KI ABHISARI GATI

•प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत के तहत हम यह समझ रहे हैं की अरावली पर्वतमाला का निर्माण प्लेटों की अभिसारी गति से हुआ

अरावली का विस्तार

अरावली का विस्तार दक्षिण –पच्छिम से उत्तर पूर्व की और हैं

अरावली की शुरआत पालनपुर गुजरात से होती हैं

राजस्थान में यह खेड़ ब्रह्मा(पालनपुर ) के पास से इसानकोण गाँव (सिरोही) से  प्रवेश होती हैं और खेतड़ी (झुंझुनु) के पास से यह राजस्थान से बाहर निकलती हैं

अरावली का अंतिम बिंदु दिल्ली के रायछिना पहाड़ी तक हैं यहीं पर जे एन वी यु कैंपस हैं और इसी पहाड़ी पर राष्ट्रपति भवन हैं

इसका विस्तार 3 राज्यों और 1 केंद्र शासित प्रदेश में हैं

गुजरात ,राजस्थान , हरियाणा और दिल्ली

हरियाणा में  इसे डोसी पर्वतमाला कहते हैं

अरावली का गर्भ ग्रह अरब सागर में है जो लक्षद्वीप से शुरू होता हैं •अरावली की कुल लम्बाई 692kM हैं !

राजस्थान में अरावली की लम्बाई 550kM हैं!

अन्य तथ्य •

अरावली में स्थित सबसे ऊँचा शहर – माउंट आबू • निचा शहर – अजमेर • अरावली का सर्वाधिक विस्तार(चौड़ाई ) – उदयपुर • न्यूनतम विस्तार – अजमेर • कुल क्षेत्रफल 99771 वर्ग किलोमीटर •राजस्थान के क्षेत्रफल का 9.80%

वायु घाटियाँ और रेगिस्तान मार्च

  • सर्वाधिक वायु घाटियाँ अजमेर जिलें में
  • जहाँ पर अरावली की निम्न पहाड़ियां होती हैं वहाँ पर वायु  पार होकर अरावली के पूर्वी भाग में अर्थात पूर्वी मैदानी भाग में चली जाती हैं जिसे रेगिस्तान मार्च कहते हैं
  • यही होती है मरुस्थलीकरण की समस्या
  • अरावली का मुख्य विस्तार 7 जिलों में है
ARAVALI KA VISTAR
ARAVALI KA VISTAR
ARAVALI PRADESH
ARAVALI PRADESH

अरावली की चोटियाँ

चोटी जिला ऊंचाई
गुरु शिखर सिरोही 1727
सेर सिरोही 1597
दिलवाडा सिरोही 1442
जरगा उदयपुर 1431
अच्छलगढ़ सिरोही 1380
कुम्भलगढ़ राजसमन्द 1224
रघुनाथगढ़ सीकर 1055
सुंडा पर्वत जालोर 991
सज्जनगढ़ उदयपुर 938
टॉडगढ़ अजमेर 933
खो जयपुर 920

•अरावली श्रेणी को ऊंचाई के आधार पर चार भागों में बांटा गया हैं

CLASSIFICATION OF ARAVALI
CLASSIFICATION OF ARAVALI

उतरी –पूर्वी अरावली

  • इस क्षेत्र की पहाड़िया फाईलाइट और कवार्टजाइट से बनी हैं
  • इसमें मुख्य रूप से 3 जिले आते हैं  जयपुर , अलवर , दौसा लेकिन  गौण विस्तार सीकर और झ्न्झुनु में भी है
  • उतरी पूर्वी अरावली की सबसे ऊँची चोटी रघुनाथ गढ़ हैं जो सीकर जिले में हैं लम्बाई 1055 मीटर

