Rajasthan polity – State Legislature

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Rajasthan polity – State Legislature राज्य विधान मण्डल

Rajasthan polity – State Legislature

संविधान के भाग VI में अनुच्छेद 168 से 212 तक राज्य-विधानमंडल की संरचना, गठन, कार्यकाल, प्रक्रियाओं, विशेषाधिकार तथा शक्तियों आदि का प्रावधान है। आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature

अनुच्छेद 168 के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए एक विधानमण्डल होगा जो राज्यपाल और एक या दो सदनों से मिलकर बनेगा।
जहाँ विधानमण्डल के दो सदन है वहाँ एक का नाम विधान परिषद् (उच्च सदन/द्वितीय सदन/वरिष्ठों का सदन) है जबकि दूसरे का नाम विधानसभा (निम्न सदन/पहला सदन/लोकप्रिय सदन) है।
विधान परिषद्

संविधान के अनुच्छेद 169 के अनुसार संसद विधि द्वारा विधान परिषद् का गठन या उन्मूलन कर सकती है। इसके लिए संबंधित राज्य की विधानसभा ने इस आशय का संकल्प विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों की संख्या के कम से कम 2/3 बहुमत द्वारा पारित कर दिया है।
संसद के दाेनाें सदनों द्वारा अपने सामान्य बहुमत से स्वीकृति देने पर संबंधित राज्य मे विधान परिषद् का गठन एवं उन्मूलन होता है।
नोट – विधान परिषद् के गठन व उत्सादन पर अनुच्छेद 368 की प्रक्रिया लागू नहीं होती है।

विधान परिषद् की संरचना (अनुच्छेद 171)

संख्या :- इसमें अधिकतम संख्या संबंधित राज्य की विधानसभा की एक-तिहाई और न्यूनतम 40 निश्चित है।
नोट :- इनकी वास्तविक संख्या निर्धारित संसद करती है। आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature

निर्वाचन पद्धति :-

विधान परिषद् के सदस्य का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा अप्रत्यक्ष से होता है।
विधान परिषद् के कुल सदस्यों में से –

1/3 सदस्यों का चुनाव विधानसभा के सदस्यों द्वारा किया जाता है।
1/3 सदस्य स्थानीय निकायों जैसे- नगरपालिका, जिला परिषद् आदि के सदस्यों द्वारा चुनाव किया जाता है।
1/6 सदस्यों को राज्यपाल द्वारा मनोनीत किये जाते है जिन्हें साहित्य, ज्ञान, कला, सहकारिता, समाज-सेवा का विशेष ज्ञान हो।
1/12 सदस्यों का निर्वाचन माध्यमिक स्तर के स्कूल के अध्यापक करते है जो पिछले 3 वर्षों से अध्यापन कर रहे हैं।
1/12 सदस्यों को राज्य में रह रहे 3 वर्ष से स्नातकों द्वारा निर्वाचित किये जाते हैं।
इस प्रकार विधान परिषद् के कुल सदस्यों में से 5/6 सदस्यों का अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव होता है और 1/6 को राज्यपाल नामित करता है। आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature

राज्यपाल द्वारा नामित सदस्यों को किसी भी स्थिति में अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है।

विधान परिषद् एवं सदस्यों का कार्यकाल :-

राज्य की विधान परिषद् का विघटन नहीं होगा किन्तु इसके एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष में सेवानिवृत्त होते रहते हैं।
इस तरह एक सदस्य छह वर्ष के लिए सदस्य बनता है। खाली पदों को नये चुनाव और नामांकन (राज्यपाल द्वारा) हर तीसरे वर्ष के प्रारंभ में भरा जाता है।
सेवानिवृत्त सदस्य भी पुन: चुनाव और दोबारा नामांकन हेतु योग्य होते हैं।
विधान परिषद् के सदस्यों के लिए अर्हताएं/योग्यताएँ (अनुच्छेद 173)
भारत का नागरिक हो।
30 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो।
संसद द्वारा निश्चित की गयी योग्यता धारण करता हो।
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के अनुसार किसी व्यक्ति को उस राज्य के किसी विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता होना चाहिए।
राज्यपाल उसी व्यक्ति को मनोनीत करेंगे जो राज्य का मूल निवासी हो।
सदस्यता के लिए निरर्हताएँ
संविधान के अनुच्छेद 191 के अनुसार निम्नलिखित व्यक्ति अयोग्य होंगे।
लाभ का पद ग्रहण किया हो।
वह विकृतचित्त (Undischarged) हो।
वह संसद के किसी कानून के अधीन अयोग्य घोषित कर दिया गया।
विधान परिषद् की बैठक एवं गणपूर्ति आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature
विधान परिषद् की वर्ष में दो बार बैठक तथा दो बैठकों के मध्य 6 माह से अधिक का अन्तराल नहीं होना चाहिए।
गणपूर्ति के लिए कम से कम 10% सदस्य सदन में उपस्थित हो किंतु यह संख्या 10 से कम नहीं होनी चाहिए। (अनुच्छेद 189)

वर्तमान में छ: राज्यों में विधान परिषद् है-

  1. आंध्रप्रदेश
  2. तेलंगाना
  3. उत्तर प्रदेश
  4. बिहार
  5. महाराष्ट्र
  6. कर्नाटक
नोट – अप्रैल 2012 में राजस्थान विधानसभा द्वारा विधान परिषद् के गठन हेतु एक प्रस्ताव पारित किया गया था। जिसमें विधान परिषद् की संख्या 66 निर्धारित की गयी थी। इस पर अगस्त 2013 में राज्यसभा में एक विधेयक लाया गया था जो वर्तमान मे लम्बित् है।

विधानसभा

अनुच्छेद 170 के अनुसार प्रत्येक राज्य की एक विधानसभा होगी।

विधानसभा को निम्न सदन/पहला सदन भी कहा जाता है।
विधानसभा सदस्यों की संख्या (अनुच्छेद 170) आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature

विधानसभा के प्रतिनिधियों को प्रत्यक्ष मतदान से वयस्क मताधिकार के द्वारा निर्वाचित किया जाता है। (फर्स्ट पास्ट द पोस्ट/अग्रता ही विजेता )
इसकी अधिकतम संख्या 500 और न्यूनतम 60 तय की गयी है तथा इनके बीच की संख्या राज्य की जनसंख्या एवं इसके आकार पर निर्भर है।
अपवाद :- सिक्किम (32), गोवा (40), मिजोरम (40) पांडिचेरी (30)

नोट – संसद कानून बनाकर विधानसभा की सीटों में वृद्धि कर सकती है। इसके लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता नहीं होती है।

राज्यपाल आंग्ल-भारतीय समुदाय से एक सदस्य को नामित कर सकता है। यदि इस समुदाय का प्रतिनिधि विधानसभा में पर्याप्त नहीं हो। यह उपबंध 95वें संविधान संशोधन 2009 के तहत 2020 तक के लिये बढ़ा दिया गया है। (अनुच्छेद 333)

