राजस्थान की प्रशिद्ध हस्तकला

राजस्थान की प्रशिद्ध हस्तकला

पॉटरी कला

पॉटरी कला चीनी मिटटी से कोई सामान बनता है और उसके ऊपर सजावट की जाती हैं उसे कहते हैं यह कला पर्शिया(ईरान) से लाई गई थी
पॉटरी कला कई जगह की पसंद हैं जैसे
जयपुर की ब्लू पॉटरी प्रशिद्ध हैं जयपुर की ब्लू पॉटरी को विश्वविख्यात यानि विश्व स्तर का दर्जा दिलाने में कृपालसिंह शेखावत जो सीकर के रहने वाले थे उनका बहुत बड़ा योगदान रहा और इस कला का विकास यानी स्वर्ण कल महाराजा रामसिंह के काल में हुआ
इसी प्रकार ब्लैक पॉटरी कोटा की प्रशिद्ध हैं और
कागजी पॉटरी अलवर की प्रशिद्ध हैं
ब्लू पॉटरी का फोटो देखे


मथैरना कला

मथैरना कला बीकानेर की प्रशिद्ध हैं
इसमें दीवारों पर देवी देवताओं के चित्रों की डिजाईन की जाती हैं
बीकानेर का मथैरना परिवार इस कला में सिद्धहस्त हैं
मथैरना कला का फोटो देखे


उस्ता कला

यह भी बीकानेर की प्रशिद्ध हैं
इसको मुनवत कला भी कहते हैं
उस्ता कला ऊंट की खाल पर किये जाने वाले मुनवत के कार्य को उस्ता कला कहते हैं
इस कला का विकास पद्मश्री 1986 से सम्मानित बीकानेर के सिद्धहस्त कलाकार स्वर्गिय हिसामुद्धीन उस्ता ने किया था
उस्ता कला का परशिक्षण केंद्र बीकानेर में camel Hide training center संसथान हैं
इस कला को बीकानेर लाने का श्रेय रायसिंह और इसका स्वर्ण काल कर्णसिंह के समय था
उस्ता कला की कलाकारी देखे


मीनाकारी कला

सोने चांदी व् पत्थर पर रंग भरने की कला को मीनाकारी कहते हैं
मीनाकारी जयपुर की बहुत प्रशिद्ध हैं मीनाकारी कला को जयपुर के शासक मानसिंह Ist लाहोर (पाकिस्तान ) से लाये थे
जयपुर में इस कला के प्रमुख कलाकार कुदरत सिंह हुए थे
जयपुर के अलावा बीकानेर की कागजी मीनाकारी प्रशिद्ध हैं (कागजी मीनाकारी :- कागज जैसे पतले पत्थर पर सोने तथा अन्य धातु की कलाकारी को कागजी मीनाकारी कहते हैं
और पीतल की मीनाकारी भी होती जो सर्वाधिक अलवर और जयपुर में होती हैं
फोटो देखे


थेवा कला

कांच पर सूक्ष्म कारीगरी को थेवा कला कहते हैं यानि सोने व चांदी पर कीमती कांच लगवाया जाता हैं
यह कला प्रतापगढ़ की प्रशिद्ध हैं
प्रतापगढ़ का सोनी परिवार इस कला के लिए प्रशिद्ध हैं
इसमें जो विशेष कांच का इस्तेमाल होता हैं वो बेल्जियम से मंगवाया जाता हैं


टेराकोटा कला

इसमें पक्की लाल मिटटी से सजावटी सामान बनाया जाता हैं
यह कला राजसमन्द का एक गाँव हैमोलेला वहां की प्रशिद्ध हैं
फड़ व मांदल नामक वाद्य यंत्र का निर्माण मोलेला में होता है।
कागजी टेराकोटा के लिए अलवर प्रसिद्ध है। सुनहरी टेराकोटा के लिए बीकानेर प्रसिद्ध है

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Author: RPSC GURU

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