अन्य चोटियाँ खो -920M , जयपुर

भैराज -792 M अलवर

बबई -792 M झ्न्झुनु

बैराठ – 704M-जयपुर

उतरी अरावली में कोई दर्रा नही हैं

मध्य अरावली

  • मध्य अरावली में 2 जिले आते हैं अजमेर और टोंक ,
  • मध्य अरावली को दो भागों में बांटा गया हैं
  • 1.शेखावाटी की निम्न पहाड़ियां  इन पहाड़ियों का विस्तार सांभर झील से प्रारंभ होकर झुंझुन तक हैं यहाँ पर छोटी छोटी पहाड़िया भी हैं जिनकी औसत ऊंचाई 400 मीटर हैं जैसे पुराना घाट , नाहर गढ़ ,आडा डूंगर , रहोड़ी , तोरावाटी
  • 2. मेरवाड़ा की पहाड़ी यह पहाड़िया मेवाड़ को मारवाड़ से अलग करती हैं यह अजमेर के निकट मिलती हैं इसका उच्चतम शिखर तारागढ़ हैं जो मध्य अरावली की भी सबसे ऊँची चोटी हैं जिसकी ऊंचाई 870 M हैं तारागढ़ के पश्चिम में नागहाड़ हैं जहाँ से लूनी नदी निकलती हैं
मध्य अरावली के दर्रे

दर्रे को घाट या नाल भी कहते हैं

  • प्रमुख दर्रे बर दर्रा – पाली
  • सुराघाट   ब्यावर को अजमेर से जोड़ता हैं – अजमेर
  • शिवपुरी पाखोरिया – अजमेर
  • पिपलीघाट – अजमेर
  • झीलवाडा – अजमेर
  • अरनिया – अजमेर

दक्षिणी अरावली

  • विस्तार – सिरोही , उदयपुर डूंगरपुर ,राजसमन्द में हैं !
  • दक्षिणी अरावली दो भागो में विभाजित हैं
  • 1 मेवाड़ की पहाड़िया
  • 2 आबू खंड
  • दक्षिण अरावली की सबसे ऊँची चोटी गुरु शिखर हैं

मेवाड़ प्रदेश मेवाड़ प्रदेश भी दो भागो में विभाजित हैं

  • 1.प्रमुख पहाड़ियां 
  • 2.प्रमुख पठार
mewad ki pahadiya
mewad ki pahadiya
mewad ke pathar
mewad ke pathar
mewad ke parmukh darre
mewad ke parmukh darre
aabu khand ki pahadiya or pathar
aabu khand ki pahadiya or pathar

दक्षिणी अरावली का गौण विस्तार

  • दक्षिणी अरावली का विस्तार उदयपुर , डूंगरपुर ,सिरोही , राजसमन्द में है लेकिन अरावली का गौण विस्तार जालोर और बाड़मेर तक हैं
  • सिरोही के पश्चिम में जसवन्तपुरा की पहाड़िया हैं जो जालोर में है इसकी सबसे ऊँची चोटी डोरा पर्वत हैं
  • जालोर में अरावली जालोर पर्वत के नाम से जानी जाती हैं
  • यहां की प्रमुख चोटिया इसराना भाकर, रोजा भाकर, झारोला भाकर ,
  • बाड़मेर में यह छप्पन की पहाड़ियां कहलाती हैं या इसे नाकोड़ा पर्वत कहते हैं
  • यहाँ नाकोड़ा भैरव तीर्थ स्थल है इसका विस्तार बालोतरा तक है !
  • बाड़मेर के सिवाना  और जालोर में में ग्रेनाईट शैलें मिलती हैं  इसलिए जालोर की ग्रेनाईट सिटी कहते हैं
  • ग्रेनाईट शैल आग्नेय चट्टानों में मिलती हैं •