वर्तमान में सर्वाधिक विधानसभा सीटें वाले राज्य-
  1. उत्तरप्रदेश (403) 2. पश्चिम बंगाल (294)
  2. महाराष्ट्र (288) 4. बिहार (243)
नोट :- दो केन्द्रशासित प्रदेश दिल्ली एवं पुडुचेरी में विधानसभा है जहाँ क्रमश: 70 एवं 30 सदस्यों की संख्या है।

हालांकि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 व 35A समाप्त करने के बाद जम्मू-कश्मीर को दो केन्द्रशासित प्रदेशों (जम्मू-कश्मीर व लद्दाख) में विभाजित कर दिया गया है। जम्मू-कश्मीर केन्द्रशासित प्रदेश में भी विधानसभा के गठन का प्रावधान किया गया है। आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature

प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र

अनुच्छेद 170 के अनुसार राज्य के भीतर प्रत्येक प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र की जनसंख्या के अनुसार आनुपातिक रूप से समान प्रतिनिधित्व होगा। जनसंख्या का अभिप्राय वह पिछली जनगणना है जिसकी सूची प्रकाशित की गयी है।

प्रत्येक जनगणना के बाद पुननिर्धारण

  1. प्रत्येक राज्य के विधानसभा के हिसाब से सीटों का निर्धारण होगा।
  2. हर राज्य का निर्वाचन क्षेत्रों के हिसाब से विभाजन होगा।

संसद को इस बात का अधिकार है कि वह संबंधित मामले का निर्धारण करे। इसी उद्देश्य के तहत 1952, 1962, 1972 और 2002 में संसद ने परिसीमन आयोग अधिनियम पारित किया।
42वें संविधान संशोधन 1976 के तहत विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्रों को 1971 की जनसंख्या के आधार पर वर्ष 2000 तक के लिये निश्चित कर दिया गया। जिसे 84वें संविधान संशोधन 2001 के तहत 2026 तक के लिये बढ़ा दिया गया।

परिसीमन आयोग (अनुच्छेद 82) आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature

अब तक चार बार परिसीमन आयोग गठित किया गया।
प्रथम- 1952, द्वितीय- 1962, तृतीय- 1972, चतुर्थ-2002
चतुर्थ परिसीमन आयोग के अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश कुलदीप सिंह को बनाया गया।
परिसीमन आयोग का गठन संसद द्वारा किया जाता है।
अनुसूचित जाति/जनजाति के लिये स्थानों का आरक्षण (अनुच्छेद 332)

संविधान में राज्य की जनसंख्या के अनुपात के आधार पर प्रत्येक राज्य की विधानसभा के लिए अनुसूचित जाति/जनजाति की सीटों की व्यवस्था की गई है।

आंग्ल-भारतीय समुदाय के लिए स्थानों का आरक्षण (अनुच्छेद 333)

राज्यपाल अनुच्छेद 333 के तहत आंग्ल-भारतीय समुदाय से एक सदस्य को नामित कर सकता है। यदि इस समुदाय का पर्याप्त प्रतिनिधित्व विधानसभा में नहीं हो तो।
विधानसभा का कार्यकाल [अनुच्छेद 172 (1)]

चुनाव के बाद पहली बैठक से लेकर इसका सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। इसके पश्चात विधानसभा स्वत: ही विघटित हो जाती है।
नोट :- राष्ट्रीय आपातकाल के समय में संसद द्वारा विधानसभा का कार्यकाल एक समय में एक वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है, हालांकि यह विस्तार आपातकाल खत्म होने के बाद छह महीनों से अधिक का नहीं हो सकता है।

विधानसभा सदस्यों के लिए अर्हताएं/योग्यताएँ (अनुच्छेद 173)

  • भारत का नागरिक हो।
  • उसे चुनाव आयोग द्वारा अधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष शपथ लेनी पड़ती है।
  • नोट :- विधानमंडल के प्रत्येक सदन का प्रत्येक सदस्य सदन में सीट ग्रहण करने से पहले राज्यपाल या उसके द्वारा इस कार्य के लिए नियुक्त व्यक्ति के समक्ष शपथ या प्रतिज्ञान लेगा। (अनुसूची 3)
  • 25 वर्ष की आयु होनी चाहिए।
  • इसके अतिरिक्त जन-प्रतिनिधत्व अधिनियम 1951 के तहत संसद द्वारा निश्चित अर्हताएं –
विधानसभा सदस्य बनने वाला व्यक्ति संबंधित राज्य के निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता होना चाहिए।
SC/ST का सदस्य होना चाहिए यदि वह SC/ST की सीट के लिए चुनाव लड़ता है। हालांकि SC/ST का सदस्य उस सीट के लिए भी चुनाव लड़ सकता है, जो उसके लिए आरक्षित न हो। आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature

विधानसभा सदस्यों के लिए निरर्हताएं (अनुच्छेद 191)

  • यदि वह लाभ का पद धारण करता हो।
  • वह दिवालिया घोषित किया गया हो।
  • न्यायालय द्वारा विकृत्तचित्त घोषित करने पर।
  • वह भारत का नागरिक न हो या उसने विदेश में कही नागरिकता स्वेच्छा से अर्जित कर ली है।
  • संसद द्वारा निर्मित किसी विधि द्वारा या उसके अधीन अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।

अनुच्छेद 192 में यह स्पष्ट उल्लेखित है कि पहली 4 स्थितियों में (लाभ का पद ले लेने पर, विकृत्तचित्त, दिवालिया तथा नागरिक नहीं रहने पर) विधानमंडल की सदस्यता भारत के निर्वाचन आयोग के परामर्श पर राज्यपाल समाप्त करते हैं। राज्यपाल को इस संदर्भ में चुनाव आयोग के परामर्श के आधार पर ही निर्णय लेना हाेता है।

  • इसके अतिरिक्त जन-प्रतिनिधित्व एक्ट 1951 के तहत संसद द्वारा निश्चित निरर्हताएँ–
  • चुनाव में किसी प्रकार के भ्रष्ट आचरण या चुनावी अपराध का दोषी पाया गया हो।
  • निर्धारित समय सीमा के अन्दर चुनावी खर्च संबंधित विवरण प्रस्तुत करने में असफल रहा हो।
  • उसका किसी सरकारी ठेके कार्य अथवा सेवाओं में कोई रूचि हो।
  • दल-बदल के आधार पर व्यक्ति अयोग्य हो (दसवीं अनुसूची के उपबंधों के तहत)
  • दल-बदल के आधार पर संबंधित सदन का अध्यक्ष सदस्यता को समाप्त करता है।
  • नोट :- संविधान में लाभ का पद का उल्लेख नहीं है।

शपथ आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature

अनुच्छेद 188 के अनुसार विधानमंडल के सभी सदस्यों को राज्यपाल अथवा उनके द्वारा अधिकृत किये गये व्यक्ति द्वारा शपथ दिलाई जाती है।
विधानमंडल के सभी सदस्य अनुसूची 3 में दिये गये प्रारूप के अनुरूप संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेते हैं।