अरावली की विशेषताएँ

  • अरावली में सम्पूर्ण राजस्थान की 10% जनसंख्या निवास करती हैं
  • अरावली की जलवायु उपाद्र हैं
  • अरावली में वर्षा 50-60 सेमी
  • अरावली में वनस्पति –उष्ण कटिबंधीय पतझड़ वन
  • अरावली में राजस्थान की सर्वाधिक जन जातियां निवास करती हैं
  • अरावली में पर्वतीय मृदा / लाल मिट्टी पायी हैं जो मक्के की फसल के लिए उपयोगी होती हैं इसका वैज्ञानिक नाम इन्सेपटीसोल हैं
  • अरावली के समांतर हिमालय तक GBT गुजरती हैं जो हिमालय तक जाती हैं GBT कोटा , सवाईमाधोपुर , धौलपुर जिलों से होकर गुजरती हैं
  • अरावली को आडावाला पर्वत भी कहते हैं!
  • विष्णु पुराण में इसे मेरु /सुमेरु पर्वत कहते हैं
  • अरावली पर्वत राजस्थान के साथ साथ पुरे भारत की जल विभाजक रेखा हैं  
  • अरावली के पूर्व से निकलने वाली नदियाँ अपना जल बंगाल की खाड़ी में गिराती हैं और पश्चिम से निकलने वाली अपना जल अरब सागर में गिराती हैं
  • अरावली में सबसे अधिक मात्र में ग्रेनाईट  चट्टान मिलती हैं
  • अरावली पर्वत माला की जगह पहले देहली समूह पर्वतमाला थी
  • देहली समूह पर्वत माला अरावली से भी प्राचीन थी लेकिन वर्तमान में इसका अस्तित्व नही होने के कारण सबसे प्राचीनतम अरावली को माना जाता हैं !
  • अरावली में धात्विक खनिज पाए जाते हैं ! जैसे लोहा , सीसा –जस्ता , ताम्बा आदि
  • धात्विक खनिक हमेशा आग्नेय चट्टानों में मिलते हैं
  • अरावली खनिजो की दृष्टि से राजस्थान का सबसे समृद्ध भौतिक प्रदेश हैं
  •  प्रमुख खाने •लोहे – मोरेजा बानेला , नीमला रायछेला,डाबला सिंघाना नाथरा की पाल , थुर हुन्डैर
  • सीसा जस्ता – जावर , राजपुर दरीबा , रामपुर अगुचा , चौथ का बरवाडा , गुढा किशोरीदास
  • ताम्बा –खेतड़ी , निम का थाना , खो दरीबा, पुर बनेड
  • अरावली में झुमिंग कृषि की जाती हैं
  • इसे स्थान्तरित कृषि भी कहते हैं
  • यह आदिवाशी जन जातियों के द्वारा की जाती हैं
  • इन्हें अलग अलग जनजातियों द्वारा अलग अलग नामों से पुकारा जाता हैं •जैसे •
JHUMING KRISHI
JHUMING KRISHI
अरावली से निकलने वाली नदियाँ
  • आयड़ / बेडच- यह गोगुन्दा की पहाड़ी से निकलती हैं
  • बनास –  खमनोर पहाड़ी
  • साबरमती – कोटड़ा पहाड़ी
  • सूकड़ी- पाली से
  • कोठारी- दिवेर की पहाड़ी से
  • खारी- बिजरावल की पहाड़ी से
  • लूनी –नागपहाड़ से

अरावली से संबधित शब्दावली

•भाकर – सिरोही के पूर्वी भाग में अरावली पर्वतमाला  अत्याधिक कटी –फटी और उबड-खाबड़ हैं स्थानीय भाषा में भाकर कहते हैं!

गिरवा – उदयपुर में अरावली के तश्तरीनुमा आकार को स्थानीय भाषा में गिरवा कहते हैं

मगरा –  उदयपुर के उतर-पश्चिमी भाग को  स्थानीय भाषा में मगरा के नाम से नाम से जानते हैं

नाल– दर्रो को या पहाड़ो में तंग रास्तों को नाल कहते हैं !

पूर्वी मैदानी प्रदेश

राजस्थान के भौतिक प्रदेश में अब हम पढेंगे पूर्वी मैदानी प्रदेश को

पूर्वी मैदान की स्थिति और विस्तार

पूर्वी मैदान अरावली के पूर्व में और दक्षिण पूर्वी पठारी भाग के उत्तर पश्चिम में फैला हुआ हैं

प्रमुख जिले

भरतपुर, अलवर, धौलपुर, करौली, सवाईमाधोपुर, जयुपर, दौसा, टोंक, भीलवाडा डुंगरपुर, बांसवाडा ओर प्रतापगढ

पूर्वी मैदान राजस्थान के कुल क्षेत्रफल का 23.3 प्रतिशत है।

पूर्वी मैदान में राजस्थान की 39 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है।

यह राजस्थान का सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाला भौतिक प्रदेश है

पूर्वी मैदान निर्माण और विशेषता

यह टेथिस सागर का अवशेष है!

इसका निर्माण यमुना और गंगा तथा इसकी सहायक नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मृदा से प्लीस्टोसीन युग में हुआ !

जलोढ़ मृदा सबसे उपजाऊ मृदा होती हैं इसलिए यह राजस्थान का सबसे उपजाऊ क्षेत्र हैं !

जलोढ़ मृदा को कांपिय मृदा यां दोमट  यां एल्फीसोल कहते हैं

इस प्रदेश में कुओं द्वारा सिंचाई होती है!

•वनस्पति :- यहां पर उष्णकटिबंधीय पतझड़ वन •वर्षा :- 60-80 सेमी •जलवायु : उष्णकटिबंधीय आर्द्र

•संरचना और ढाल के आधार पर पूर्वी मैदान को चार भागों में बाँटा जाता है!  

BHABAR , TARAI , KHADAR , BAANAGR
BHABAR , TARAI , KHADAR , BAANAGR

भाबर

इसे जलोढ़ पंख भी कहते हैं

हिमालय से नदिया निचे उतरती हैं तो अपने साथ कंकड़ पत्थर लाती हैं तो वे कंकड़ पत्थर ऊपर रह जाते हैं नदिया निचे की और बहने लगती हैं  अर्थात हम यह कह  सकते हैं की यहाँ पर नदिया अदृश्य /लुप्त हो जाती हैं यह क्षेत्र कृषि योग्य नहीं होता हैं यह हिमालय से बिल्कुल निचे गिरीपाद में होता हैं

इसका क्षेत्रफल 08-16 km होता हैं !

तराई

जो नदिया भाबर में अदृश्य होती हैं वे वापस भाबर के दक्षिण में यानी तराई में दृश्य होती हैं

यह दलदली भाग होता हैं इस भूमि को कृषि योग्य बनाया जाता हैं

इसका क्षेत्रफल 15-30 KM होता हैं

इसे मच्छर पेटी भी कहते हैं

खादर

जब नदी  हिमालय/पर्वतों से नदी उतरती हैं तो भाबर और तराई को पार करके मैदानी भागो में प्रवेश करती  हैं तो अपने साथ कुछ उपजाऊ मिट्टी  लाती हैं इसी उपजाऊ मिट्टी को खादर कहते हैं !

बांगर

खादर उपजाऊ भूमि होती हैं ठीक इसके विपरीत जब नदी उपजाऊ मिट्टी लाती हैं कुछ समय बाद वो नदी उस स्थान से प्रवाहित नहीं होकर अपना रास्ता बदल लेती हैं तो जो पुराना नदी द्वारा उपजाऊ क्षेत्र था वो धीरे धीरे अनुपजाऊ हो जाता हैं उसे ही बांगर कहते हैं !

भाभर , खादर , तराई
भाभर , खादर , तराई
purvi maidani pradesh ka vargikaran

बनास- बांणगंगा बेसीन

यह बनास और इसकी सहायक बाणगंगा, बेड़च, डेन, मानसी, सोडरा, खारी, मोरेल आदि नदियों द्वारा निर्मीत मैदान है

बनास नदी खमनौर की पहाड़ी से निकलती हैं और भीलवाड़ा, अजमेर , टोंक होते हुए सवाई माधोपुर के निकट रामेश्वरम में चम्बल नदी में मिल जाती हैं इसी बनास के प्रवाह क्षेत्र को बनास बेसिन कहते हैं !