विधानसभा सचिवालय

अनुच्छेद 187 में यह उल्लेखित है कि प्रत्येक राज्य विधानमंडल के लिए एक सचिवालय होगा।
सचिवालय के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भर्ती तथा सेवा-शर्तों का निर्धारण विधानसभा अध्यक्ष के परामर्श से राज्यपाल द्वारा किया जाता है।
यह सचिवालय विधानसभा के प्रशासनिक कार्यों की देखभाल करता है।
राजस्थान सन्दर्भ में विधानसभा सचिव इस सचिवालय का प्रशासनिक प्रमुख होता है। भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी को इस पद पर विधानसभा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किया जाता है।

स्थानों का रिक्त होना

विधानमंडल का सदस्य निम्न मामलों में अपना पद छोड़ता है।
दोहरी सदस्यता :- संविधान के अनुच्छेद 190(1) के अनुसार कोई व्यक्ति राज्य के विधानमंडल के दोनों सदनों का सदस्य नहीं होगा। यदि कोई व्यक्ति दोनों सदनों के लिए निर्वाचित होता है तो राज्य विधानमंडल द्वारा निर्मित विधि के उपबंधों के तहत एक सदन से उसकी सीट रिक्त हो जायेगी।
निरर्हता :- राज्य विधानमण्डल का कोई सदस्य यदि अयोग्य पाया जाता है तो उसका पद रिक्त हो जाएगा।
त्यागपत्र :- कोई सदस्य अपना लिखित इस्तीफा विधान परिषद् के मामले में सभापति और विधानसभा के मामले में अध्यक्ष को दे सकता है। स्वीकृति की स्थिति में पद रिक्त माना जायेगा।
अनुपस्थिति :- यदि कोई सदस्य बिना पूर्व अनुमति के 60 दिन तक बैठकों से अनुपस्थित रहता है तो सदन उसके पद को रिक्त घोषित कर सकता है।
अन्य मामले :-
i. न्यायालय द्वारा उसके निर्वाचन काे अमान्य ठहरा दिया जाए।
ii. सदन से निष्काषित कर दिया जाए।
iii. राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के पद पर निर्वाचित हो जाए।
iv. राज्यपाल पद पर नियुक्त हो जाए।

विधानसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष

अनुच्छेद 178 के तहत प्रत्येक राज्य की विधानसभा अपने दो सदस्याें को अपना अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनेगी।
अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का पद विधानसभा के कार्यकाल तक होता है।
अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना (अनुच्छेद 179)

अनुच्छेद 179 के अनुसार तीन मामलों में अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष अपना पद रिक्त करते है-

  • यदि उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त हो जाए।
  • यदि वह सदस्य अध्यक्ष है तो उपाध्यक्ष को संबोधित करके अपना लिखित त्यागपत्र दे।
  • विधानसभा के समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जाए। इस तरह का कोई प्रस्ताव केवल 14 दिन की पूर्व सूचना के बाद ही लाया जा सकता है।
  • अध्यक्ष के पद के कर्त्तव्यों का पालन करने या अध्यक्ष के रूप में कार्य करने की उपाध्यक्ष या अन्य व्यक्ति की शक्ति (अनुच्छेद 180)

अनुच्छेद 180 के अनुसार जब अध्यक्ष का पद रिक्त हो तब उपाध्यक्ष या यदि वह भी अनुपस्थित है तो ऐसा व्यक्ति जिसको राज्यपाल इस उद्देश्य के लिए नियुक्त करे उस पद के कर्त्तव्यों का पालन करेगा।
जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के पद से हटाने का कोई संकल्प विचारधीन है तब उसका पीठासीन न होना (अनुच्छेद 181)

अनुच्छेद 181 के तहत विधानसभा की किसी बैठक में जब अध्यक्ष को इसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब अध्यक्ष या जब उपाध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचारधीन है तब उपाध्यक्ष, उपस्थित रहने पर भी पीठासीन नहीं होगा।
विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियाँ

अध्यक्ष विधानसभा में व्यवस्था एवं मर्यादा को बनाये रखते हुए विधानसभा बैठकों की अध्यक्षता करता है।
विधानसभा में इसकी अनुमति के बिना कोई प्रस्ताव नहीं रखा जा सकता है।
वह सदन में संविधान तथा प्रक्रिया संबंधित का अन्तिम व्याख्याकार होता है।
वह सदन में अव्यवस्था की स्थिति में सभा की कार्यवाही को स्थगित, सभा की कार्यवाही के दौरान प्रयुक्त अशिष्ट एवं असंसदीय शब्दों को कार्यवाही से निष्कासित कर सकता है।
कोई विधेयक वित्त विधेयक है या नहीं इसका निर्णय अध्यक्ष ही करता है।
प्रथम मामलें में वह मत नहीं देता लेेकिन बराबर मत होने की स्थिति में वह निर्णायक मत दे सकता है।
कोरम की अनुपस्थिति में वह विधानसभा की बैठक को स्थगित या निलंबित कर सकता है।
विधानसभा की सभी समितियों के अध्यक्ष की नियुक्ति और उनके कार्यों का पर्यवेक्षण अध्यक्ष ही करता है।
10 वीं अनुसूची के उपबंधों के आधार पर किसी सदस्य की निरर्हता को लेकर उठे किसी विवाद पर फैसला देता है।

सदन के नेता के आग्रह पर वह गुप्त बैठक को अनुमति प्रदान कर सकता है।
अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सभापति और उपसभापति के वेतन और भत्ते- (अनुच्छेद 186)

अनुच्छेद 186 के तहत अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सभापति एवं उपसभापति का वेतन एवं भत्तों का विधानमण्डल विधि द्वारा नियत करे और जब तक इस प्रकार का उपबन्ध नहीं किया जाता है तब तक ऐसे वेतन और भत्तो का जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट है, संदाय किया जाएगा।

राज्य विधानमंडल सत्र

अनुच्छेद 174 में राज्य विधायिका के सत्र, सत्रावसान एव उनका भंग होने का उल्लेख है। आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature

आहूत करना :- राज्य विधानसभा के प्रत्येक सदन को राज्यपाल समय-समय पर बैठक का बुलावा भेजता है। दोनों सत्रों के बीच 6 माह से अधिक का समय नहीं होना चाहिए। राज्य विधानमंडल को एक वर्ष में कम से कम दो बार मिलना चाहिए। एक सत्र में विधानमंडल की कई बैठकें हो सकती है।

स्थगन :- बैठक को किसी समय विशेष के लिए स्थगित भी किया जा सकता है। यह समय घंटों, दिनों या हफ्तों का भी हो सकता है। अनिश्चित काल स्थगन का अर्थ है कि चालू सत्र को अनिश्चित काल तक के लिए समाप्त कर देना। इन दोनों तरह के स्थगन का अधिकार सदन के पीठासीन अधिकारी को हो।