बाणगंगा नदी बैराठ की पहाड़ी से निकलती हैं और जयपुर ,दौसा ,भरतपुर होते हुए यमुना में मिल जाती हैं इसी बाणगंगा के प्रवाह क्षेत्र को बाणगंगा बेसिन कहते हैं

ढाल पूर्व की और है

इसमें शिष्ट तथा नीस चट्टाने पायी जाती है!

बनास नदी दो मैदानों का निर्माण करती हैं

मेवाड़ का मैदान

मालपुरा का मैदान

राजसमंद तथा चित्तौड़गढ़ जिलों में  मेवाड़ का मैदान हैं ,     और दूसरा टोंक जिले में  मालपुरा का मैदान हैं !

चम्बल बेसीन

यह चम्बल और इसकी सहायक बनास नदी, सीप नदी,काली सिंध, पार्वती,परवन ,मेज ,आदि नदियों द्वारा निर्मीत मैदान है

चम्बल नदी मध्यप्रदेश के महू जिले की जानापाव पहाड़ी से निकलती हैं और चितोड़गढ़ के चौरासीगढ़ से राजस्थान में प्रवेश करती हैं कोटा बूंदी , सवाई माधोपुर करौली धौलपुर जिले में बहती हुई यमुना में मिल जाती हैं इसी चम्बल  के प्रवाह क्षेत्र को चम्बल  बेसिन कहते हैं

चम्बल बेसिन की ढाल उतर की ओर हैं

इस क्षेत्र में तीन प्रकार की स्थलाकृतिया देखने को मिलती हैं बाढ़ के मैदान , नदी कगार और बीहड़, चम्बल नदी सवाईमाधोपुर, करौली एवं धौलपुर में बीहड़ का निर्माण करती है!

बीहड़

जब चम्बल में पानी की मात्रा अधिक होती हैं तो पानी नदी के दूर भागो तक फ़ैल जाता हैं ! कुछ समय बाद नदी में पानी की मात्र काम होगी तो दूर भागो का पानी वापस नदी की तरफ आने लगता हैं जब जल वापस नदी की और आता हैं तो साथ में मिट्टी का कटाव करके अपने साथ लेकर आती है जिससे बड़ी मात्र में अवनालिकाएं बन जाती हैं इसी मिट्टी के कटाव को अवनालिका अपरदन कहते हैं !

इसी मिट्टी के कटाव से खाईयां और उबड़-खाबड़ आकृतियाँ बन जाती हैं जिसे ही उत्खात भूमी /कन्दराएँ कहते हैं !

इसी उत्खात भूमि में घने जंगल देखने को मिलते हैं और इसे ही बीहड़ कहते है!

सर्वाधिक बीहड़ धौलपुर में हैं और करौली को बीहड़ की रानी कहा जाता हैं

डांग प्रदेश

बीहड़ में उच्च भूमि क्षेत्र  यहाँ पर डाकुओं का निवास होता हैं इस क्षेत्र को डांग कहते हैं ! अर्थात करौली , सवाई माधोपुर और धौलपुर के संयुक्त क्षेत्र को डांग प्रदेश के नाम से जाना जाता हैं

डांग क्षेत्र में रहने वाले लोगो के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए सरकार द्वारा समय समय पर कार्यक्रम चलाये गये हैं

मुख्य कार्यक्रम

कन्दरा क्षेत्र विकास  कार्यक्रम – शुरुआत :-1989

डांग प्रदेश कार्यकरम – शुरुआत :-2004

माही बेसिन

माही बेसिन माही नदी के प्रवाह क्षेत्र को कहते हैं

माही नदी मध्य प्रदेश के धार जिले से निकल कर उत्तर की और प्रवाहित होती हैं तथा कर्क रेखा को पार करके प्रतापगढ़ और बांसवाड़ा की सीमा बनाती है फिर बांसवाड़ा और डूंगरपुर की सीमा बनाते हुए दक्षिण की और मुड़ जाती हैं और वापस दूसरी बार कर्क रेखा को काटती हुई गुजरात में प्रवेश करती हैं  और खंभात कि खाडी में गिरती है।

माही बेसिन में तीन जिले आते हैं

प्रतापगढ़

डूंगरपुर

बांसवाड़ा

माही बेसिन  में काली दोमट मिट्टी पाई जाती है! •माही के किनारे बेणेश्वर धाम , छप्पन का मैदान, वागड़ क्षेत्र , कांठल क्षेत्र हैं ! •

पूर्वी मैदानी प्रदेश की शब्दावली

छप्पन का मैदान

प्रतापगढ़ और बांसवाडा के  मध्य 56 गाँवों के समूह को छप्पन का मैदान कहते हैं यह 56 गाँव माही नदी के अपवाह क्षेत्र में आते हैं !बांसवाडा-प्रतापगढ़

कांठल क्षेत्र

प्रतापगढ़ जिलें में माही नदी के किनारे के मैदान को कांठल का मैदान या कांठल क्षेत्र कहते हैं माही नदी को कांठल की गंगा कहते हैं !-प्रतापगढ़

वागड़ क्षेत्र

डूंगरपुर और बांसवाडा में माही नदी के किनारे विखंडित पहाड़ी क्षेत्र को वागड़ क्षेत्र कहते हैं –जिलें डूंगरपुर , बांसवाडा

मेवल क्षेत्र

मेवाड़ के दक्षिण हिस्से का भाग डूंगरपुर और बांसवाडा का क्षेत्र मेवल नाम से प्रसिद्द है जहाँ मीना जाति की आबादी अधिकतर है | पुराने समय में मीना बहुल इस क्षेत्र को मेवल के नाम से पुका जाना जाता था

दक्षिण-पूर्वी पठारी प्रदेश

राजस्थान के भौतिक प्रदेश में अब हम पढेंगे दक्षिण-पूर्वी पठारी प्रदेश को

पठार का स्वरुप 
  • भू-गर्भिक हलचल से समतल भू-भाग अपने पास वाले धरातल से ऊपर उठ जाता हैं!
  • यां पास वाले भू-भाग नीचे बैठ जाता हैं !
  • यां ज्वालामुखी-क्रिया के समय निकले लावा के जमाव से!
  • यां पर्वतों के निर्माण के समय पास का भाग ऊपर नही उठ पाता हैं तो पठार का निर्माण होता हैं !

पठार का निर्माण

  • अन्तर्जात बलों से उत्पन्न पठार
  • बहिर्जात बलों से उत्पन्न पठार

पठार के प्रकार

  • अन्तरापर्वतीय पठार
  • पर्वतपदीय पठार
  • गुम्बदाकार पठार
  • महाद्वीपीय पठार
  • ज्वालामुखी पठार

दक्षिण-पूर्वी पठारी प्रदेश का निर्माण कैसे हुआ?

  • क्रिटेशियस युग में ज्वालामुखी क्रिया के द्वारा लावा का दरारी उदगार हुआ और बेसाल्ट चट्टानें बन गयी यही बेसाल्ट चट्टानें हाडौती क्षेत्र में देखने को मिलती हैं
  • ज्वालामुखी लावे से जिस मिट्टी का निर्माण होता हैं उसे काली मिट्टी कहते हैं जो उपजाऊ मिट्टी होती हैं  