सत्रावसान :- पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष या सभापति) कार्य सम्पन्न होने पर सत्र को अनिश्चित काल के लिए स्थगन की घोषणा करते है। इसके कुछ दिन बाद राष्ट्रपति सत्रावसान की अधिसूचना जारी करता है। स्थगन के विपरीत सत्रावसान सदन के सत्र को समाप्त करता है।

विघटन :- एक स्थायी सदन के तहत विधान परिषद् कभी विघटित नहीं हाेती है। सिर्फ विधानसभा ही विघटित हो सकती है। सत्रावसान के विपरीत विघटन से वर्तमान सदन का कार्यकाल समाप्त हो जाता है और चुनाव के बाद नए सदन का गठन होता है।

विधानसभा के विघटित होने पर विधेयकों के खारिज हाेने की स्थिति :-

विधानसभा में लंबित विधेयक समाप्त हो जाता है। चाहे मूल रूप से यह विधानसभा द्वारा प्रारंभ किया गया हो या फिर उसे विधान परिषद् द्वारा भेजा गया हो।
विधानसभा द्वारा पारित विधेयक लेकिन विधान परिषद् में है तो खारिज हो जायेगा।
ऐसा विधेयक जो विधान परिषद् में लंबित हो लेकिन विधानसभा द्वारा पारित न हो, को खारिज नहीं किया जा सकता।
ऐसा विधेयक जो विधानसभा द्वारा पारित हो (एक सदनीय विधानमंडल वाले राज्यों में) या दोनों सदनों द्वारा पारित हो (द्वि-सदनीय राज्यों में) लेकिन राज्यपाल या राष्ट्रपति की स्वीकृति के कारण रूका हुआ हो तो खारिज नहीं किया जा सकता।
ऐसा विधेयक जो विधानसभा द्वारा पारित हो (एक सदनीय) या दोनों सदनों द्वारा पारित हो (द्वि-सदनीय) लेकिन राष्ट्रपति द्वारा सदन के पास पुनर्विचार हेतु लौटाया गया हो को समाप्त नहीं किया जा सकता है।
कोरम/गणपूर्ति (अनुच्छेद 189) आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature

किसी भी कार्य को करने के लिए सदन में उपस्थित सदस्यों की न्यूनतम संख्या को काेरम कहते हैं।

यह सदन में कुल सदस्यों का दसवां हिस्सा (पीठासीन अधिकारी सहित) या 10 (जो भी अधिक हो) होते हैं।
यदि कोरम पूरा नहीं हो तो पीठासीन अधिकारी सदन को स्थगित करता है।
मंत्रियों एवं महाधिवक्ता के अधिकार (अनुच्छेद 177)

प्रत्येक मंत्री एवं महाधिवक्ता को यह अधिकार है कि वह सदन की कार्यवाही में भाग ले, बोले तथा सदन से संबंधित समिति जिसके वह सदस्य के रूप में नामित है भाग ले सकता है लेकिन वोट नहीं दे सकता है।
विधानमण्डल की विधायी प्रकिया

साधारण विधेयक के संबंध में

A. विधेयक का प्रारंभिक सदन :-

एक साधारण विधेयक विधानमंडल के किसी भी सदन में प्रारंभ हो सकता है।
ऐसा कोई भी विधेयक, मंत्री या किसी भी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।
विधेयक प्रारंभिक सदन में तीन स्तरों (प्रथम पाठन, द्वितीय पाठन, तृतीय पाठन) से गुजरता है।
प्रारंभिक सदन से विधेयक के पारित होेने के बाद दूसरे सदन में विचारार्थ और पारित करने हेतु भेजा जाता है।
एक सदनीय व्यवस्था वाले विधानमण्डल में इसे पारित कर सीधे राज्यपाल की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है।

B. दूसरे सदन में विधेयक :-

दूसरे सदन में भी विधेयक प्रथम पाठन, द्वितीय पाठन एवं तृतीय पाठन स्तरों के बाद पारित होता है।
विधानसभा से पारित होने के बाद कोई भी विधेयक विधान परिषद् में भेजा जाता है, तो वहाँ निम्न विकल्प होते है- आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature

  1. स्वीकृत कर दिया जाए। आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature
  2. अस्वीकृत कर दे।
  3. संशोधन सहित पारित कर विचारार्थ हेतु विधानसभा को भेज दिया जाए।
  4. कोई भी कार्यवाही नहीं की जाए और विधेयक को लंबित रखा जाए।

साधारण विधेयक पारित करने के संदर्भ में विधानसभा को विशेष शक्ति प्राप्त है।
विधान परिषद् किसी विधयेक को अधिकतम चार माह के लिए रोक सकती है। पहली बार में तीन माह के लिए और दूसरी बार में एक माह के लिए।
किसी विधेयक पर असहमति होने पर दोनों सदनों की संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है।
यदि कोई विधेयक विधान परिषद् में निर्मित हो और उसे विधानसभा अस्वीकृत कर दे तो विधेयक समाप्त हो जाता है।
नोट :- किसी साधारण विधयेक को पास कराने के लिए लोकसभा एवं राज्यसभा की संयुक्त बैठक का प्रावधान है।

C. राज्यपाल की स्वीकृति :-

विधानसभा या द्विसदनीय व्यवस्था में दोनों सदनों द्वारा पारित हाेने के बाद प्रत्येक विधेयक राज्यपाल के समक्ष स्वीकृति के लिए भेजा जाता है।

राज्यपाल के पास निम्न चार विकल्प होते हैं-

  1. स्वीकृति प्रदान करे।
  2. विधेयक को अपनी स्वीकृति देने से रोके रखे
  3. सदन के पास विधेयक को पुनर्विचार के लिए भेज दे।
  4. राष्ट्रपति के विचारार्थ विधेयक को सुरक्षित रख ले।

यदि राज्यपाल द्वारा स्वीकृति दे दी जाती है तो विधेयक अधिनियम बन जाता है।
राज्यपाल विधेयक को पुनर्विचार के लिए भेजता है और दोबारा सदन या सदनों द्वारा इसे पारित कर दिया जाता है और पुन: राज्यपाल के पास भेजा जाता है तो राज्यपाल को उसे मंजूरी देना अनिवार्य हो जाता है।
यदि राज्यपाल विधेयक को रोक लेता है तो विधेयक समाप्त हो जाता है और अधिनियम नहीं बनता।
यदि कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित रखा जाता है तो राष्ट्रपति या तो अपनी स्वीकृति दे देते हैं उसे रोक सकते या विधानमंडल के सदन या सदनों को पुनर्विचार हेतु भेज सकते हैं। 6 माह के भीतर इस विधेयक पर पुनर्विचार अनिवार्य है।
यदि विधेयक को उसके मूल रूप में या संशोधित कर दोबारा राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है तो संविधान में इस बात का उल्लेख नहीं है कि राष्ट्रपति इस विधेयक को मंजूरी दे या नहीं। आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature

धन विधेयक के संबंध में (अनुच्छेद 198)