दक्षिण-पूर्वी पठारी प्रदेश का परिचय और विस्तार

  • इसे हाडोती का पठार भी कहते हैं !
  • यह गोंडवाना लैंड का भाग हैं और मालवा के पठार का उत्तर –पश्चिमी विस्तार हैं
  • इसकी स्थिति चम्बल नदी के पूर्वी भाग में हैं
  • दक्षिण-पूर्वी पठारी प्रदेश राज्य के कुल क्षेत्रफल का 9.6 प्रतिशत है!
  • इस क्षेत्र में राज्य की 11 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है!
  • इस क्षेत्र में राज्य के चार जिले कोटा, बूंदी, बांरा, झालावाड़ आते  है!
  • हाड़ौती के पठार के अंतर्गत उपरमाल का पठार और मेवाड़ का पठार भी आता हैं !
  • यह विन्ध्याचल और अरावली के मध्य स्थित हैं
  • इस पठार की प्रमुख नदी चम्बल नदी है!
  • अन्य नदियां पार्वती, आहू , कालीसिद्ध, परवन, निवाज, इत्यादि!
  • वर्षा 80 से 100 से.मी!
  • झालावाड़ जिला राज्य का सर्वाधिक वर्षा प्राप्त करने वाला जिला है यह राजस्थान का अति आद्र जिला है
  • यहाँ पर कपास, मूंगफली अत्यधिक होती हैं क्योंकि इस क्षेत्र में मध्यम काली मिट्टी की अधिकता है!
  • दक्षिणी-पूर्वी पठारी भाग को दो भागों में बांटा गया है।
  • दक्कन /हाडौती  का पठार – कोटा, बूंदी , बांरा, झालावाड़
  • विन्ध्यन कगार भूमि – धौलपुर. करौली, सवाईमाधोपुर

दक्कन का पठारØइसका निर्माण ज्वालामुखी लावे से हुआ हैंØविस्तार राजस्थान और मध्यप्रदेश में हैंØयहाँ पर बेसाल्ट चट्टानें सर्वाधिक हैं इसलिए यहाँ काली माध्यम मिट्टी मिलेगींØयहाँ खनिजों का अभाव

विन्ध्यन कगार भूमि Øकगार भूमि अर्थात किनारे की भूमि यह बलुआ पत्थर से निर्मित हैं Øयह उत्खात भूमि हैं इसलिए यह अस्पष्ट और अधर प्रवाह क्षेत्र हैं  Øविस्तार बिहार के शासाराम से चितोड़ के बेंगु तक हैं Ø

dakshini purvi pathari pradesh ka vargikaran
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पहाड़ी क्षेत्र

पहाड़ी क्षेत्र में बूंदी की अर्धचन्द्राकार पहाड़ियां और कोटा की मुकुंदरा की पहाड़ियां आती हैं! अर्द्ध चन्द्राकर पाहाडी की सबसे ऊँची चोटी सतूर हैं

और मुकुंदरा की पहाड़ी की सबसे ऊँची चोटी चंदवाडी हैं जो हाडौती की सबसे ऊँची चोटी हैं 

मैदानी क्षेत्र

मैदानी क्षेत्र चम्बल नदी और उसकी सहायक नदियों द्वारा निर्मित मैदान हैं यह मुख्यतया कोटा जिले और बारां में हैं और कुछ भाग चितोड़गढ़ और बांसवाडा का भी आता हैं 

झालावाड का पठार

इस पठार का विस्तार झालावाड जिलें में हैं सर्वाधिक काली मिट्टी हाडौती क्षेत्र में इसी पठार पर मिलती हैं

शाहबाद उच्च भूमि

शाहबाद बारां जिलें की तहसील हैं इसका विस्तार भी सर्वाधिक शाहाबाद और आसपास बारां जिलें में हैं ,  यहां पर वर्षा जल एकत्र से झील बनी हुई है जिसे परवन झील कहते हैं !

डग गंगाधर प्रदेश

यह झालावाड का क्षेत्र हैं गंगाधर तात्या के नाम से इस क्षेत्र का नाम हैं

dakshini purvi pathari pradesh
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इस प्रकार यह सम्पूर्ण राजस्थान के भौतिक प्रदेश हो गए

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