  • धन विधेयक विधान परिषद् में पेश नहीं किया जा सकता है।
  • धन विधेयक राज्यपाल की पूर्व स्वीकृति से ही विधानसभा में प्रस्तुत किया जाता है।
  • धन विधेयक को सरकारी विधेयक कहा जाता है क्योंकि यह केवल मंत्री द्वारा ही प्रस्तुत किया जाता है।
  • विधानसभा में पारित होने के बाद धन विधेयक को विधान परिषद् को विचारार्थ हेतु भेजा जाता है।
  • विधान परिषद् न तो इसे अस्वीकार कर सकती है, न ही इसमें संशोधन कर सकती है।
  • विधान परिषद् केवल सिफारिश कर सकती है और 14 दिनों में विधेयक को लौटाना भी होता है।
  • विधानसभा विधान परिषद् के सुझावों को स्वीकार भी कर सकती है और अस्वीकार भी।
  • यदि विधान परिषद् 14 दिनों के भीतर विधानसभा को विधेयक न लौटाए तो इसे दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है।
  • धन विधेयक को विधान परिषद् अधिकतम 14 दिन तक रोक सकती है।
  • राज्यपाल धन विधेयक को राज्य विधानमंडल के पास पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता। सामान्यत: राज्यपाल स्वीकृति दे देता है क्योंकि इसे राज्यपाल की पूर्व सहमति से ही लाया जाता है।

नोट :-राज्य विधानमंडल द्वारा प्रस्तुत किसी विधेयक को अनुच्छेद 200 के अंतर्गत राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित स्थानों की शक्ति राज्यपाल के स्वविवेक के अधीन है।

अनुच्छेद 200 में यह स्पष्ट उल्लेख है कि उच्च न्यायालय की शक्तियों में कमी करने वाला विधेयक अनिवार्य रूप से राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए भेजा जायेगा। उदा. के लिए राजस्थान में 1973 में लोकायुक्त एवं 2009 में ग्राम न्यायालय से संबंधित विधेयक राज्यपाल के द्वारा राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजे गये थे।
संविधान के अनुच्छेद 201 के अनुसार जब कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रख लिया जाता है जब राष्ट्रपति घोषित करेगा कि वह विधेयक पर अनुमति देता है या अनुमति रोक लेता है।
राज्य विधानमंडल के विशेषाधिकार (अनुच्छेद 194)

राज्य विधानमण्डल के विशेषाधिकार राज्यपाल को प्राप्त नहीं होते हैं जो राज्य विधानमण्डल का अंग है।
विशेषाधिकारों को दो श्रेणियों में बांटा जाता है एक जिन्हें राज्य विधानमंडल के प्रत्येक सदन द्वारा संयुक्त रूप से प्राप्त किया जाता है दुसरा जिन्हें सदस्य व्यक्तिगत रूप से प्राप्त करते हैं। आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature

सामूहिक विशेषाधिकारव्यक्तिगत विशेषाधिकार
सदन को अपने प्रतिवेदनों, वाद-विवादों और कार्यवाहियों को प्रकाशन करें या अन्यों को इसके प्रकाशन से प्रतिबंधित करे। उन्हें सदन चलने के 40 दिन पहले और 40 दिन बाद तक गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।  
यह कुछ महत्त्वपूर्ण मामलों में गुप्त बैठक कर सकते हैं।राज्य विधानमंडल में बोलने की स्वतंत्रता है। उसके द्वारा किसी कार्यवाही या समिति में दिए गए मत या विचार को किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
न्यायालय सभा या इसकी समितियों की जाँच नहीं कर सकती।जब सदन चल रहा हो, वे साक्ष्य देने या किसी मामले में गवाह उपस्थित होेने से इनकार कर सकते है।
पीठासीन अधिकारी की अनुमति के बिना किसी व्यक्ति (सदस्य या बाह्य) को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature
यह फटकार या कारावास द्वारा विशेषाधिकारों के उल्लंघन या सभा की अवमानना के लिए सदस्यों सहित बाह्य व्यक्तियों काे दण्डित कर सकती है। 

नोट :-

अनुच्छेद 210 के अनुसार राज्य विधानमंडल की भाषा हिंदी, एवं अंग्रेजी होगी। सदन के अध्यक्ष द्वारा अनुमति दिये जाने पर मातृभाषा में विचार अभिव्यक्त किये जा सकते हैं।

अनुच्छेद 211 के अनुसार राज्य विधानमंडल न्यायपालिका पर कोई टिका-टिप्पणी नहीं करेगा।

अनुच्छेद 212 के अनुसार न्यायपालिका राज्य विधानमंडल में होने वाली किसी भी व्यवहार पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगी।

राजस्थान सन्दर्भ में विधानसभा

राजस्थान की राजनीतिक प्रणाली को विभिन्न चरणों में बांटा जा सकता है।

प्रथम चरण (1952-1977) कांग्रेस प्रणाली (एक दलीय प्रभुत्व)
द्वितीय चरण (1977-1980) कांग्रेस प्रणाली का अंत
तृतीय चरण (1980-1990) कांग्रेस की पुन: स्थापना
चतुर्थ चरण (1990-1998) संक्रमण काल
पंचम चरण (1998-वर्तमान) द्विदलीय राजनीतिक प्रणाली की स्थापना

पहली विधानसभा (1952-1957)

  • मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास (मनोनीत) के नेतृत्त्व में जनवरी 1952 में राज्य में पहला विधानसभा चुनाव हुआ।
  • कुल 160 सीटों में से 139 सामान्य, 16 SC एवं 5 ST के लिये आरक्षित सीटें थी।
  • प्रथम आम चुनाव में कांग्रेस के 7 प्रत्याशी विधानसभा हेतु निर्विरोध चुन लिये गये थे।
  • कांग्रेस को 82, राम राज्य परिषद् को 24, भारतीय जनसंघ को 8, कृषिकार लोक पार्टी को 7, हिन्दू महासभा को 2, कृषक मजदूर प्रजा पार्टी को 1 तथा निर्दलीयों को 35 सीटें प्राप्त हुई।
  • 23 फरवरी, 1952 को प्रथम विधानसभा का गठन हुआ।
  • जयनारायण व्यास ने दो स्थानों जोधपुर (B) तथा जालौर (A) से चुनाव लड़ा लेकिन वे दोनों सीटों से पराजित हो गये।
  • प्रथम लोकतांत्रिक सरकार 3 मार्च, 1952 को टीकाराम पालीवाल के नेतृत्व में चुनी गयी।
  • प्रथम बैठक 29 मार्च, 1952 को जयपुर के सवाई मानसिंह टाऊन हॉल में हुई।
  • श्री नरोत्तम लाल जोशी (झुन्झुनूं से निर्वाचित) को प्रथम विधानसभा का अध्यक्ष बनाया गया तथा श्री लाल सिंह शक्तावत को उपाध्यक्ष चुना गया।
  • महारावल संग्रामसिंह राजस्थान के प्रथम प्रोटेम स्पीकर थे।
  • जयनारायण व्यास मुख्यमंत्री बन सके इसलिए किशनगढ़ क्षेत्र के विधायक चांदमल मेहता से सीट खाली करवायी गयी तथा अगस्त 1952 में जयनारायण व्यास विधायक बने। आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature
  • 1 नवम्बर, 1952 को जयनारायण व्यास को मुख्यमंत्री एवं टीकाराम पालीवाल को उपमुख्यमंत्री बनाया गया।
  • राजस्थान विधानसभा की पहली महिला विधायक श्रीमती यशोदा देवी जो 1953 में बांसवाड़ा से उपचुनाव में निर्वाचित हुई थी।
  • प्रथम विधानसभा काल में 17 क्षेत्रों में उपचुनाव हुए जो आज तक सर्वाधिक उपचुनाव होने का रिकॉर्ड है।
  • 13 नवम्बर, 1954 को मोहनलाल सुखाड़िया को मुख्यमंत्री बनाया गया।
  • सुखाड़िया के मंत्रिमण्डल में कमला बेनिवाल को उपमंत्री बनाया गया जो पहली महिला मंत्री बनी। (26 वर्ष की आयु में)
  • 1 नवम्बर, 1956 को केन्द्रशासित प्रदेश अजमेर का भी राजस्थान में विलय कर दिया गया। अजमेर की 30 सदस्यीय विधानसभा राजस्थान की 160 सदस्यीय विधानसभा में विलित कर दी गयी जिससे द्वितीय विधानसभा के चुनाव तक इसकी सदस्या संख्या 190 रही।
  • 1957 में राजस्थान विधानसभा की सीटों का पुन: निर्धारण किया गया तथा कुल 176 विधानसभा क्षेत्र बनाए गए। इसके बाद 1967 में 184 तथा 1977 में 200 विधानसभा क्षेत्र स्थापित किये गये जो वर्तमान तक है।

दुसरी विधान सभा (1957-1962)

  • 176 सदस्यीय द्वितीय विधानसभा का गठन 2 अप्रैल, 1957 को मोहनलाल सुखाड़िया के नेतृत्व में हुआ ।

तीसरी विधानसभा (1962-1967)

  • तीसरी विधानसभा का गठन 3 मार्च, 1962 को सुखाड़िया के नेतृत्व में हुआ।

चौथी विधानसभा (1967-1972)

नये पुनर्सीमन के बाद सदस्य संख्या 176 से बढ़ाकर 184 कर दी गयी।

किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण राज्यपाल संपूर्णानंद सिंह ने 13 मार्च, 1967 को राज्य में पहली बार राष्ट्रपति शासन लागू किया।

राष्ट्रपति शासन के दौरान कुछ विधायक कांग्रेस में शामिल हो गये जिससे कांग्रेस विधायकों की सुख्या 103 हो गयी तथा बहुमत सिद्ध होने पर 26 अप्रैल, 1967 को सुखाड़िया को चौथी बार मुख्यमंत्री बनाया गया साथ ही 44 दिनों से चल रहा राष्ट्रपति शासन समाप्त हो गया।

1971 के जुलाई महीने में सुखाड़िया के त्यागपत्र के बाद बरकतुल्ला खां को मुख्यमंत्री बनाया गया जो राज्य के पहले अल्पसंख्यक मुख्यमंत्री थे।

दिसम्बर 1971 भारत पाकिस्तान युद्ध के समय बरकतुल्ला खाँ मुख्यमंत्री थे।

पाँचवी विधानसभा (1972-1977)

  • पांचवीं विधानसभा 15 मार्च, 1972 को बरकतुल्ला खाँ के नेतृत्व में गठित हुई।
  • बरकतुल्ला खाँ का आकस्मिक निधन हो जाने से 25 अक्टूबर, 1973 (दीपावली के दिन) हरिदेव जोशी ने मुख्यमंत्री की शपथ ली।
  • फरवरी 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में केन्द्र में सत्तारूढ़ जनता पार्टी की सरकार के निर्देश पर कार्यवाहक राज्यपाल वेदपाल त्यागी ने श्री हरिदेव जोधी की सरकार को बर्खास्त कर राज्य में दूसरी बार राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature

छठी विधानसभा (1977-80)

छठी विधानसभा के चुनाव से पूर्व विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन किया गया तथा इनकी संख्या 184 से बढ़ाकर 200 कर दी गयी।
चुनाव में जनता पार्टी ने 199 स्थानों के लिये अपने प्रत्याक्षी खड़े किये जिन्होंने 150 स्थानों पर विजय प्राप्त की। 22 जून 1977 को भैरोसिंह शेखावत ने राज्य में प्रथम गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। मुख्यमंत्री की शपथ से पूर्व भैरोसिंह शेखावत मध्यप्रदेश राज्य से राज्यसभा सांसद थे।
जनवरी 1980 में लोकसभा चुनावों के पश्चात् केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार ने निर्देश पर राज्यपाल रघुकुल तिलक ने 16 फरवरी, 1980 को शेखावत की सरकार को बर्खास्त करके राज्य में तीसरी बार राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया।

सातवीं विधानसभा (1980-1985) : प्रथम बार मध्यावधि चुनाव

छठी विधानसभा भंग हो जाने के फलस्वरूप प्रथम बार राज्य विधानसभा का मध्यावधि चुनाव हुआ।

6 जून, 1980 कांग्रेस के जगन्नाथ पहाड़िया ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

जगन्नाथ पहाड़िया के त्यागपत्र के कारण शिवचरण माथुर ने मुख्यमंत्री का पद संभाला।

23 फरवरी, 1983 को हीरालाल देवपुरा ने शिवचरण माथुर के त्यागपत्र के कारण मुख्यमंत्री की शपथ ली।

हीरालाल देवपुरा सबसे कम समय के लिए (मात्र 16 दिन) राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे।

आठवीं विधानसभा (1985-1990)

इस विधानसभा काल में हरिदेव जोशी, शिवचरण माथुर एवं पुन: हरिदेव जोशी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

नोट :- इसी विधानसभा काल में राजस्थान की राजनीति में पहली बार संवैधानिक संकट खड़ा हो गया जब शिवचरण माथुर के त्यागपत्र के बाद 3 दिसम्बर, 1989 को कांग्रेस ने सर्वसम्मति से हरिदेव जोशी को अपना नेता चुन लिया जबकि उस समय जोशी जी असम के राज्यपाल थे। 3 दिसम्बर को ही राज्यपाल द्वारा जोशी को शपथ ग्रहण के लिए आमंत्रित कर लिया गया लेकिन उस दिन शपथ ग्रहण नहीं हो सका क्योंकि राष्ट्रपति ने उस दिन हरिदेव जोशी का असम के राज्यपाल पद से त्यागपत्र स्वीकार नहीं किया था और न ही इस पद के लिये नये राज्यपाल की नियुक्ति की गई थी।

नवीं विधानसभा (1990-92)

इस विधानसभा चुनाव में 1967 के चतुर्थ विधानसभा चुनाव की तरह किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हो सका।
4 मार्च, 1990 को भैराेसिंह शेखावत ने मुंख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की।
6 दिसम्बर, 1992 को अयोध्या में घटी घटनाओं के कारण केन्द्र सरकार द्वारा कुछ संगठनों पर प्रतिबंध लगाया गया लेकिन राज्य सरकार इस तरह के प्रतिबंध निर्देशों को लागू करने में असफल रही इस कारण 15 दिसम्बर, 1992 को राज्यपाल एम. चेन्नरेड्‌डी ने भैरोसिंह शेखावत की सरकार को बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लागू (चौथी बार) कर दिया। यह राष्ट्रपति शासन एक वर्ष तक लागू रहा था। राष्ट्रपति शासन के दौरान धनिकलाल मंडल कार्यवाहक राज्यपाल थे। जब दिसम्बर, 1993 में राष्ट्रपति शासन खत्म हुआ तब बलिराम भगत राज्यपाल थे।

दसवीं विधानसभा (1993-1998)

4 दिसम्बर, 1993 को भाजपा नेता भैरोसिंह शेखावत ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

ग्यारहवीं विधानसभा (1998-2003)

1 दिसम्बर 1998, को श्री अशोक गहलोत ने मुख्यमंत्री पत्र की शपथ ली।
इस चुनाव में कांग्रेस को कुल 197 प्रत्याशियों में से 152 स्थानों पर विजय प्राप्त हुई।

बारहवीं विधानसभा (2003-2008)

इस चुनाव में सम्पूर्ण राज्य में प्रथम बार इलेक्ट्रोनिक मशीनों (EVM) से मतदान कराया गया।
8 दिसम्बर, 2003 को श्रीमति वसुंधरा राजे ने राज्य की तेरहवीं मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता की बागडाेर संभाली।
वसुंधरा राजे राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री है।
प्रदेश में पहली बार महिला मुख्यमंत्री, राज्यपाल और विधानसभाध्यक्ष के पद पर नियुक्त हुई।

तेरहवीं विधानसभा (2008-2013) आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature

13 दिसम्बर, 2008 को दूसरी बार अशोक गहलोत ने मुख्यमंत्री पद के रूप में शपथ ग्रहण की।

चौदहवीं विधानसभा (2013-2018)

इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 163 सीटें जबकि कांग्रेस को 21 सीटें प्राप्त हुई।
वसुंधरा राजे ने दूसरी बार मुख्यमंत्री का पद संभाला।

पन्द्रहवीं विधानसभा (2018)

राजस्थान में 200 विधानसभा सीटों में से 141 सामान्य के लिए, 34 सीटें अनुसूचित जाति के लिए तथा 25 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित थी।
200 विधानसभा सीटों में से 199 सीटों (रामगढ़, अलवर से बसपा प्रत्याक्षी लक्ष्मणसिंह के निधन हो जाने के कारण) के लिए 7 दिसम्बर, 2018 को मतदान हुआ।
रामगढ़ सीट के लिए उपचुनाव जनवरी 2019 में हुये जिसमें कांग्रेस प्रत्याक्षी साफिया जुबेर विजय रही।
मतदान :- राज्य निर्वाचन विभाग के अनुसार प्रदेश में 74.69% मतदान हुआ जो पिछले चुनाव 75.67% की तुलना में 0.98 फीसदी कम है।

महिला उम्मीदवार :- इस चुनाव में 187 महिलाओं ने अपना भाग्य आजमाया लेकिन 23 महिलाएँ ही विधायक के रूप में निर्वाचित हुई।

नवीन क्षेत्रीय दल :-

भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP):- इसका गठन 2017 में गुजरात में छोटूभाई वासवा ने किया। चुनाव चिह्न ऑटो रिक्शा है। डुंगरपुर जिले की 2 सीटों पर इस दल ने विजय प्राप्त की।

राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (रालोपा) :- इसका गठन हनुमान बेनिवाल ने अक्टूबर 2018 को किया। चुनाव चिह्न ‘पानी की बोतल’ है। इस दल को 2018 में हुए राजस्थान विधानसभा चुनाव में 3 सीटें मिली।

भारत वाहिनी पार्टी :- गठनकर्त्ता घनश्याम तिवाड़ी। चुनाव में प्रदर्शन नगण्य था।
परिणाम :- कांग्रेस काे 100, भारतीय जनता पार्टी काे 73, बहुजन समाज पार्टी को 6 सीटें प्राप्त हुई जबकि 13 सदस्य निर्दलीय निर्वाचित हुए।

मुख्यमंत्री :- 17 दिसम्बर, 2018 को तात्कालीन राज्यपाल कल्याणसिंह ने अशोक गहलोत को अल्बर्ट हॉल (जयपुर) में राज्य के मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई तथा साथ ही राज्यपाल ने सचिन पायलट को राज्य के उपमुख्यमंत्री की शपथ दिलाई।

राजस्थान 15वीं विधानसभा के पदाधिकारी (वर्तमान)

कलराज मिश्र राज्यपाल, राजस्थान राज्य

गुलाब चंद कटारिया प्रोटेम स्पीकर, राजस्थान विधानसभा

सी.पी. जोशी अध्यक्ष, राजस्थान विधानसभा

अशोक गहलोत मुख्यमंत्री, राजस्थान सरकार

अशोक गहलोत नेता, राजस्थान सरकार

महेश जोशी सरकारी मुख्य सचेतक, राजस्थान विधानसभा

गुलाब चंद कटारिया नेता प्रतिपक्ष, राजस्थान विधानसभा

नोट :- लोकसभा चुनाव (2019) में दो विधायक रालोपा के हनुमान बेनिवाल खींवसर (नागौर) एवं भाजपा के नरेन्द्र कुमार मण्डावा (झुन्झुनूं) सांसद के रूप में चुन लिये गए अत: राजस्थान विधानसभा में दो सीटें रिक्त हो गई है। उपचुनाव में खींवसर (नागौर) विधानसभा सीट से रालोपा तथा भाजपा का संयुक्त उम्मीदवार नारायण बेनिवाल ने कांग्रेस के हरेन्द्र मिर्धा को जबकि मंडावा (झुन्झुनूं) विधानसभा सीट से कांग्रेस की रीटा चौधरी ने भाजपा की सुशीला सीगड़ा को हराया।

अन्य तथ्य :-

  • सुमित्रा सिंह प्रथम एवं एकमात्र महिला जो राजस्थान विधानसभा की अध्यक्ष रही।
  • ताराभण्डारी एकमात्र व प्रथम महिला है जो विधानसभा में उपाध्यक्ष रही।
  • पूनमचन्द विश्नोई राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष (1980-85) उपाध्यक्ष (1967-71) एवं प्रोटेम स्पीकर (1967, 1985, 1990) रह चुके है।
  • भैरोसिंह शेखावत एकमात्र प्रोटेम स्पीकर थे जो बाद में मुख्यमंत्री बने।
  • राज्य में अब तक 13 बार अविश्वास प्रस्ताव लाया जा चुका है जो एक बार भी पारित नहीं हुआ। पहली बार 1952 में टीकाराम पालीवाल के खिलाफ जबकि अंतिम बार 1986 में हरिदेव जोशी के खिलाफ लाया गया था। मोहनलाल सुखाड़िया के विरूद्ध 6 बार अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था।
  • राजस्थान में अविश्वास प्रस्ताव लाने हेतु 40 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है।
  • राज्य में अभी तक 4 गैर सरकारी विधेयक पारित हुए।
  • राजस्थान में अब तक 4 बार विश्वास प्रस्ताव लाया गया। पहली बार 1990 में भैरोसिंह शेखावत द्वारा लाया गया। जबकि अंतिम बार 2009 में अशोक गहलोत द्वारा लाया गया।
  • सर्वश्रेष्ठ विधायक सम्मान

2018 – श्री अभिषेक मटोरिया

2017 – श्री बृजेन्द्र सिंह ओला

2016 – श्री गोविंद सिंह डोटासरा

2015 – श्री जोगाराम पटेल

2014 – श्री माणिकचंद सुराणा

पहली महिला विधानसभा अध्यक्ष :- श्रीमति सुमित्रा सिंह (कांग्रेस 12वीं विधानसभा 2003-2008)
प्रथम गैर-कांग्रेस विधानसभा अध्यक्ष- लक्ष्मणसिंह (जनता पार्टी)
रामनिवास मिर्धा (कांग्रेस) दो बार (दूसरी व तीसरी विधानसभा) विधानसभा अध्यक्ष रहे।
पूनमचंद विश्नोई सर्वाधिक बार प्रोटेम स्पीकर रहे चुके है।
हरिदेव जोशी 1952 से लेकर मृत्युपर्यन्त विधानसभा के सदस्य रहे। (प्रथम दस विधानसभा)
राजस्थान विधानसभा की 4 वित्तीय समितियाँ है। प्रत्येक समिति में 15 सदस्य होते हैं। समितियों के अध्यक्ष विधानसभा के अध्यक्ष के द्वारा नियुक्त किये जाते हैं। समितियाँ अपना प्रतिवेदन विधानसभा को प्रस्तुत करती है।
राजस्थान का नाथद्वारा विधानसभा क्षेत्र एक से अधिक जिले में फैला हुआ है।
राजसमंद लाेकसभा निर्वाचन क्षेत्र एकमात्र ऐसा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र जिसका विस्तार चार जिलों – राजसमंद, पाली, अजमेर व नागौर में है।
राजस्थान की विधानसभा की समितियाँ

राजस्थान में चार वित्तीय समितियाँ है-

  • लोक लेखा समिति
  • लोक उद्यम समिति
  • अनुमान समिति ‘क’
  • अनुमान समिति ‘ख’

राजस्थान विधानसभा की सभी समितियों में 15-15 सदस्य होते हैं। केवल पुस्तकालय समिति में ही 10 सदस्य होते हैं।

i. लोक लेखा समिति

राज्य सरकार पर वित्तीय नियंत्रण एवं निगरानी हेतु विधानसभा की लोक लेखा समिति का प्रथम बार गठन 10 अप्रैल, 1952 को किया गया था।
इसके सदस्यों को विधानसभा सदस्यों द्वारा अपने में से एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा प्रतिवर्ष चुनाव किया जाता है।
इसके सदस्यों की संख्या 15 होती है। आप पढ़ रहे हैं Rajasthan polity – State Legislature
इसका अध्यक्ष विरोधी दल का सदस्य होता है। जिसका चुनाव विधानसभा अध्यक्ष द्वारा किया जाता है।
कोई मंत्री इस समिति का सदस्य नहीं हो सकता ।
इस समिति का कार्यकाल 1 वर्ष का होता है।

ii. लोक उद्यम समिति

सरकारी उपक्रमों पर वित्तीय नियंत्रण स्थापित करने हेतु विधानसभा द्वारा इस समिति का गठन किया जाता है।
लाेक उपक्रम समिति का गठन विधानसभा के 15 सदस्यों को मिलाकर किया जाता है।
सभी 15 सदस्यों का चुनाव एक वर्ष के लिये होता है।
समिति के अध्यक्ष का चुनाव विधानसभा अध्यक्ष द्वारा किया जाता है।

iii. प्राक्कलन (अनुमान) समिति

विधानसभा द्वारा इस समिति का गठन भी अपने सदस्यों में से एकल संक्रमणीय मत पद्धति द्वारा प्रतिवर्ष किया जाता है।

राजस्थान विधानसभा में 2 अनुमान समितियाँ है-
अनुमान समिति ‘क’ – 15 सदस्य
अनुमान समिति ‘ख’ – 15 सदस्य
इन समितियों के अध्यक्ष का चुनाव विधानसभा अध्यक्ष द्वारा किया जाता है।
संसद में राजस्थान

24 सीटें भाजपा
1 सीट (नागौर) पर भाजपा समर्पित राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के गठबंधन के रालोपा के हनुमान बेनिवाल विजयी हुए।
3 महिलाएं रंजीता कोली (भरतपुर), जसकौर मीणा (दौसा) एवं दीया कुमारी (राजसंमद) 17वीं लोकसभा में राज्य से चुनी गयी।
मोदी सरकार 2.0 में राजस्थान के मंत्री

गजेन्द्रसिंह शेखावत (जोधपुर) केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री।
श्री अर्जुनराम मेघवाल (बीकानेर) संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री और भारी उद्योग सार्वजनिक उधम मंत्रालय से राज्यमंत्री
कैलाश चौधरी (बाड़मेर) कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री
राज्यसभा

  • राजस्थान में वर्तमान में 10 राज्य सभा सीटें है।
  • 28 अगस्त 2003 को डाॅ. नारायणसिंह माणकलाव राजस्थान से राज्यसभा के लिए मनोनीत होने वाले प्रथम राजस्थानी थे।
  • राजस्थान से सर्वाधिक बार निर्वाचित राज्यसभा सदस्य श्री रामनिवास मिर्धा थे (4 बार) जबकि महिलाओं में श्रीमति शारदा भार्गव 3 बार चुनी गयी।
  • वर्तमान में राजस्थान में 9 भारतीय जनता पार्टी के सदस्य जबकि 1 सदस्य कांग्रेस (डॉ. मनमोहन सिंह) का है।

अन्य तथ्य

  • राजस्थान से राज्यसभा में प्रथम महिला सांसद श्रीमति शारदा भार्गव सन् 1952 में बनी थी।
  • राज्य से प्रथम महिला लोकसभा सदस्य महारानी गायत्री देवी (जयपुर) चुनी गई थी।
  • श्री नाथुराम मिर्धा (कांग्रेेस) राजस्थान से सर्वाधिक बार लोकसभा सदस्य बने।
  • श्रीमति वसुंधरा राजे राजस्थान से सर्वाधिक (5 बार) चुनी गई महिला लोकसभा सदस्य है
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